Wednesday, March 25, 2009

दायरों को लांघना


नई दिल्ली के बीचोंबीच अपना वजूद बनाए जे.पी.कॉलोनी की कहानियां अंकुर के सहारे हम तक पहुंच रही है।

ठौर-ठिकाने लोगों की ज़िन्दगी भर की दौड़धूप के बाद ही बनते हैं। किसी जगह को बनाने में कितनी ही ज़िन्दगियाँ और कितनी ही मौतें शामिल होती हैं, कितने ही मरहलों से गुज़रकर लोग अपने लिये एक मुकाम, एक घर हासिल कर पाते हैं। कितने ही पसीने की बूँदें उस मिट्टी में समाकर नई जगह का रूप देती हैं। बड़ी जतन से अपनी उस जगह को सींचते है।

आदमी तो सुबह का गया शाम को घर लौटकर आता है पर औरत को तो घर से लेकर बाहर तक सभी रहगुज़र को पार करना पड़ता है।
शौहर की पाबंदी, समाज का ख्याल, तो कहीं मज़हब की दीवार आड़े आती है। लेकिन सर्वे के दौरान कई ऐसे मौके सामने आये हैं जिसने मज़हब की दीवार को भी दरकिनार कर दिया है।

मुस्लिम समाज में जब किसी औरत का शौहर गुज़र जाता है तब से लेकर साढ़े चार महीने तक औरत को पर्दे में रहकर इद् दत करनी होती है जिसमें किसी गैर मर्द (यहाँ तक कि अपने घर के मर्दो से भी) से पर्दे में रहना होता है। इस दौरान औरत को अपने घर के आँगन या खुले आसमान तक के नीचे आने की भी इज़ाजत नहीं होती। अगर किसी मज़बूरी के तहत घर के बाहर जाना हो तो चाँदनी रात में नकाबपोश होकर निकलना पड़ता है।

लेकिन आज सर्वे के दौरान मजहबी पाबंदी होने के बावजूद उनको बाहर आना पड़ा। जब सर्वे अधिकारी ने काग़ज मांगे तो वो खुद आगे आई। आसपास खड़ी भीड़ भी उन्हें खामोशी से देख रही थी। किसी ने कहा : “इनके शौहर नहीं रहे। अभी ये इद् दत में हैं।"
इस बात को सर्वे अधिकारी भी समझते थे। उन्होंने कहा : “आप अंदर जाइये हम सर्वे कर देगें।"
वो अपने काले नकाब में ख़ुद को छुपाती हुई अंदर घर में ओझल हो गईं।

फरज़ाना

4 comments:

MANVINDER BHIMBER said...

aapke blog par pahli baar nana hua hai ..achcha likha hai

gargi said...

How problems are break traditions, seems to know it from this article.

Thank you.

विनीत कुमार said...

मन किया कि आगे भी कुछ पढ़ूं।

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

क्या इन रूढ़ियों के ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठाई जानी चाहिए? अगर वह स्त्री कामकाजी हुई या ग़रीब हुई तो उसकी नौकरी और घर-खर्च का क्या होगा?