Saturday, May 29, 2010

अजीब विरोधाभास


कीर्ति चौधरी की एक कविता पढ़ें। फिर याद करें, राष्ट्रमंडल खेल के बाबत किए जा रहे विकास कार्यों को। यकीनन, अजीब विरोधाभास पाएंगे।

प्रगति

अभी कुछ ही दिन तो बीते
इधर से निकले
कैसा सुनसान था !...

और अब ये नए रास्ते हर ओर
छज्जों, बालकनियों से उठता हुआ शोर
लॉन पर खेलती
चमकदार आंखों वाली बच्ची
अजनबी चेहरे
फिजा में भी
जिंदगी के बोल जैसे घुले-मिले।
अभी कुछ ही दिन तो बीते
इधर से निकले।
इतने में ही कोई बस्ती बस गई,
लगता है।

आज कीर्ति चौधरी होतीं तो इस विकास पर क्या कहतीं।

3 comments:

संजय कुमार चौरसिया said...

insan ki jindagi ab bastiyon main tabdeel ho rahi hai http://sanjaykuamr.blogspot.com/

संजय कुमार चौरसिया said...

insan ki jindagi ab bastiyon main tabdeel ho rahi hai http://sanjaykuamr.blogspot.com/

माधव said...

really strange