Monday, February 2, 2009

सस्ता संदेश जंग का

मुंबई में हुए आतंकवादी हमलों को बालीवुड के कई निर्माता-निर्देशक संजीदगी से नहीं ले पाए। उनपर व्यवसाय हावी है। उन्हें इस घटना में व्यावसाय नजर आ रहा है। हाल ही में ऐसी खबर आई थी कि बालीवुड के कई निर्माता-निर्देशक इस घटना को देर-सबेर रुपहले परदे पर उतारने के लिए नामों का पंजीकरण करा रहे हैं।

हालांकि सिनेमा के शुरुआती दिनों से ही देशभक्ति या जंगी जज्बों से सराबोर युद्ध विषयक फिल्में बनती रही हैं। एलओसी, बार्डर के आने से पहले ललकार, हकीकत और उसने कहा था जैसी फिल्में प्रदर्शित हो चुकी थीं। जिसे दर्शकों ने खूब सराहा था। इन फिल्में में देशप्रेम की भावना से ओत-प्रोत होकर सैनिकों को लड़ते दिखाया गया है। साथ ही युद्ध की विभीषिका में मानवीय संबंधों को भी उजागर किया गया है।

इन फिल्में का उद्देश्य लोगों की भावनाओं को भड़काना नहीं था, बल्कि उन संवेदनाओं को प्रकट करना था, जो इस भयावह माहौल में स्वतः पैदा लेती है। देश में जब नक्सली व आतंकवादी समस्याएं पैदा हुईं तो कुछ सतर्क निर्माता-निर्देशकों की निगाहें उधर भी गईं और सार्थक फिल्में बनीं। पर ऐसी फिल्में अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं, जिनमें माचिस, यहां, हजारों ख्वाहिशें ऐसी व ए वेडनस-डे जैसी कुछ फिल्मों के नाम याद आते हैं।

कुछ साल पहले जब बार्डर और एलओसी जैसी फिल्में आई थीं तो कई सवाल उठे थे। लोगों का मानना था कि भाषाई स्तर पर ऐसी फिल्मों की गरिमा कम हुई है। तात्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री जमाली ने भी सार्क सम्मेलन के दौरान इन फिल्मों की भाषा पर आपत्ति दर्ज की थी। यह लाजमी था। क्योंकि, जमाना जानता है कि कला का उद्देश्य रुचि व विचार को परिष्कृत करना है और सिनेमा एक कला है। केवल व्यवसाय नहीं।

गत कुछ वर्षों से बालीवुड देशभक्ति के जज्बों को भुनाने की जिस बारीक कोशिश में लगा है, वहा काबिलेगौर है। फिल्म रंग दे बसंती तो इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। इन दिनों देशभक्ति से लबरेज ज्यादातर फिल्में मात्र सस्ता और उन्मादी मनोरंजन परोस रही हैं।

यकीनन, बालीवुड में कुछ लोगों द्वारा मुल्क के दुखते रग को भुनाने की यह बेचैनी नई आशंका को जन्म देती है। मंबई आतंकवादी हमले पर फिल्म तैयार करने के लिए नाम पंजीकृत कराने की यह प्रक्रिया इसे और गहरा देती है।

3 comments:

विनय said...

स्वस्थ समीक्षा

----------
ज़रूर पढ़ें:
हिन्द-युग्म: आनन्द बक्षी पर विशेष लेख

गिरीन्द्र नाथ झा said...

बृजेश भाई इस प्रकरण पर आप का क्या सोचना है- क्या फिल्म बननी चाहिए ?

संगीता पुरी said...

किसी भी घटना पर फिल्‍म बनने में कोई बुराई तो नहीं ...... देखना यह है कि इसे किस ढंग से पेश किया जाता है।