Wednesday, June 1, 2011

तीसरे प्रेस आयोग पर बहस शुरू


“आज हम तीसरे प्रेस आयोग की बात इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि स्वतंत्र होकर काम करना चाहते हैं। स्वच्छंद हो कर नहीं।”
दिल्ली स्थित प्रज्ञा संस्थान में तीसरे प्रेस आयोग के गठन की मांग को लेकर चर्चा के दौरान वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने यह बात कही। तब वे एक युवा पत्रकार के सवालों का जवाब दे रहे थे। दरअसल, ऐसा कम देखने में आता है कि किसी बड़ी योजना को लेकर गंभीर विचार मंथन चल रहा हो और उक्त क्षेत्र के नए लोग भी वहां मौजूद हों। पर 29 मई, 2011 को प्रज्ञा संस्थान के सभागार में ऐसा ही मंजर था। यहां वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी विविध प्रसंगों का हवाला देते हुए उस वस्तुस्थिति को सामने रख रहे थे, जिससे साफ हो चला था कि तीसरे प्रेस आयोग का गठन समय की जरूर है।

ताज्जुब की बात है कि इस गंभीर चर्चा में जितनी संख्या वरिष्ठ पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की थी, उतनी ही संख्या में युवा पत्रकार मौजूद थे। और वे यहां मूक दर्शक या श्रोता मात्र नहीं थे, बल्कि अवसर मिला तो खुलकर हस्तक्षेप भी किया। इससे पहले हमने सराय/सीएसडीएस में भी यह आलम देखा है। वहां रविकांत जैसे लोग भी ऐसा ही हदतोड़ रवैया अख्तियार करते रहे हैं। दरअसल, इन संस्थाओं का यही रिवाज है। युवाओं में इनकी पहचान यूं ही नहीं है। यहां सभी बराबर महत्व पाते हैं। तभी तो युवा विद्रोही टोली स्वतंत्र होकर काम करती हुई इन संस्थाओं में अकसर दिख जाती है।

खैर, प्रज्ञा संस्थान और प्रभाष परंपरा न्यास के तत्वावधान में आयोजित यह तीसरी विचार गोष्ठी थी। इस बार तीसरे प्रेस आयोग के औचित्य पर विचार किया जा रहा था। रामशरण जोशी अपना बीज वक्तव्य दे रहे थे। इस दौरान उन्होंने कहा कि आज प्रेस व मीडिया यानी अखबार, पत्रिका आदि प्रॉडक्ट में रूपांतरित हो चुके हैं। इसमें मटमैली पूंजी का प्रवेश बड़े स्तर पर हो गया है। संपादक नाम की संस्था पर परोक्ष रूप से नियंत्रण रखा जा रहा है। ब्रांड मैनेजर का उदय हो गया है। हालांकि, कई पत्रकारों को ऊंची पगार मिलती है, पर नौकरी की अनिश्चितता बनी रहती है। कुल मिलाकर स्थितियां बिलकुल बदल चुकी हैं। पहले और दूसरे प्रेस आयोग की सिफारिशें अब प्रासंगित नहीं हैं सो तीसरे प्रेस आयोग का गठन समय की जरूर है।

उन्होंने कहा कि अखबारी संस्करणों के इस दौर में समाचारों व मुद्दों का अति स्थानीयकरण एक रणनीति के तहत किया जा रहा है। यह उचित नहीं है। भारतीय समाचार एजेंसियों का अवसान हो चुका है। अपने लंबे वक्तव्य में जोशी ने 19 ऐसे प्रस्ताव सुझाए जिसपर तीसरे प्रेस आयोग द्वारा विचार करने की जरूर है। पहली बात उन्होंने यह कही कि प्रेस परिषद को वैधानिक दृष्टि से शक्ति सम्पन्न बनाया जाए। फिलहाल वह एक ऐसा सांप है, जिससे पास दांत ही नहीं है। दूसरी बात यह कि एक मीडिया समूह को एक ही माध्यम रखने की इजाजत मिले। वह प्रिंट हो सकता है या फिर इलेक्ट्रॉनिक। उन्होंने बोर्ड ऑफ ट्रस्टी के गठन की बात भी उठाई, जो प्रबंधन और संपादक के बीच महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा ताकि संपादकीय अधिकार की रक्षा हो सके। इतना ही नहीं अखबारों के संस्करणों की संख्या निश्चित करना, भाषाई समाचार एजेंसियों की स्थापना, लघु समाचर पत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करना, प्रेस विकास आयोग की स्थापना जैसे प्रस्ताव भी उन्होंने दिए।

जब सुझाव का दौर आया तो रामबहादुर राय ने कहा कि प्रिंट मीडिया में विदेशी पूंजी के निवेश पर गहन अध्ययन होना चाहिए और फिर इसपर रोक लगनी चाहिए। साथ ही इस बात की पड़ताल होनी चाहिए कि किन परिस्थितियों में 25 जून, 2002 को वाजपेयी सरकार ने प्रिंट मीडिया में 26 प्रतिशत विदेशी पूंजी की इजाजत दी। और अब मनमोहन सरकार उसे 26 प्रतिशत को बढ़ाकर 49 प्रतिशत करने जा रही है। इतिहास बताते हुए राय ने कहा कि पहले प्रेस आयोग का गठन 1952 में हुआ था। 1955 में उसने अपनी सिफारिशें दीं। तब प्रिंट मीडिया में विदेशी पूंजी की इजाजत न देने की बात कही गई थी, जिसे नेहरू की सरकार ने माना था। तब विशेष कारणवश मात्र रिडर डाइजेस्ट को ही इसकी इजाजत मिली थी।
गौरतलब है कि दूसरे प्रेस आयोग का गठन 1978 में किया गया था, जिसने अपनी रिपोर्ट 1982 में सौंपी। तब भी प्रिंट मीडिया में विदेशी पूंजी के निवेश की इजाजत नहीं थी। विचार गोष्ठी का संचालन करते हुए राय ने कहा, “आज पत्रकारिता के मुक्ति की बात हो रही है। और इसके लिए ही हम प्रेस आयोग की बात कर रहे हैं। इस विचार मंथन से जो प्रस्ताव तैयार होगा, उसके आलोक में संसद को ज्ञापन देंगे और तीसरे प्रेस आयोग के गठन की मांग करेंगे।” विचार गोष्ठी में वरिष्ठ पत्रकार व गांधीवादी विचारक देवदत्त, जवाहरलाल कौल और बी.बी.कुमार ने भी अपने सुझाव किए। पत्रकार अवधेश कुमार ने जहां वर्तमान पत्रकारिता पर घोर असंतोष व्यक्त किया, वहीं प्रभाष परंपरा न्यास के ट्रस्टी एन.एन ओझा ने कहा कि कोई भी खबर बाजार से गुजरकर ही पाठक तक पहुंचता है। हमें इन बिंदुओं पर भी विचार करना होगा। इस दौरान कई युवा पत्रकारों ने भी अपने विचार व्यक्त किए। सोपान द स्टेप पत्रिका से जुड़े आशीष कुमार अंशु ने कहा कि उन पत्रकारों को भी अपनी संपत्ति सार्वजनिक करनी चाहिए जो पीआईबी से जुड़े हैं और सरकारी सुविधा का भोग करते हैं। वहीं प्रथम प्रवक्ता से जुड़ी श्रुति अवस्थी ने कहा कि आज वह युवा पत्रकार कहां जाए जो किसी बड़े पत्रकारों को देख उनसा बनना चाहता तो है पर संस्थान स्वतंत्र होकर काम करने की इजाजत नहीं देता।

इस घनघोर बहस के बाद प्रस्तावना को और स्पष्ट व नए बिंदुओं को जोड़ने की बात रामशरण जोशी ने कही। कहा गया कि इसका मुकम्मल रूप 12 जून की बैठक में रखा जाएगा। उसी दिन आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी पर उनके शिष्य विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा लिखी पुस्तक ‘व्योमकेश दरवेश’ पर चर्चा होगी।

1 comment:

गिरीन्द्र नाथ झा said...

रामशरन जोशी जी ने तो बड़ी ताकतवर बात कह दी ब्रांड मैनेजर का उदय हो गया है