Friday, November 6, 2009

ऐसी भी क्या जल्दी थी

एक शाम हिमांशु का फोन आया। उसने कहा, “क्या करें! प्रभाष जी तो हाथ ही नहीं आ रहे हैं। अब बिना बातचीत के रिपोर्ट कैसे बनाएं।” तत्काल उनकी (प्रभाष जोशी) माताराम की इक बात दिमाग में चक्कर काटने लगती है, जिसका जिक्र स्वयं उन्होंने अपने कागद कारे में किया था, “थारा पांव पै सनि म्हाराज है। तू सकना नी बेठेगो। ” सचमुच अपनी अंतिम यात्रा में भी वे कइयों के हाथ नहीं आए। जहां से चले थे। अंतत: कइयों को छकाते वहीं लौट गए।

खैर, कल भरी रात को राय साहब ने पंकजजी को फोन किया। भरी व स्थिर आवाज में कहा, “गोविंद जी(के.एन.गोविंदाचार्य) कहां हैं ? हमलोगों ने प्रभाषजी को खो दिया है।” मनोज जी (प्रथम प्रवक्ता) ने कहा कि और कुछेक लोगों को संक्षिप्त खबर हुई। वह यह कि राजधानी के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में इक बड़ा और अपने तरीके का एकेला व हदतोड़ी संपादक सबों से दूर जा चुका है।

ठेठ इंदौरी अंदाज में घूमने-फिरने वाला व्यक्ति कभी न जगने वाली नींद ले रहा था। उनके ऐसे अचानक चले जाने पर यकीन न करने वाले अब भी उस नींद के टूटने का इंतजार कर रहे थे। पर कहां हो पता है, वापस लौटना ! कई नामवर लोग वहां मौजूद थे। स्वयं प्रो. नामवर सिंह भी आए। गोविंदाचार्य भी सुबह दस बजे तक पहुंच गए। राजेंद्र यादव व आशोक वाजपेयी वहां मौजूद थे।

दोपहर एक बजे के आसपास पार्थिव शरीर को गांधी शांति प्रतिष्ठान लाया गया। दसेक मिनट बाद ही कुछ लोग शव को लेकर हवाई अड्डे की ओर रवाना हो गए। इस पंक्ति के लिखे जाने तक पार्थिव शरीर को लेकर लोग इंदौर पहुंच चुके थे। शहर से करीब साठ किलोमीटर की दूरी पर प्रभाष जोशी का पैतृक गांव है जहां शनिवार को अंत्येष्टि होगी। पूरे इंदौर में खबर आग की तरह फैल गई थी। जबकि इस शहर में बगल के इक अपार्टमेंट के सज्जन कहते सुनाई दिए- “अखबार के एक आदमी का निधन हो गया है। इसलिए इतने टीवी वाले आए हैं।” सचमुच कितना एकांगी हो गया है यह महानगर।

Friday, October 30, 2009

छोटी-छोटी बातों के मतलब बड़े


दफ्तर से निकलने की तैयारी अभी कर ही रहा था कि एक साथी ने पूछा- संजीव गया क्या ?
दूसरे ने कहा, “ हां, वह किसी मेहरारु वगैर की बात कर रहा था। इsके होवे है ?
तभी जोर की हंसी आई। लोग खूब हंसे।

सवाल करने वाले साथी अब भी गंभीर थे। वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हैं। लगातार पूछ रहे थे कि आखिर यह होता क्या है। लोग शांत रहे। तब उन्होंने ठेठ पश्चिमी उत्तर प्रदेश की भाषा में कहा, - “ओsए रेहेण दे..। चल तू ये बात इसका मतलब के होवे है।”

तब एक साथी ने गंभीर आवाज में कहा, “अरे ये एक तरीके की शराब है।” तब सवाल करने वाले साथी ने कहा, “अबे, इसमारे जल्दी-जल्दी चला गया। चल कोई बात ना। आज उसsए पीन दे।” तब ऐसा लगा कि वे कुछ और न कहें, इस अंदेशे से एक अन्य साथी ने समझाया कि भोजपुर इलाके में पत्नी को मेहरारु कहते हैं। तब सभी साथ-साथ हंसे।

इसके बात प. उप्रे के साथी ने कहा ने कहा, “यार तुम तो लड़ाई करवाने वाला काम कर रहे हो।” तब चौथे ने समझाया, “ शराब ही है पर मामला थोड़ा अलग है।”

दफ्तर से लौटते वक्त चौथे की बात पर सोचता रहा कि सचमुच शराब है। यदि है तो मामला अलग कहां है। सचमुच छोटी छोटी बातों में कैसे बड़ी बातें छुपी होती हैं।

Sunday, October 18, 2009

शेरोशायरी का मजा ले, न मन करे तो छोड़ दें



सुबह-सबेरे एक व्यक्ति को अलग-अलग समय इस पंक्ति को दोहराते-तिहराते सुना। कुछेक घंटे बाद अपन ने भी तोता पाठ जारी किया। शाम क्या, रात तक चला।

नहीं आती तो याद उनकी महीनों तक नहीं आती।
मगर जब याद आते हैं तो अकसर याद आते हैं।।

-हसरत मोहानी

कितना अच्छा होता शहर में दिवाली (दीपावली) की शाम शेरोशायरी से होती। देर रात उसी में डूबी रहती। पर यहां तो धूम-धड़ाके से शाम बीती। फिर रात चढ़ी और उसी में डूबी। सबेरा धूएं में घिरा रहा। यानी पर्यावरण की ऐसी की तैसी। तब फिराक की यह पंक्ति याद आई।

मजहब कोई लोटाले और उसकी जगह दे दे।
तहजीब सलीक़े की, इन्सान क़रीने के।।

- फिराक

Friday, October 16, 2009



अब त्योहार भी आतंक के साये में मना रहे हैं लोग । खैर, कोई गल नहीं। आएं जमकर मनाते हैं,
रोशनी के इस उत्सव को।
आप सब को दीपावली की बधाई।
पर किसी की एक कविता याद आती है। आपको भी सुनाए देता हूं।

रोशनी की जनमगाती फुहार के नीचे
अंधेरा सहसा और भी घना हो चला है
इन गलियारों में अब
लगातार चक्कर लगाती है उदासी
शिकार की ताक में
किसी बाध की तरह घूमती हुई।

तो दोस्त बाघ-वाघ से बच कर रहिएगा।

धन्यवाद

Monday, August 31, 2009

राह से भटका छात्र संघ



दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव चार सितंबर को होना है। शायद ही किसी दूसरे विश्वविद्यालय में छात्र संघ का चुनाव इतनी नियमितता से होता है, जितना कि दिल्ली विश्वविद्यालय में। पर यहां कि छात्र राजनीति पूरी तरह बदल चुकी है।

वैसे तो युवाओं की बढ़ती अराजनीतिक मानसिकता और कैरियर बनाने की आपाधापी वाले इस दौर में पूरे देश की ही छात्र राजनीति प्रभावित हुई है। देश का कोई परिसर अब किसी बदलाव के लिए नहीं गर्माता। मुद्दे गायब रहते हैं।

यूं कहें कि चुनाव राजनीति की ताकतवर दुनिया में जाने की सीढ़ी होकर रह गए हैं। डुसू की राजनीति इन्हीं आकांक्षाओं के इर्द-गिर्द घुमती है। लिंगदोह समिति की रोपोर्ट इस राह में रोड़े डालती है, जिसकी वजह से बड़े छात्र संगठन आपत्ति दर्ज करा रहे है। खैर। अब तक डुसू में चुने गए अध्यक्ष व सचिव


अब तक के डुसू अध्यक्ष
वर्ष - अध्यक्ष - सचिव

1954-55 गजराज बहादुर नागर, -----
1955-56 प्रेम सबरवाल, एचडी तुलसीदास
1956-57 यदुकुल भूषण , अशोक कुमार तनवर
1957-58 कृष्णानंद शर्मा , अदिश जैन
1958-59 नरेंद्र मेहता , कलश कपूर
1959-60 राम लुभाया सरवीना, अश्वनी सेठ
1960-61 विदेश प्रताप चौधरी, मदन सलूजा
1961-62 मदन लाल सलूजा , श्याम सुंदर भाटिया
1962-63 जोगिंदर संत सेटी, यशलाल शर्मा
1963-64 नरेंद्र नाथ कालिया , सुरेंद्र सेठी
1964-65 सुरेंद्र सेठी , राजवंसल जैन
1965-66 अशोक मारवाह, मनमोहन सिंह जुनेजा
1966-67 सुभाष गोयल, प्रदीप सेठ
1967-68 हरचरण सिंह जोश, विनय सेठ
1968-69 अजित सिंह चड्डा, रमेश वर्मा
1969-70 सुभाष सोहनी , ....
1970-71 सुभाष चोपड़ा , भगवान सिंह
1971-72 भगवान सिंह, रावत कुमार
1972-73 श्रीराम खन्ना , शेर सिंह डागर
1973-74 अशोक कुमार , अटल भाटिया
1974-75 अरुण जेटली , हेमंत विश्नोई
1975-76 आपात काल
1976-77 आपात काल
1977-78 विजय गोयल, रजत शर्मा
1978-79 हरि शंकर, विजय जॉली
1979-80 राजेश ओबराय, पिंकी आनंद
1980-81 विजय जॉली , सुशील कुमार
1981-82 सुधांशु मित्तल, अजित पांडे
1982-83 योगेश शर्मा , आर पी सिंह
1983-84 आर सोनी, नरेश शर्मा
1984-85 बलराम यादव, सतपाल धुग्ना
1985-86 अजय माकन, राजेश गर्ग
1986-87 मदन सिंह बिष्ट, नरेंद्र टंडन
1987-88 नरेंद्र टंडन , अंजु सचदेवा
1988-89 आशीष , हरिओम
1989-90 अंजु सचदेवा, कमल कांत सचदेवा
1990-91 अंजु सचदेवा , कमल कांत सचदेवा
1991-92 राजीव गोस्वामी, सोनिया सेठ
1992-93 अवधेश शर्मा , मोनिका कक्कर
1993-94 मोनिका कक्कर, शालू मलिक
1994-95 शालू मलिक , वंदना मिश्रा
1995-96 अलका लांबा , रेखा जिंदल
1996-97 रेखा जिंदल , सुरेंद्र गोयल
1997-98 अनिल झा , सुनीता नारंग
1998-99 जयवीर राणा , रीतू वर्मा
1999-00 रीतू वर्मा , नीतू वर्मा
2000-01 अमित मलिक , तरुण कुमार
2001-02 नीतू वर्मा , विकास सोकीन
2002-03 नकुल भारद्वाज , दीप्ति रावत
2003-04 रोहित चौधरी , रागिनी नायक
2004-05 नरेंद्र टोकस , अमृता धवन
2005-06 रागिनी नायक , रमित सहरावत
2006-07 अमृता धवन , .....
2007-08 अमृता बाहरी , मनीष चौधरी
2008-09 नुपूर शर्मा , अमित चौधरी

पीला जो रंग है



इक साथी ने कहा कि पीला भी कोई रंग है। रोग का सूचक है। तब हमने कहा,पीला ही रंग है- जैसे यह फूल। जैसे कि हल्दी आदि-आदि। कभी पराग को देखा है? इस शहर में तो लोग पराग भी नहीं जाते-अब क्या रहें! तपाक से इक अन्य साथी ने कहा- न जानें अपनी बला से। उससे पराग के गुण में कोई फर्क थोड़े ही आने वाला है।

Thursday, August 27, 2009

सड़क के पार



मुझे आदमी का सड़क पार करना हमेशा अच्छा लगता है।
क्योंकि,
इस तरह एक उम्मीद-सी होती है
कि
दुनिया जो इस तरफ है शायद उससे कुछ बेहतर हो, सड़क के उस तरफ।


गिरींद्र के ब्लॉग पर यह पंक्ति टंगी है। हर बार नई मालूम पड़ती है। सो यहं भी लागा दिया।