Thursday, July 1, 2010

नारियल पर बात निकली है तो -


चंद रोज पहले दीवान के नामदार लेखक (विनीत कुमार) ने दिल्ली मेट्रो रेलवे के बाबत एक पोस्ट जारी किया। वह नई लाइन की शुरुआत पर तिलक लगाने व नारियर फोड़ने से संबंधित पोस्ट था। उन्होंने हद तक गहरे सवाल उठाए। हम उनके लेखनी की कद्र करते हैं। पर क्या है कि कुछ अपने मन में भी है। सोचता हूं कह दूं।

हमारी शुरुआती पढ़ाई भागलपूर के जिस स्कूल (सीएमएस हाई स्कूल) में हुई वहां कोई पूजा वगैरह नहीं होती थी। अब भी शायद यही आलम है। स्कूल में सरस्वती की मूर्ति भी परिसर से बाहर एक कोने में बैठाई जाती थी। यह उस प्रदेश की बात है, जहां सरस्वती पूजा का छात्रों के लिए खासा महत्व है। इसके बावजूद स्कूल में कभी ऐसे सवाल नहीं उठे कि आखिर सरस्वती की मूर्ति परिसर के बाहर क्यों बिठाई जाती है ? सूबे में ऐसे बहुतेरे स्कूल हैं जहां सरस्वती पूजा नहीं होती है। पर यह सवाल कोई महत्व नहीं रखता कि क्यों नहीं होती या फिर क्यों होती है? दरअसल चर्च के उन अर्ध सरकारी स्कूलों में यह रिवाज बन गया है और इससे कोई फर्क भी नहीं पड़ता है। अतः इससे जुड़े सभी सवाल गैर जरूरी हैं। पर, नारियल फोड़ने पर सवाल होंगे तो वहां भी बाल मन में सवाल उठ सकते हैं। वह स्थिति यकीनन अभी से बुरी होगी।

मैं जिस स्कूल की चर्चा कर रहा था ठीक उसी विद्यालय के सामने एक चौंक (चौराहा) है। नाम है आदमपुर चौंक। वहां जामने से मस्जिद नूमा आकार खड़ा है। एक दफा कुछ लोगों ने वहां शिवजी के प्रतीक को बैठा दिया। गौर करें.इस पर कोई हंगामा नहीं हुआ, जिन लोगों ने ऐसा किया था वे हंसी के पात्र हो गए। अब वह स्थान पूर्ववत है। वहां कई नारियल फोड़े गए थे, पर कोई असर नहीं हुआ।

खैर, इसे भी रहने दें। इस मुल्क में करोड़ों आंगन हैं जहां तुलसी के पौधे लगे हैं। इनमें कई लोग पौधे को प्रणाम कर बाहर निकलते हैं और कई यूं ही। पर इन लोगों में सांप्रदायिक तत्व ढूंढ़ना गैरवाजिब ही होगा। देश की धर्मनिरपेक्षता इतनी कमजोर नहीं है। थोड़ा पहले कह रहा हूं पर जरूरी है- यदि इस देश में राम मंदिर बल से बनाने की कोशिश हुई तो उसका वही हाल होगा जो आदमपुर के उक्त स्थान को हो गया है। क्योंकि आस्था थोपी नहीं जा सकती, वह तो पैदा लेती है। वहां हिंसा का कोई मोल नहीं होता है। वहां तो सिर्फ और सिर्फ सूर, कबीर तुलसी व जायसी की भक्ति का बोलबाला है। देश में सांप्रदायिक हिंसा का जो इतिहास है, उसकी वजहें दूसरी हैं। हां एक सच यह है कि कुछ लोग उस आस्था तक को चोट पहुंचाने में लगे हैं। इससे गंभीर समस्या पैदा हो सकती है।



इस देश में ऊपर से लादे गए धर्मनिरपेक्षता शब्द से पहले भी लोग मजे में रहते थे। तब कोई ट्रेन जलाई गई हो, अहमदाबाद हुआ हो यह जानकार बताएंगे। पर यह सच है तब भी गांव के इस देश में मस्जिद भी थे और मंदिर भी। कई-कई स्थानों पर चर्च भी। दूसरे भी थे। आज भी हैं, पर सबों के मन में एक अटकाव है। ऐसे माहौल में सतर्क लेखन की जरूरत है।

अगला भाग अगले दिन

शुक्रिया

1 comment:

Mired Mirage said...

रोचक चर्चा है।
घुघूती बासूती