Friday, October 5, 2007

धोख ही धोख

यदि जनसत्ता अखबार आप पढ़ते होंगे तो यकीनन प्रसून लतांत की लेखनी से पाला पड़ा होगा। जहां आजादी के साठ साल बाद कुछ खास न हुआ वहां इनकी कलम चलती है।
तो इनका एक लेख मौजूद है-

पिछले सप्ताह कालाहांडी में फिर से आदिवासियों के भूख से मरने की खबर बाहर आई। मीडिया के लोग वहां पहुचे तो स्थानीय नेताओं ने आदिवासियों पर दबाव बनाया कि वे मीडिया के सामने हकीकत न खोलें। मीडिया की टीम जहां पहुंचती, स्थानीय नेता भी वहां पहुंच जाते और बयान बदलवाने की हर कोशिश करते। लेकिन, आदिवासियों ने उनके मनसूबे सफल नहीं होने दिए। उन्होंने बताया कि किस तरह आनाज की आपूर्ति पिछले कुछ महीने से नहीं की गई है और उन्हें कुछ जंगली फलों और बीजों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। क्षेत्र के विकास की स्थिति ऐसी है कि पिछले कई वर्षों से न तो यहां सड़कें हैं, न पीने का पानी, न खाने के वास्ते अनाज। सिंचाई और खेती के साधन नहीं हैं। रोजगार, चिकित्सा आदी की उचित व्यवस्था तक नहीं है। ऐसा नहीं है कि सरकार ने पैसा नहीं दिया। केंद्र सरकार ने इस क्षेत्र के विकास के लिए राज्य सरकार को 3500 करोड़ रुपए दिए, पर ये पैसे सिर्फ कागजों में ही खर्च हुए दिखाए गए। जमीनी हकीकत यही है कि पीने के पानी पर करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद आदिवासी झरने और तालाबों का पानी पीकर बीमार हुए और महामारी फैली।
कालाहांडी के इस सच की तरह ही छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, झारखंड जैसे अन्य राज्यों के सुदूर आदिवासी अंचलों का यही हाल है। सुदूर जंगलों में रहने के कारण सरकारी अधिकारी, स्थानीय नेता और ठेकेदार आदिवासियों के नाम पर आने वाले पैसे गटक जाते हैं। इन्हें ऐसा करने में कोई संकोच भी इसलिए नहीं होता कि अधिकारी सुदूर और दुर्गम आदिवासी इलाके में विकास का जायजा लेने जाते ही नहीं हैं। बड़े नेता भी सिर्फ वोट के दिनों में ही जाते हैं। इसी कारण पिछले कुछ दशकों से नक्सलवाद उनके क्षेत्र में पैठ बनाता ज रहा है।
और यहां शांति से जीवन-यापन करने वाले आदिवासियों के इलाके में खून-खराबा हो रहा है। अब तो हर वह इलाका नक्सलवाद पीड़ित हो गया है जहां आदिवासी बहुतायत में रहते हैं। हिन्दी के प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह पिछले दिनों एक संगोष्ठी में यही सवाल उठा रहे थे कि आखिर क्या वजह है कि जहां आदिवासी बहुतायत में हैं वहीं नक्सलवाद पनप रहा है। सिंह मानते हैं कि संविधान में जो चीजें इन आदिवासियों के
लिए तय की गई, उन्हें केंन्द्र और राज्य दोनों ने नहीं माना। उनका कहना है कि सिर्फ अलग राज्य बना देने से उनका विकास नहीं हो सकता। उन्होंने आदिवासी क्षेत्रों की सभी तरह की समस्याओं के समाधान के लिए अकेले राज्य को जिम्मेदार बना देने के लिए केंद्र सरकार को कोसा। साथ ही यह कहा कि छत्तीसगढ़ में सलवा जुडुम माओवादियों का जवाब नहीं है।
समाजवादी रघु ठाकुर कहते हैं कि आज नक्सलवाद किसी खास विचाधारा पर जिंदा नहीं है। इसमें शामिल लोग हत्यारे हो गए हैं। उनके कारण आज जहां भी और जिसकी ओर से भी गोलियां चलाई जाती हैं उनसे मारे आदिवासी ही जाते हैं। शांति से प्राकृतिक साधनों के सहारे जीवन-यापन करने वाले आदिवासियों का इलाका आतंक के साए में आ गया है। गांधीवादी पीवी राजगोपाल कहते हैं कि नक्सलवाद से निजात पाने के लिए जरूरी है आदिवासी अंचलों के संसाधनों पर आदिवासियों का अधिकार हो और उनकी श्रम शक्ति से विकास की नई धारा शुरू की जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि आदिवासियों के अंचल के संसाधनों पर जिंदल घरानों का अधिकार है और आदिवासी पलायन कर पंजाब और रायपुर की सड़कों पर ईंट ढोने के काम में लगे हुए हैं।
छत्तीसगढ़ के इलाके में शंकर गुहा नियोगी ही एक नेता हुए, जिन्होंने वास्तव में आदिवासियों की नब्ज पकड़ी और उन्हें सही विकास की धारा में आगे लेकर चल पड़े थे। नियोगी की कारगर भूमिका से आदिवासियों के विकास की नई धारा शुरू हुई, पर उन्हें भी शराब माफिया ने मौत की नींद सुला दिया। नियोगी का कसूर यह था कि उन्होंने आदिवासियों को शराब से तौबा करवा कर उनकी गाढ़ी कमाई के पैसों को शराब माफिया की झोली में जाने से रोका था। नियोगी के प्रयास देश के दूसरे आदिवासी इलाके
के लिए भी विकास की मिसाल बनते जा रहे थे। आदिवासियों के विकास के लिए सिर्फ योजना बना देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उन्हें विकास की मुख्यधारा में लाने के पहले उपयुक्त माहौल बना देने की जरूरत है। यह काम वही कर सकते हैं जो वास्तव में दार्शनिक के साथ आदिवासियों के दोस्त और मार्गदर्शक भी हों। यह क्षमता नियोगी में थी। और यही वजह है कि उनकी आवाज पर आदिवासी संगठित होते थे और खुद में बदलाव लाने के लिए तैयार हो जाते थे। लेकिन, राज्य सरकार ने नियोगी के प्रयोगों को अमल में लाने की बजाय भ्रष्ट अधिकारियों, ठेकेदारों और अपराधियों को तवज्जो दी।
आजादी के साठ साल तक आदिवासियों के इलाके में विकास को प्राथमिकता नहीं दी गई, बल्कि उनके इलाके के संसाधनों का खूब दोहन किया गया। इतना ही नहीं, उन्हें बाहर से आए लोगों के धोखे का भी शिकार होना पड़ा। राजनेताओं ने भी जम कर उनका शोषण किया। आज जब उनके क्षेत्र में नक्सलवाद हावी हो गया है तो प्रमुख राजनैतिक पार्टियां एक- दूसरे के कार्यकाल को कोस रही हैं। पर उपाय नहीं
खोज रही हैं, जिनसे वे ठीक से जीवन-यापन भी कर सकें। लाखों आदिवासियों को जमीन के पट्टे नहीं मिले हैं और पट्टे के अभाव में उनकी जमीन भी उनके हाथ से चली जा रही है। जंगलों से तो उन्हें पहले से ही खदेड़ा जा रहा है। आदिवासी शोध संस्थानों में न जाने कितने शोध हुए, पर उनमें से किसी भी शोध को अमल में लाने की किसी भी सरकार ने जरूरत महसूस नहीं की। वे शोध आज भी धूल फांक रहे है.

2 comments:

आशीष said...

bahut khoob...khas ,,,mumabi me bhi jansatta padne ko milta?.

Sanjeet Tripathi said...

सही लिखा है!