
देश की राजधानी में छात्रों के बीच त्योहारों के मूल चरित्र की निशानियां गुम होती जा रही हैं। यहां थोपी गई तहजीब तेजी से जड़ पकड़ती दिख रही है। होली है और ठंडाई की जगह ब्रांड हावी है।
दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले ज्यादातर पूरिबया छात्र होली के दिन ठंडाई पीने वाले ठेठ देसी संस्कृति के रिवाज से चिपके होते थे। अब नजारे बदले बदले से हैं। विश्वविद्यालय के ही छात्र बदलाते हैं कि ठंडाई का अपना मजा है जनाब ! पर इसे तैयार करना बड़े झमेले का काम है। इसलिए होली के दिन ठंडाई के मुरीद भी शराब से काम चला लेते हैं। लेकिन कोशिश रहती है कि ठंडाई का जुगाड़ हो जाए। दरअसल कैंपस में जुगाड़ा का बड़ा बोलबाला है।
बात ज्यादा पुरानी नहीं है जब परिसर में स्थित सभी होस्टलों में होली के दिन ठंडाई तैयार किया जाने का रिवाज था। नए पुराने सभी छात्रों की मंडली लगती थी। देशी ठाठ के राग का बोलवाल होता था। ऐसा न था कि लड़के शराब के मुरीद न थे। पर वह ठंडाई के मामाले में हदतोड़ी थे। यारो, मैं कहना इतना भर चाहता हूं कि उस वक्त शराब पर ठंडाई हावी हुआ करता था और तब जमता था रंग।
लेकिन गत एक दशक में स्थितियां बदली हैं। नए छात्रों में एक अलग किस्म की नफासत है। वह बेहद तहजीबयाफ्ता हैं। ठंडाई आज भी बनाई जाती है। उसके रसिक आज भी हैं। पर औसतन कम।
ब्रजेश झा
Saturday, March 22, 2008
भांग की जगह ब्रांड का बोलवाला
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2 comments:
क्या बात है जनाब सही कहा है।
tarif ka ye aandaz mazedar hai zanab..........
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