Saturday, February 28, 2009

कलियुग को नज़ीर ने कुछ यूं देखा


दीवान पर नामवर सिंह के एक लेख को पढ़ने के बाद नज़ीर अकबराबादी तत्काल याद आ गए। कहा जाता है कि भाषा के स्तर पर उन्होंने अज़ान भी दी और शंख भी फूंका। खैर,
कलियुग पर लिखी उनकी चार पंक्तियां यूं हैं-

अपने नफ़ेके वास्ते मत और का नुक़सान कर।
तेरा भी नुक़सां होयगा इस बात ऊपर ध्यान कर।
खाना जो खा तो देखकर, पानी जो पी तो छानकर।
यां पांव को रख फूंककर और खौफ़ से गुज़रान कर।

कलयुग नहीं कर-जुग है यह, यां दिनको दे और रात ले।
क्या खूब सौदा नक़्द है, इस हाथ दे उस हाथ ले।।

8 comments:

सुशील कुमार छौक्कर said...

वाह कलियुग पर क्या खूब लिखा है।
कलयुग नहीं कर-जुग है यह, यां दिनको दे और रात ले।
क्या खूब सौदा नक़्द है, इस हाथ दे उस हाथ ले।।
वाह ...।
वैसे दीवान की हिंदी साईट पता तो बताए।

mehek said...

कलयुग नहीं कर-जुग है यह, यां दिनको दे और रात ले।
क्या खूब सौदा नक़्द है, इस हाथ दे उस हाथ ले।।
waah dil khush ho gaya padhkar,behtarin.

आशीष कुमार 'अंशु' said...

ब्रजेश भाई,
नजीर की यह रचना अधूरी है....
लेकिन जो भी है लाजवाब है .

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

बहुत बढिया. सम्भव हो तो यह रचना पूरी दें.

अनिल कान्त : said...

वाह बहुत खूब पढ़वाया है मेरे भाई ...

मेरी कलम -मेरी अभिव्यक्ति

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

शुक्रिया! नज़ीर मेरे पसंदीदा शायर हैं।

nisha said...

Very factual

maheshwari said...

that's good.