Thursday, August 27, 2009

सड़क के पार



मुझे आदमी का सड़क पार करना हमेशा अच्छा लगता है।
क्योंकि,
इस तरह एक उम्मीद-सी होती है
कि
दुनिया जो इस तरफ है शायद उससे कुछ बेहतर हो, सड़क के उस तरफ।


गिरींद्र के ब्लॉग पर यह पंक्ति टंगी है। हर बार नई मालूम पड़ती है। सो यहं भी लागा दिया।

2 comments:

manoj yadav said...

brajesh ji how r u? ur phone is not working.plz do call me my new no is 9990978637

अमलेन्दु उपाध्याय said...

khambhe se utar kar cycle par chadh gaye?