
उमराव-जान फिल्म मुझे काफी पसंद आती है और बार-बार देखता हूं। इसके गीत काफी सफल हुए थे। आज भी सुने जाते हैं। इस बाबत कुछ बातें याद आ गईं—
"इन आंखों की मस्ती के दीवाने हजारों हैं"
इस गीत को शहरयार ने उमराव-जान (1982) के लिए लिखकर
बड़ा नाम कमाया था किन्तु, दूसरी फिल्म की इक और पंक्ति याद आ रही है–
"मस्ताना निगाहों के दीवाने हजारों हैं"
फिल्म - गरीबी ( रणजीत मुवीटोन,मुम्बई) 1949 । गीतकार- शेवन रिजवी ।
इसके अलावा कई फिल्मी गीतें की पंक्तियां दिमाग में चक्कर लगा रही हैं, जिसे गीत के तौर पर कई बार
दुहराया-तिहराया गया–
1 चना-जोर गरम बाबू मैं लाया मजेदार,
चना-जोर गरम…………॥
फिल्म– बंधन ( बाम्बे टाकीज, मुम्बई) 1940 । गीतकार– प्रदीप ।
2 जोर गरम बाबू मुलायम मजेदार,
चना-जोर गरम……॥
फिल्म– छोर छोरी ,1955। गीतकार– केदार शर्मा ।
3 चाना-जोर गरम बाबू…………
फिल्म- क्रान्ति । गीतकार- आनंद बख्शी।
इन पंक्तियों में जरा सा बदलाव कर के बड़े हुनर का परिचय दिया गया है।
ऐसे और भी उदाहरण हैं। पड़ताल जारी है।
ब्रजेश झा
09350975445
3 comments:
चना जोर गरम में तो लगता है हूबहू वही गीत उतार दिया. वैसे इंडस्ट्री में कुछ लोग चोरी करने में बदनाम हैं ही.
फिल्मी गीतों की दुनिया में यदि बात की जाए तो बरबरस कई गीतें एक साथ जेहन में धमाल मचान लगती है। ये गीतें अधिकतर क्लासिक समय की फिल्मों की होती है, ऐसी मेरा मानना है, और उन्हीं गीतों के सफर को आप आगे बढ़ा रहे हैं।
इस बार बेनेगल साब की वेलकम टू सज्जनपुर में भी कुछ अच्छे गीत सुने जा सकते हैं।
sirf do lines ke dohraav ko aap chori ya nakal kaise kah sakte hain? waise bhi hindi films mein likhne ke liye seemit vishay hain aur shabdaavali bhi . to kitni vividhta ho sakti hai? Aur kya poore geet ke shabd ya bhaav milte-julte hain? kya ise 'Nadiya ke paar' aur 'Hum aapke hain kaun' ki tarah remake nahin kah sakte.
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