Monday, September 3, 2007

पनियां आ रहलो हैं.

पश्चिम चंपारण के सिकटा में रहने वाले लोग जमीन से ऊपर हैं। आखिर जमीन पर पांव रखें भी तो कैसे! वहां तो पानी फैला है। यही हाल उत्तरी बिहार के ज्यादातर ग्रामीण इलाकों का है जो लोग जमीन से ऊपर सतह की तलाश कर सके वो बच गए, बाकी बह गए। जानवरों की स्थिति और भी बुरी रही। अब मृत्यु के तरल दूत से इन्हें कौन बचाए.....। सरकार मूकदर्शक बनी हुई है। मुख्यमंत्री मारीशस से तफरीह करके आए हैं। हवा में हवाई सर्वेक्षण करते हुए मनभावन टिप्पणियां कर रहे हैं। कहते है--आग लगने पर कुआं खोदा जा रहा है। अब इनसे कौन पूछे कि भई! कुआं पहले क्यों नहीं खोदवा लिया गया था। आखिर लोग तो आपके ही हैं।
खैर! हमारी ट्रेन मोकामा से भागलपुर की ओर तेजी से बढ़ रही है। पानी पटरी के दोनों तरफ फैला है। दूर तक यही स्थिति है। कई गांव अधडूबे दिख रहे हैं। हम सहयात्री खजूर के पेड़ को देखकर पानी की गहराई का अंदाजा लगा रहे हैं। ट्रेन पूरा एक घंटा देरी के बावजूद अपनी रफ्तार पकड़े हुए है। कौन ससुरा कहेगा कि ट्रेन देरी से चल रही है, यहां घंटा भर लेट भी राइट-टाइम है। दरअसल, ऐसी ही सरकारी प्रवृत्तियां बाढ़ को अपने भयावह स्थिति तक पहुंचने में सहयोग देती है। उत्तर बिहार के ज्यादातर शहर टापू बन गए हैं। और देहाती इलाके डूबे हुए हैं।
इन इलाकों में राज्य प्रशासन की गाड़ियां चक्कर लगा रही हैं। लोग सुरक्षित स्थानों की ओर भाग रहे हैं। बेचारे कहां जाएं। क्या करें! बाढ़ का पानी घर में घुस आया है। कोई चाक-चौबंद व्यवस्था नहीं है। ऊपर से लगातार हो रही बारिश से निपटने का कोई बंदोबस्त भी नहीं है।
ऐसी ही विनाशलीला का भयावह रूप खगड़िया, बेगूसराय के ग्रामीण इलाकों में है। ऐसा लगातार सुनने को मिल रहा है। सहयात्रियों के बीच गरमागरम बहस जारी है। स्थानीय लोग बतलाते हैं कि यदि प्रशासन भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखकर तैयार होता तो बाढ़ ग्रस्त इलाकों में मौत का ग्राफ इतना ऊपर नहीं जाता। संचार माध्यम से ऐसी जानकारी मिल रही है कि राज्य के 17 जिलों में एक करोड़ से अधिक आबादी बाढ़ की चपेट में है। साढ़े सात लाख हेक्टेयर खेत में लगी फसल बर्बाद हुई है। और 57 लोगों की मृत्यु हो चुकी है।
विक्रमशीला ट्रेन भागलपुर पहुंचने वाली है। बाढ़ का पानी अब भी दिखाई दे रहा है। घर पहुंचने की जल्दी है। देखूं! गांव की क्या स्थिति है? अपना देश आजादी के 60 वर्ष पूरा कर चुका है। स्थितियां पहले साल जैसी हैं। ताज्जुब की बात है बाढ़ से बचने के लिए जहां कहीं थोड़े बहुत उपाय किए गए हैं, वहां तो और भी भयानक बाढ़ आई है। इस वर्ष देश के 20 राज्यों में 1200 लोग बाढ़ की वजह से मर चुके हैं। तीन करोड़ से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं। सत्तार हजार के करीब पशु बह गए हैं। और करोड़ों की सम्पत्ति तबाह हो गई है। आए दिन आंकड़ों के साथ ऐसी खबरें खबारों में पढ़ रहा हूं। माथा खरब हो गया है।गांव में रतजगा चल रहा है। घर की छप्पड़ पर दिन गुजर रहा है। हाय रे विकास...। दूर से आवाजें आ रहीं हैं—भा..ग-भा..ग। पनियां आ रहलो है. आ..गैलो है। भाग..भा..ग ...।

ब्रजेश झा

3 comments:

गिरीन्द्र नाथ झा said...

saach kahti repotarz,
jante hai padh kar kya yaad aaya,
renu ke dwara likhi gayee badh par report jo dhatamyug me parkaseet hui thi

Shastri JC Philip said...

इस तरह विवरणात्मक खबर के द्वारा वहां की स्थिति से आगाह करने के लिये आभार -- शास्त्री जे सी फिलिप

मेरा स्वप्न: सन 2010 तक 50,000 हिन्दी चिट्ठाकार एवं,
2020 में एक करोड हिन्दी चिट्ठाकार !!

rajesh said...

रपट पढ़कर पुराने दिन याद आ गए. वो गांव की
दुनिया थी. आपने तो तस्वीर ही खींच दी.