Tuesday, June 9, 2009

यूं तैयार हुआ फिल्म उत्सव का संगीत



शशिकपूर की इस फिल्म का निर्देशन गिरीश कर्नाड कर रहे थे। तब लोकप्रिय व्यावसायिक फिल्मों में संगीत देकर ख्याति पा चुके लक्ष्मीकांत जब कभी उन्हें नई पर चालू किस्म की धुन सुनाते तो वे बड़े अदब से कहते, “यह धुन बड़ी उम्दा है, पर इस फिल्म के लिए प्रासंगिक नहीं है।”


ऐसे में लक्ष्मीकांत को कड़ी मेहनत करनी पड़ी, तब कहीं उत्सव पूरी हुई। वे अपनी इस फिल्म के संगीत को सबसे उम्दा मानते हैं। दरअसल, कर्नाड की दृष्टि और लक्ष्मीकांत के प्रयासों ने ऐसे बेहतरी संगीत की रचना करवा दी।
यदि आप इस फिल्म में लता और आशा का गया गीत – “रात शुरू होती है, आधी रात को... ” सुनेंगे, तब मालूम होगा कि समानांतर सिनेमा का संगीत कितना गहरा और उम्दा है।

1 comment:

rajesh said...

आपने सही कहानी सुनाई। ऐसा लगता है कि उत्सव के गीत कभी पुराने नहीं होने वाले हैं।