Saturday, February 14, 2009

वैलेंटाइन का नशा


हिन्दी सिनेमा में मजाज़ी इश्क़ (सांसारिक प्रेम) पर लिखे गीतों के रुतबे को तो सभी महसूस करते ही होंगे ! इधर मैं कुछ दिनों से इश्क़-विश्क के उन गीतों को ढूंढ रहा था जो खासकर वैलेंटाइन डे पर लिखे गए हैं। अभी सफर जारी है। इस दौरान तत्काल जो गीत मुझे याद आया वह फिल्म बागवान का है। बोल है- चली इश्क की हवा चली।

यकीनन यह गीत मजेदार व ऒडीटोरियम-फोडू है। लेकिन बालीवुड में गीत का जो इतिहास है, उसमें बहुत बाद का है। थोड़ा पहले का मिले तो मजा आ जाए। और आप सब का सहयोग मिले तो फिर क्या कहने हैं !

खैर ! यह वैलेंटाइन डे जितना सिर चढ़कर बोल रहा है, गीत ढूंढते वक्त ऐसा लगता नहीं कि इसकी जड़ उतनी गहरी है। इसपर बातचीत पूरी खोज के बाद। लेकिन, इसमें शक नहीं कि यदि वैलेंटाइन डे से ज्यादा बिंदास डे कोई आ गया तो इस डे के मुरीद उधर ही सरक जाएंगे। ठीक है। इश्क के इजहार का वे जो भी तरीका अख्तियार करें यह तो उनका निजी मसला है।

लेकिन कई बार यह भी सच मालूम पड़ता है कि इस कूचे की सैर करने वाले इश्क की नजाकत भूला बैठते हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह बालीवुड- चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो, हम हैं तैयार चलो...। जैसे रूहानी गीत कम ही तैयार करने लगा है। अब के गीतों में तो केवल सुबह तक प्यार करने की बात होती है। याद करें- सुबह तक मैं करुं प्यार...। ये दोनों ही गीत अपने-अपने दौर में खूब सुने गए।

कई लोग मानते हैं कि तमाम अच्छाइयों के बावजूद अब इश्क कई जगह टाइम-पास यानी सफर में चिनियाबादाम जैसी चीज बनकर रह गया है। यहां रूहानियत गायब है और कल्पना का भी कोई मतलब नहीं रहा। संभवतः इसमें कुछ सच्चाई हो तभी तो कई लोग वैलेंटाइन डे को लेकर हवावाजी कर रहे हैं और ठाठ से अपनी दुकान चमका रहे हैं।

इश्क के मकतब (स्कूल) में दाखिला लेने वाले कहते हैं- भई जरा सोच-समझकर इस मकतब में कदम रखियेगा। क्योंकि, इस मकतब से कोई पास नहीं होता, जरा गौर फरमाएं-
मकतबे इश्कका दुनिया में निराला है सबक़।
उसको छुट्टी न मिली, जिसको सबक़ याद हुआ।।

इश्क में फंसे लोगों ने अपनी आवाज बुलन्द कर कुछ यू फ़र्माया है-

मोमिन
असरेगम, जरा बता देना।वोह बहुत पूछते हैं, क्या है इश्क ?

माइल देहलवी
अपनी तो आशिकी का किस्सा ये मुख्तसिर है।
हम जा मिले खुदा से, दिलबर बदल-बदलकर।।

3 comments:

गिरीन्द्र नाथ झा said...

“एक चमेली के मंडवे तले, दो बदन प्यार की आग में जल गये”, इस गीत को लिखा था मखदूम मोइउद्दीन ने। जिसे सबसे पहले 1964 में गाया गया और उसके बाद 1992 में।

1992 में जगजीत सिंह की गजल का एक एलबम आया था कहकशाँ (Kahkashan), उसी के लिये उन्होंने ये गीत (गजल) गाया था लेकिन ये गीत सबसे पहले मो. रफी और आशा भोंसले ने गाया था, 1964 में रीलिज हुई फिल्म “चा चा चा (Cha Cha Cha)” के लिये, जिसका संगीत दिया था इकबाल कुरैशी ने। फिल्म के मुख्य कलाकार थे चंद्रशेखर और हेलन, उन्हीं के ऊपर ये गीत फिल्माया भी गया था।

एक चमेली के मंडवे तले,
मयकदे से जरा दूर उस मोड़ पर
दो बदन प्यार की आग में जल गये

प्यार हर्फ-ए-वफा
प्यार उन का खुदा
प्यार उनकी चिता
दो बदन प्यार की आग में जल गये

ओस में भीगते
चाँदनी में नहाते हुए
जैसे दो ताजा रूह
ताजा दम फूल पिछले पहर
ठंडी ठंडी सबब-ओ-चमन की हवा
सर पे मातम हुई - ३
काली काली लटों से लिपट
गरम रूखसार पे
एक पल के लिये रूक गयी
दो बदन प्यार की आग में जल गये

हमने देखा उन्हें
दिन में और रात में
नूर-ओ-जुल्मात में
दो बदन प्यार की आग में जल गये

मस्जिदों की मीनारों ने देखा उन्हें
मंदिरों के किवाड़ों ने देखा उन्हें
मयकदे की दरारों ने देखा उन्हें
दो बदन प्यार की आग में जल गये

अज-अजल-ता-अबद ये बता चारागर
तेरी जंबीर में नुस्खा-ए-किमियाँ-ए-मोहब्बत भी है
कुछ-ईलाज-ओ-मुदावा-ए-उल्फत भी है
दो बदन प्यार की आग में जल गये

http://www.readers-cafe.net/geetgaatachal/2009/02/14/ek-chameli-ke-mandve-tale-do-badan-pyar-ki-aag-mein-jal-gaye/
se sabhar

nisha said...

आपने जो कुछ लिखा है वह जरूर यह सोचने पर मजबूर करता है कि हिन्दी सिनेमा में जब हर लम्हा के लिए गीत मौजूद है तो वैलेंटाइन डे पर लिखा गीत 70 वर्षों के बाद क्यों सुनाई पड़ता है। हालांकि आपने कोई दावा नहीं किया है। फिर भी ऐसा लगता है कि आप काफी हद तक सही हैं

nisha said...

आपने जो कुछ लिखा है वह जरूर यह सोचने पर मजबूर करता है कि हिन्दी सिनेमा में जब हर लम्हा के लिए गीत मौजूद है तो वैलेंटाइन डे पर लिखा गीत 70 वर्षों के बाद क्यों सुनाई पड़ता है। हालांकि आपने कोई दावा नहीं किया है। फिर भी ऐसा लगता है कि आप काफी हद तक सही हैं