Wednesday, February 25, 2009

गांधी क्यों लौट-लौट आते हैं?


सराय /सीएसडीएस से जुड़े रविकान्त का लेख पढ़ें। साथ ही गांधी के अगल-बगल होने का एहसास करें

आशिस नंदी ने अपने एक मशहूर लेख में बताया था कि गांधी को मारनेवाला सिर्फ़ वही नहीँ था जिसकी पिस्तौल से गोली चली थी, बल्कि इस साज़िश को हिन्दुस्तानियोँ के एक बड़े तबक़े का मौन-मुखर समर्थन हासिल था। सत्ता की राजनैतिक मुख्यधारा के लिए वे काँटा बन चुके थे, और चालीस के दशक में उनके अपने चेलोँ ने ही उन्हें हाशिए पर सरका दिया था, क्योंकि बक़ौल पार्थ चटर्जी, राष्ट्र अपनी मंज़िल के क़रीब आ चुका था। पर हम सुमित सरकार के हवाले से यह भी जानते हैँ कि गांधी की जीवन-ज्योति बुझने से ठीक पहले अपनी दिव्य प्रदीप्ति भी छोड़ जाती है, जब बटवारे के दुर्दांत दृष्टांत में कोई और हिकमत काम नहीं आती तो गांधी का खटवास-पटवास ही काम आता है। कहा जा सकता है कि अपने ही लोगों के ख़िलाफ़ हुई अपनी आख़िरी जंग में हिन्दुस्तानी रिवायतों की रचनात्मक पुनर्परिभाषा करनेवाले गांधी के अपने सांस्कृतिक स्रोत सूखते नज़र आते हैं - ख़ासकर तब जब हम उन्हें महिलाओं को बेइज़्ज़ती की आशंका पर प्राणोत्सर्ग की हिमायत करते देखते हैं। बहरहाल दिलचस्प है कि उनके अपने प्रणोत्सर्ग ने असंभव को संभव कर दिखाया और इस तरह गांधी ने बटवारे के समय मरकर एक ज़ोरदार कमबैक दिया, और यह सिलसिला थमा नहीं है।

तो गांधी हमारे कमबैक किंग सिर्फ़ इसलिए नहीं हैं कि उनके आचार-विचार और आदर्श-व्यवहार अपने रूपकार्थ में आज भी हमें रोशनी और हौसला देते हैं, बल्कि इसलिए भी हम उनके सुझाए विकल्पोँ से बेहतर विकल्प अपने लिए नहीं ढूँढ पाए हैं। मसलन जब पश्चिम की अपनी हिंसक मुठभेड़ के संदर्भ में जब देरिदा मिल-जुलकर जीने की कला और सहिष्णुता का पाठ पढ़ाते हैं तो हमारे लिए गांधी का याद आना स्वाभाविक है, क्योंकि वे भी कुछ वैसा ही कह रहे थे। और हम इसमें न तो अकेले हैँ, न ही पहले। गांधी की वैश्विक पहुँच और स्वीकृति थी और रहेगी: गांधी-स्मृति जा‌इए, जनसत्ता में सुधीर चंद्र के कॉलम पढ़िए, या थोड़ा इंटरनेट पर घूमिए तो पाएँगे कि लोग आज उन्हें पर्यावरण से लेकर प्रौद्योगिकी तक के इलाक़ों में
पुनर्मिश्रित और पुनर्व्याख्यायित कर रहे हैं, उनके जीवन-प्रसंगोँ की नई तर्जुमानी हो रही है, और उन औज़ारों के ज़रिए उनका पुनराविष्कार हो रहा है, जिनसे शायद उनको ख़ुद बहुत लगाव नहीं था। आप शायद कहें कि गांधीगिरी, गांधीवाद नहीं है। बेशक, पर शाहिद अमीन के चौरी-चौरा के किसानों से पूछिए कि क्या उन्होंने गांधी को उल्टा नहीं घिसा था? हम सबके अपने-अपने गांधी इसलिए हैं कि हमें उनसे जूझना ही पड़ता है, ऐसी उनकी अनुपस्थित उपस्थिति है, ऐसा महात्म्य है
उनका।

3 comments:

222222222222 said...

मुझे कभी भी विचार या सामाजिक स्तर पर गांधी की जरूरत महसूस नहीं हुई। दरअसल, गांधी की तरफ लौटने का कोई वैचारिक खतरा नहीं है। गांधी का अहिंसा का विचार कमजोर करता है। और हम उसे ही साथ लेते हैं जिससे हमें कोई खतरा नहीं होता। गांधी उनमें से एक हैं।

Zirah said...

रविकान्त के लेख को पढ़ाने के लिए शुक्रिया।

अक्षत विचार said...

अस्पस्ट लेख..