Thursday, October 20, 2011

वे आजाद थे और आजाद रहे


“माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर । कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ॥” वह चिनमय मिशन ऑडिटोरियम था, जहां कबीर की ये वाणी गूंज रही थी। लोग बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद की शोक सभा में एकत्र हुए थे। तारीख आठ अक्टूबर थी। इस मौके पर लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने उन दिनों को याद किया जब उनकी पहली बार आजाद से मुलाकात हुई थी। उन्होंने कहा कि आजाद जी ने ताउम्र मुल्यों की राजनीति की। वहां कई और महत्वपूर्ण लोग थे। गृहमंत्री पी.चिदंबरम और दूसरे कई कांग्रेसी नेता भी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने आए। भागलपुर से लोकसभा सांसद शाहनवाज हुसैन भी थे। दरअसल, यही वह संसदीय क्षेत्र है जहां से आजाद ने राजनीति शुरू की थी। चुनकर संसद पहुंचे। पर 1989 में जब भागलपुर की जनता ने उन्हें नकार दिया तो आजाद ने सक्रिय राजनीति से ही संन्यास ले लिया। भारतीय राजनीति में ऐसे उदाहरण कम हैं।

बहरहाल, आजाद का निधन 4 अक्टूबर को दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में हो गया था। वे पिछले कुछ समय से बीमार थे और एम्स में भर्ती थे। वे पहली बार 1957 में भागलपुर संसदीय क्षेत्र से चुनकर सांसद पहुंचे थे। हालांकि, 1977 में कांग्रेस के खिलाफ हवा चली तो वे हार गए। पर भागलपुर की जनता ने 1980 में उन्हें पुन: अपना प्रतिनिधि चुना। वे फरवरी 1988 से लेकर जनवरी 1989 तक लगभग ग्यारह महीने बिहार के मुख्यमंत्री पद पर भी रहे। हालांकि, उनकी राजनीतिक सक्रियता अपने प्रदेश से अधिक केन्द्रीय स्तर पर देखी जाती थी। उनकी पहचान एक ओजस्वी वक्ता के साथ-साथ किसी के भी मुंह पर खरी-खरी सुना देने की थी। इसके कई किस्से भागलपुर में मशहूर हैं।

इन सब बातों के बावजूद 1989 के भागलपुर दंगे ने वहां की जनता और आजाद के बीच एक लकीन खींच दी। इससे आजाद काफी आहत हुए। उन्होंने राजनीति से ही संन्यास ले लिया। हालांकि, भागलपुर की जनता अंत तक उनकी राह देखती रही। उनका स्थान और दर्जा किसी दूसरे को नहीं दिया। पर वे नहीं आए। वे आजाद थे और आजाद रहे।

Friday, October 7, 2011

2जी घोटाले पर डॉ.सुब्रह्मण्यम स्वामी से बातचीत

फिलहाल देश में भ्रष्टाचार को रोकने के लिख सैद्धांतिक बहस चल रही है। आंदोलन हो रहे हैं। इस माहौल में डॉ.सुब्रह्मण्यम स्वामी मौजूदा कानून से ही भ्रष्टाचारियों को कैसे सजा दिलवाई जा सकती है, इसका उदाहरण पेश कर रहे हैं। एक बातचीत में उन्होंने कुछ प्रसंगों को बताया और समझाया है। आप भी पढ़ें-



सवाल- नियंत्रण और महालेखा परीक्षक (सीएजी) और लोक लेखा समिति (पीएसी) की रिपोर्ट से भी पहले 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले को आपने उठाया। इसकी शुरुआत कैसे हुई?
जवाब- बात 10 जनवरी, 2008 की है। उस दिन रात 9.30 बजे भारत सरकार के दो अधिकारी मुझसे मिलने मेरे घर आए। हालांकि, उन दोनों को मैं पहले से जानता था, सो हमने उनसे मुलाकात की। उन्होंने बताया कि वे बड़े दुखी और परेशान हैं। इसके बाद पूरी जानकारी दी। कहा कि “आज दोपहर 2.45 बजे एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई, जिसमें कहा गया कि शाम 3.30 से 4.30 बजे के बीच जो डिमांड ड्राफ्ट लाएगा उसे 2जी स्पेक्ट्रम का लाइसेंस दिया जाएगा। इसके बाद वहां अफरा-तफरी मच गई, जबकि चंद चुने हुए लोगों को पहले से ही इसकी खबर थी। वे डिमांड ड्राफ्ट लेकर मंत्री के कमरे में तैयार बैठे थे। ऐसा मेरे जीवन में पहली बार हुआ है और हमलोग शर्म महसूस कर रहे हैं।” उनकी बातों को सुनने के बाद मेरी समझ में आया कि क्या कुछ हुआ होगा।
मैं जानता हूं कि भ्रष्टाचार का बहुआयामी असर होता है। इसलिए हमनें सही जानकारी इकट्ठा की। इससे मालूम हुआ कि 2001 में स्पेक्ट्रम का जो मूल्य तय हुआ था, वह 2008 में लगभग दस गुणा ज्यादा हो सकता है। ऐसी स्थिति में साफ था कि राजस्व को बढ़ा नुकसान हुआ है और इसमें बड़ी रिश्वतखोरी हुई है। तब मैंने 2जी मामले को उठाने का मन बनाया। एक और बात भी है। हार्वर्ड विश्वविद्यालय में जब मैं पढ़ा रहा था तो वहां कई लोग बार-बार पूछ रहे थे कि भारत में यह सब क्या हो रहा है, क्या वहां कोई आवाज उठाने वाला भी नहीं है? आखिर भारत को क्या हो गया है? यह सब सुनने के बाद इस घोटाले को उजागर करने की मेरी इच्छाशक्ति प्रबल हो गई। मैंने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी। स्पेक्ट्रम आवंटन में जो घोटाला हुआ, उनसब का हवाला देते हुए ए.राजा के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी। यह बात नवंबर, 2009 की है।

सवाल- अब जबकि सीएजी और पीएसी ने भी आपके आरोपों की पुष्टि कर दी है और कोर्ट भी कुछ मामलों की निगरानी कर रहा है तो इस समय आपने एक अलग मोर्चा गृह मंत्री पी.चिदंबरम के खिलाफ खोल दिया है। हालांकि, इसका जिक्र पीएसी की रिपोर्ट में भी संकेतों में है। पहले इस पर कोई विश्वास नहीं कर रहा था कि पी.चिदंबरम का भी इस घोटाले में हाथ हो सकता है, पर नए तथ्य इसकी पुष्टि कर रहे हैं। आपने जिन दस्तावेजों को आधार बनाया है, वे क्या हैं और उससे कौन-कौन सी बातें निकलती हैं?
जवाब- हालांकि, पीएसी की रिपोर्ट जून, 2011 के अंत में आई थी, लेकिन मैंने इससे पहले ही 13 मई को कोर्ट में एक याचिका दायर की थी, जिसमें कहा था कि पी.चिदंबरम के खिलाफ जांच हो। पीएसी रिपोर्ट से जो भी दस्तावेजी तथ्य बाहर आए, वे मेरे पास पहले से मौजूद थे। उसी के आधार पर मैं आगे बढ़ा। इसके बाद जब पीएसी के रिपोर्ट में भी पी.चिदंबरम का नाम आया तो इससे मुझे बड़ा बल मिला। डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने जो रिपोर्ट लिखी है उसमें यह स्पष्ट है “वित्त मंत्री का दायित्व बनता है कि वे देश की तिजोरी की रक्षा करें, पर ऐसा लग रहा है कि वित्त मंत्री ने लापरवाही की है। अत: इसपर जरूर विचार होना चाहिए।” मेरे लिए यह भी एक आधार बना। हालांकि, बीच के दो महीने मैं विदेश में रहा, लेकिन वापस लौटने के बाद उसी कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहा हूं।

सवाल- इसमें अबतक अदालत में आपको कितनी सफलता मिली है?
सवाल- अभी बहस चल रही है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के वकील ने केवल तकनीकी पक्ष रखा है। हालांकि मेरी तरफ से पेश किए गए हालिया साक्ष्य का उन्होंने खंडन नहीं किया है। इतना भर कहा है कि अब उन्हें चार्जसीट फाइल करनी है। इसलिए डॉ.स्वामी को इस कोर्ट में यह अधिकार नहीं है कि वे सीबीआई जांच की मांग करें।
मेरी समझ से उनका तर्क कमजोर है। वह इसलिए क्योंकि गुजरात के मामले में 2001 में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया है, उसमें कहा गया है कि चार्जशीट दाखिल करने के बाद भी सीबीआई जांच की मांग कर सकते हैं। ऐसे में उनका तर्क अधिक समय तक टिक नहीं सकता है। हालांकि, दूसरी तरफ पी.चिदंबरम के वकील भी कह रहे हैं कि लक्ष्मण रेखा पार नहीं करनी चाहिए। कोर्ट ने इसका भी कड़ा जवाब दिया है। इससे साफ है कि उनके पास कोई तर्क नहीं है। वे अबतक मेरे किसी भी सवालों का जवाब देने में सफल नहीं हुए हैं। केवल यही कह रहे हैं कि यह कोर्ट सीबीआई जांच के आदेश नहीं दे सकती है।

सवाल- सूचना के अधिकार कानून (आरटीआई) से जो नए तथ्य सामने आए हैं, क्या उन तथ्यों को आपने कोर्ट में पहले ही पेश कर दिया है ?

जवाब- मुझे नहीं मालूम कि कोई व्यक्ति आरटीआई से इन बातों की जानकारी प्राप्त करने में जुटा है। उक्त व्यक्ति ने अखबारों को जानकारी दी होगी, पर ऐसा लगता है कि किसी अखबार वालों ने इन दस्तावेजों का सही तरीके से उपयोग नहीं किया। आखिर ऐसा क्यों हुआ, यह भी सोचने वाली बात है। मेरे पास जो दस्तावेज आए उनका आरटीआई से कोई सरोकार नहीं है।

सवाल- अखबारों में आया है कि आरबीआई के गवर्नर और उस समय के वित्त सचिव डी सुब्बाराव जो ए.राजा और पी.चिदंबरम के साथ बैठक में मौजूद थे, सीबीआई उनसे भी पूछताछ करेगी। इससे आपको अदालत में कितना बल मिला?
जवाब- अखबारों में तो कई बातें नहीं आई हैं। पी.चिदंबरम के वकील ने जाने-अनजाने कोर्ट में कहा कि डॉ.स्वामी ने जो तथ्य दिए हैं, उसकी अवश्य सीबीआई छानबीन करेगी और वस्तु-स्थिति से अवगत कराने वाली एक अतिरिक्त रिपोर्ट पेश करेगी। अब उनकी बातें मेरी समझ में नहीं आती हैं, क्योंकि मेरी भी तो यही मांग है। लेकिन वे यह भी कह रहे हैं कि यह कोर्ट सीबीआई को फिर से जांच के आदेश नहीं दे सकती है।
मेरी समझ से उन लोगों को कोई रास्त नहीं दिख रहा है। हमने इतने तथ्य पेश किए हैं कि किसी के लिए भी यह कहना मुश्किल होगा कि आप ए.राजा को तो जेल भेज सकते हैं, पर पी.चिदंबरम के खिलाफ सीबीआई जांच नहीं हो सकती।

सवाल- तो क्या आप कह रहे हैं कि पी.चिदंबरम के खिलाफ सीबीआई चार्जशीट दाखिल करेगी और उन्हें इस्तीफा देना पड़ेगा?
जवाब- पहले तो उनके खिलाफ एफआईआए दर्ज होगा। फिर जांच शुरू होगी। तब सवाल उठेगा कि ऐसी स्थिति में वे मंत्री पद पर कैसे बने रह सकते हैं। इसके बाद उन्हें इस्तीफा देना होगा। मैं समझता हूं कि उन्हें जांच के आदेश मात्र से ही इस्तीफा देना होगा।

सवाल- ए.राजा से इस्तीफा लेकर उन्हें जेल में डालकर सरकार और उनकी जांच एजेंसी सीबीआई ने जो जांच की दिशा तय की, उसे पी.चिदंबरम का नाम आने के बाद बदलने को तैयार नहीं है। क्या आपको लगता है कि कोर्ट के आदेश से उसे बदलना होगा?
सवाल- आज सीबीआई एक प्रतिद्वंदी के रूप में सामने आ रही है। क्योंकि मैंने कहा है कि इस मामले में उसने ठीक से काम नहीं किया है और जान-बूझकर पी.चिदंबरम को बचाने की कोशिश की है। अब वह अपने बचाव के लिए सफाई देने में लगी है। कह रही है कि उसने ऐसी कोई गलती नहीं की है, क्योंकि इसमें कोई खास तथ्य ही नहीं है। इसके बावजूद यदि कोर्ट आदेश देती है तो सीबीआई को उसे मानना होगा। मैं समझता हूं कि आज की परिस्थिति में सीबीआई यह दिखाना चाहेगी कि आपने विरोध किया, पर कोर्ट ने हमें आदेश दिया।

मैंने कोर्ट में उस साक्ष्य को पेश किया है जिसमें ए.राजा ने कहा है कि वह स्वान और यूनीटेक को स्पेक्ट्रम नहीं बेचना चाहते थे। पी.चिदंबरम के दबाव में उन्होंने ऐसा करना पड़ा।
-डॉ.स्वामी

सवाल- पी.चिदंबरम का बचाव सोनिया गांधी समेत पूरी कांग्रेस पार्टी कर रही है। प्रधानमंत्री भी उनके पक्ष में खड़े हैं। तब न्यायपालिका की क्या भूमिका होगी?
जवाब- सरकार और उसके कामकाज के बारे में जो लोग अच्छी तरह जानते हैं वे यह समझते हैं कि प्रधानमंत्री ने पी.चिदंबरम का पक्ष नहीं लिया है। उन्होंने यह नहीं कहा है कि चिदंबरम निर्दोष हैं। हां, यह कहा है कि मेरा उनपर विश्वास है। अगर वे यह कह दें कि चिदंबरम दोषी हैं तो मामला कल ही खत्म हो जाएगा।

सवाल- राजनीतिक पार्टियां खासकर भारतीय जनता पार्टी ने पी.चिदंबरम के साथ प्रधानमंत्री को भी घेरना शुरू कर दिया है। वहीं आपका कहना है कि प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई सबूत नहीं है। क्या यह आपकी रणनीति का हिस्सा है?
जवाब- दोनों है। दरअसल, प्रधानमंत्री को बार-बार घसीटने की जो बात होती है, सोनिया गांधी भी यही चाहती हैं। क्योंकि, वह अपने पुत्र राहुल गांधी को अब प्रधानमंत्री पद पर बैठाना चाहती हैं। मुझे इस बात की जानकारी है कि सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री के बीच टेलीफोन पर एक बातचीत हुई है। उस बातचीत में सोनिया गांधी ने साफ-साफ शब्दों में प्रधानमंत्री से कहा है कि वे दिसंबर में पद से इस्तीफा देकर राहुल गांधी का नाम प्रस्तावित करें। हालांकि, प्रधानमंत्री ने इसका कोई ठोस जवाब नहीं दिया। उन्होंने सोनिया गांधी की बातें जरूर सुनीं। दरअसल, आज इस इटालियन परिवार में एक घबराहट है। वे लोग चाहते हैं कि मनमोहन सिंह की जगह अब राहुल को पद पर आ जाना चाहिए और यदि ऐसा नहीं हुआ तो चीजें हाथ से बाहर चली जाएंगी। उन्हें यह संदेह भी है कि डॉ. मनमोहन सिंह मन से उनके साथ नहीं हैं। यहां तक बात आ गई कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने ही जान-बूझकर सारी सूचनाएं लिक की हैं, जबकि इसे गुप्त रखा जाना चाहिए था।
एक और बात है कि आखिर प्रधानमंत्री का इसमें दोष क्या है? क्या यह कि वे भीष्म पितामह की तरह सब कुछ देखते रहे। इसमें दो राय नहीं कि वे दोषी हैं। यह सरकार चली जाए और उसके साथ मनमोहन सिंह भी जाएं तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। या फिर उनकी बारी सबसे आखिर में आए। मैं सिर्फ इतना कहुंगा कि उनकी बारी जब आएगी तो कोई आपराधिक मामला नहीं बनेगा। वह नागरिक अपराध (सिविल क्राइम) का मामला होगा। इसका मतलब यह कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को ठीक तरीके से नहीं निभाया।

Wednesday, October 5, 2011

विवादों में घिरा ज्ञान केंद्र




























“मुझे संदेह है कि नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति हो गई है ? इस सवाल के जवाब में विदेश राज्य मंत्री ई अहमद ने कहा- नहीं।“ यह सवाल-जवाब राज्यसभा की 25 अगस्त, 2011 की कार्यवाही का हिस्सा है। क्या है कि “सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना।” नालंदा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय (एनआईयू) का सपना देखने वालों को पाश की यह पंक्ति रह-रहकर याद आ रही है। वे सवाल कर रहे हैं कि डॉ. गोपा सब्बरवाल कौन है? वे यह भी जानना चाहते हैं कि शांति, ध्यान और सादगी की परंपरा वाला प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय अब किस नई बुनियाद पर खड़ा हो रहा है?
ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके सपनों का यह ज्ञान केंद्र फिलहाल सवालों से घिरा है।

इस महत्वाकांक्षी विश्वविद्यालय के पहले उप-कुलपति के बतौर डॉ.गोपा सब्बरवाल की नियुक्ति विवाद का मुख्य कारण है। पिछले दिनों पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने जब इस विश्वविद्यालय से स्वयं को पूरी तरह अलग कर लिया तो मामला और तूल पकड़ा। परियोजना को लेकर संदेह गहरा हुआ है। इस दौरान छानबीन के बाद जो दस्तावेज प्रथम प्रवक्ता के पास आए हैं वे दूसरी कहानी कह रहे हैं। इसके अनुसार विदेश मंत्रालय की तरफ से 9 सितंबर, 2010 को एक पत्र डॉ. गोपा सब्बरवाल को भेजा गया था। वह पत्र संख्या- s/321/10/2009(p) है। इस पत्र के अनुसार एनआईयू के मेंटर ग्रुप यानी सलाहकार मंडल की तरफ से डॉ.गोपा सब्बरवाल को नालंदा विश्वविद्यालय का उप-कुलपति नियुक्त किया गया है। साथ ही उनकी पगार 5,06,513 रुपए प्रति माह तय की गई है। दिल्ली के जोर बाग स्थित उनके घर पर जो सरकारी टेलीफोन लगा है वह भी एनआईयू के उप-कुलपति के नाम है। अब यह नियुक्ति कई सवाल खड़े कर रही है। क्योंकि भारत का राजपत्र इस बात की तसदीक करता है कि 25 नवंबर, 2010 से ‘नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम, 2010’ लागू होता है, लेकिन विदेश मंत्रालय के पत्र से पता चलता है कि डॉ.सब्बरवाल की नियुक्ति इसके 24 दिन पहले ही कर दी गई थी। आखिर यह सब कैसे हुआ लोग जानना चाहते हैं।


इतना ही नहीं नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम, 2010 (15.1)के अनुसार विश्वविद्यालय के उप-कुलपति की नियुक्ति का अधिकार सिर्फ राष्ट्रपति या इनके द्वारा नियुक्त विजिटर के पास है, लेकिन एनआईयू की सलाहकार मंडल ने इस भूमिका को किस आधार पर निभाया। यह भी समझ से परे है। इतना ही नहीं, अधिनियम में यह भी कहा गया है कि विश्वविद्यालय अपना मुख्यालय बिहार के नालंदा में ही खोलेगा। पर, दिल्ली स्थित आरके पुरम में आईबीसी बिल्डिंग में 22 जनवरी,2011 से नालंदा विश्वविद्यालय का कार्यालय चल रहा है। इसे विश्वविद्यालय ने 2,47,500 रुपए मासिक किराए पर लिया है। सूचना के अधिकार कानून से मिली जानकारी इन बातों की तसदीक करते हैं। हालांकि कुछ ऐसी सूचनाएं भी दी गई हैं जिससे साफ होता है कि वे तथ्य को छुपाने की कोशिश में है। एक सवाल के जवाब में कहा गया है कि मेंटर ग्रुप के लिए अपनी रिपोर्ट पेश करने के वास्ते कोई समय-सीमा तय नहीं की गई थी। वहीं दूसरे कागजात इसकी पुष्टि करते हैं कि इसके लिए नौ महीने का समय तय किया गया था। हालांकि ‘प्रथम प्रवक्ता’ यह पहले भी अपने पाठकों को इस बताता रहा है।

गौरतलब है कि पहली बार एनआईयू की कल्पना 1996 में जॉर्ज फर्नांडीस ने की थी। तब नालंदा अवशेष के निकट एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि वे इस महान संस्था को पुनर्जीवित करने का जिम्मा लेते हैं। पर वे इसमें सफल नहीं हो पाए। इसके बाद मार्च, 2006 में तात्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने अपनी बिहार यात्रा के दौरान नालंदा में एक अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के होने की वकालत की। उन्होंने कहा कि यहां विज्ञान, तकनीक, अर्थशास्त्र और आध्यात्म से जुड़े दर्शन पर प्राचीन और आधुनिक संदर्भ में विस्तृत अध्ययन का केंद्र बनाया जाए। तब विदेशों से भी नालंदा के पुनरुत्थान के वास्ते सहयोग को लेकर जोरदार पहल की बात चल रही थी। इसके लिए सिंगापुर और जापान समेत कई देश आगे आकर सहयोग देने को तैयार थे। बिहार सरकार भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थी। फरवरी, 2006 में तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा की अगुवाई में दिल्ली में भी एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इन सब के बीच एनआईयू की कल्पना को साकार करने के लिए भारत सरकार ने मई, 2007 में नोबल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री प्रोफेसर अमर्त्य सेन की अध्यक्षता में एक मेंटर ग्रुप का गठन किया। इस ग्रुप से कहा गया था कि वह उच्च कोटि के अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए तमाम पहलुओं पर विचार कर एक प्रारूप पेश करे। इसके लिए उसे नौ महीने का समय दिया गया था, पर वह लगातार टलता रहा। दो साल बाद भी उक्त रिपोर्ट को पेश नहीं किया जा सका था।

हालांकि, 13-15 जुलाई, 2007 को मेंटर ग्रुप की पहली बैठक सिंगापुर में हुई। इस बैठक में सहयोग के लिए मेंटर ग्रुप ने एक 19 सदस्यीय सलाहकार समिति का गठन किया। इसमें केवल दो भारतीय शामिल किए गए, जिसमें एक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पुत्री व दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर उपिंदर सिंह थीं और दूसरी उनकी अभिन्न सहेली प्रोफेसर नयनजोत लाहिरी। नयनजोत लाहिरी भी दिल्ली विश्वविद्यालय में ही प्रोफेसर हैं। बाद में कायदे-कानून को बगल कर जिस गोपा सब्बरवाल को नालंदा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय का उप-कुलपति बनाया गया है वह भी दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्रीराम कॉलेज में समाजशास्त्र की रीडर रही हैं। कहा जाता है कि इन तीनों के बीच पुरानी और गहरी जान-पहचान है। तो क्या यह संबंधों का तोहफा है? और यह सहेलियों का विश्वविद्यालय बनने जा रहा है ? लोग यही सवाल पूछ रहे हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अनुसार भी किसी विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर प्रोफेसर की ही नियुक्ति हो सकती है। डॉ.सब्बरवाल तो प्रोफेसर से नीचे रीडर ही हैं। इतना ही नहीं एनआईयू से संबंधित अधिनियम को राष्ट्रपति की मंजूरी 21 सितंबर, 2010 को मिली थी, लेकिन इससे पहले ही 9 सितंबर, 2010 को उनकी कुलपति पद पर नियुक्ति हो गई। आखिर यह कैसे संभव हुआ। यही नहीं, कहा तो यह भी जाता है कि बतौर कुलपति डॉ. सब्बरवाल ने एसोसियेट प्रोफेसर अंजना शर्मा को एनआईयू का विशेष कार्य पदाधिकारी (ओएसडी) नियुक्त करवाया है। उनकी पगार 3,29,936 रुपए प्रति माह है।
उप-कुलपति समेत विश्वविद्यालय में नियुक्त अन्य कमर्चारियों का विवरण

इन सवालों से घिरी डॉ.सब्बरवाल ने एक बयान में कहा है कि प्रोफेसर अमर्त्य सेन की अध्यक्षता वाली सलाहकार मंडल ने मुझे योग्य पाकर ही इस पद के लिए चुना है। वैसे इस पद के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा निर्धारित योग्यता जैसी कोई शर्त एनआईयू पर लागू नहीं होती, क्योंकि एक साल पहले केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए एक अलग कानून के तहत इस विश्वविद्यालय का गठन हुआ है। अपने बयान में उन्होंने यह भी कहा है कि डॉक्टर कलाम प्रोफेसर अमर्त्य सेन के अनुरोध के बावजूद एनआईयू का प्रथम विजिटर पद स्वीकारने को तैयार नहीं हुए थे। खबर है कि फिलहाल डॉक्टर सब्बरवाल अक्टूबर के तीसरे सप्ताह अमेरिका जाने की तैयारी कर रही हैं। उनकी योजना अमेरिका में ‘पारिस्थितिकी स्कूल’ के बाबत जानकारी एकत्र करने की है, जिसका उपयोग वह एनआईयू के लिए करेंगी। 22 सितंबर को अमेरिका के न्यूयार्क शहर में एशिया सोसाइटी के एक कार्यक्रम में प्रोफेसर अमर्त्य सेन का 45 मिनट का भाषण हुआ। इस दौरान वे उप-कुलपति की नियुक्ति पर कुछ भी कहने से बचते रहे। हालांकि, बिहार सरकार की खूब तारीफ की। गौरतलब है कि इस महत्वाकांक्षी विश्वविद्यालय के लिए बिहार की नीतीश सरकार ने 446 एकड़ जमीन उपलब्ध कराई हैं।

खैर, एनआईयू में नियुक्ति को लेकर ही नहीं, बल्कि पुनर्स्थापना को लेकर भी सैद्धांतिक भेद दिख रहे हैं। सोसाइटी फॉर एशिया इंटिग्रेशन (एसएआई) का कहना है कि प्रस्तावित बिल में नालंदा विश्वविद्यालय का उद्देश्य प्राचीन नालंदा विरासत को पुनर्स्थापित करना दर्ज है, लेकिन जो स्कूल स्थापित किया जा रहा है उसकी नालंदा परंपरा से अनभिज्ञता साफ दिख रही है। नालंदा रसायनशास्त्र, चिकित्सा, खगोल विज्ञान, धातु विज्ञान, गणित जैसे गैर धार्मिक वैज्ञानिक विषयों का शोध केंद्र भी था। परंतु मेंटर ग्रुप की अनुशंसा में विज्ञान से जुड़े किसी विषय पर अध्ययन का कोई प्रावधान ही नहीं है। मेंटर ग्रुप के अध्यक्ष को कटघरे में लेते हुए एसएआई के अध्यक्ष कहते हैं कि नालंदा परंपरा की खोज के लिए उस व्यक्ति को चुना गया जिनकी धारा, समझ और जीवनशैली बिल्कुल उलट है। नालंदा में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए सार्वजनिक वाद-विवाद की प्रथा थी। यह परंपरा प्रजातांत्रिक और पारदर्शी थी। यहां सब उलट-पुलटा दिखाई पड़ रहा है। बतौर उप-कुलपति डॉ.सब्बरवाल की नियुक्ति ही इसका बड़ा प्रमाण है।

एनआईयू के गठन को लेकर मेंटर ग्रुप की लेट-लतीफी से परेशान होकर इसके निर्माण में सहयोग देने को आगे आए कई देश अब पीछे हटते दिख रहे हैं। शुरू-शुरू में सिंगापुर और जापान इस परियोजना को लेकर काफी उत्साही था। वे एशिया महाद्वीप की एकता के व्यापक लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए बौद्ध विरासत और साक्षा एशियाई परंपरा को मजबूत करना चाहते थे। पर ऐसा लगता है कि मेंटर ग्रुप की कार्यशैली ने इन सब चीजों पर पानी फेर दिया है।

बॉक्स-
इन स्थानों पर हुई मेंटर ग्रुप की बैठक। साथ ही खर्च हुए रुपए का विवरण

पहली बैठक- सिंगापुर (13-15 जुलाई, 2007)- 30,92,548.00 रुपए
दूसरी बैठक- टोक्यो (14-16 दिसंबर, 2007) 38,88,243.00 रुपए
तीसरी बैठक- न्यूयार्क (2-3 मई, 2008) 56,05,010.00 रुपए
चौथी बैठक- नई दिल्ली (12-13 अगस्त, 2008) 16,04,190.00 रुपए
अंतिम बैठक- गया (28-29 फरवरी, 2009) 29,23,012.00 रुपए

Friday, September 16, 2011

एक तस्वीर



20 महीने के नन्हें बच्चे को दूध पिलाती गाय। यह तस्वीर कंबोडिया की है।

Friday, September 9, 2011

‘वंदे मातरम्’ एक अवतारी गीत


अन्ना हजारे के आंदोलन से यह भी निकला है कि पीढ़ी चाहे कोई भी हो, ‘वंदे मातरम्’ हमारे जीवन में गहरे बैठा है। इसका किसी को प्रमाण चाहिए तो वह राजधानी दिल्ली के नजारे को देख ले। पिछले दिनों यहां अदभुत नजारा था। जो गीत समारोहों में सिमट गया था वह नया प्रतीक बनकर फिर से उभरा है। कभी यह लोकमानस में राष्ट्रवाद का द्योतक था।

इस गीत का इतिहास निराला है। यह प्रारंभ में वंदना गीत था। बंकिमचंद्र ने इसे 1870 में रचा। उस समय उनके लिए यह रचना एकांत साधना थी। उसके ग्यारह साल बाद ‘आनंद मठ’ में उन्होंने इसे छपवाया। उपन्यास के छपते ही इसे अनूठी रचना मानी गई। वंदे मातरम् की छवि युद्धघोष की बनी, लेकिन वंदे मातरम् को वे ही जानते थे जिन्होंने आनंद मठ पढ़ा था। सालों बाद बंग-भंग के विरोध में जो स्वदेशी की लहर पैदा हुई उसपर वंदे मातरम् तैरने लगा। उस आंदोलन में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने वंदे मातरम् को लोकप्रिय बनाने में अग्रणी भूमिका निभाई। 1905 में रक्षाबंधन के दिन निकले जुलूस का उन्होंने नेतृत्व किया। उससे पहले 1896 में वे कलकत्ता कांग्रेस में वंदे मातरम् गा चुके थे। 1905 से 1908 का समय वंदे मातरम् से गूंजता रहा। कैसे कोई गीत लोकमानस में प्रवेश करता है यह कहानी ही वंदे मातरम् के विकास की यात्रा है। यह वह गीत है जो पुस्तक में कैद होकर नहीं रह सका। उसी दौर में यह राष्ट्रीयता को समझाने का जरिया बना। राष्ट्रवादियों ने अंग्रेजी सत्ता से लड़ने का इसे अस्त्र माना। वही दौर है जब अरविंद घोष ने अपनी कल्पना शक्ति का चमत्कार दिखाया और इसके रचयिता बंकिमचंद्र चटर्जी को ‘राष्ट्रवाद का ऋषि’ घोषित किया।

उसी समय में बनारस कांग्रेस हुई। उसके अधिवेशन में वंदे मातरम् को सरला देवी ने गाया। जो रवीन्द्रनाथ टैगोर परिवार की थी। इस तरह एक गीत राष्ट्रवादियों के लिए नारा बनकर उभरा। उस समय के राष्ट्रवादी नेता इसे देश-भक्ति के नए धर्म का मंत्र समझते और बताते थे। अरविंद घोष उसी दौर में वंदे मातरम् पत्रिका का संपादन भी करते थे। जिसे राजद्रोह के आरोप में अंग्रेजों ने जब्त कर लिया। वही समय है जब वंदे मातरम् ने दक्षिण की यात्रा की। तमिल के महान कवि सुब्रह्मण्यम भारती ने 1905 में ही इसे अपनी भाषा में अनुदित किया। उसके बाद तो अनुवादों का क्रम चल पड़ा। मराठी, मलयालम, तेलगू आदि भाषाओं में वंदे मातरम् राष्ट्रीयता का वाहक बनकर पहुंचा। 1915 में मोहनदास करमचंद गांधी जब महात्मा नहीं बने थे तब मद्रास की एक सभा में वंदे मातरम् सुनकर बोले कि ‘आपने जो सुंदर गीत गाया उसे सुनकर हम सब एकदम उछल पड़े। यह हम आप पर है कि कवि ने मातृभूमि के बारे में जो कहा है उसे साकार करने की कोशिश करें।’

आजादी की लड़ाई में जहां वंदे मातरम् भारत भक्ति का माध्यम बना। वहीं एक समय ऐसा आया जब उसमें मूर्ति पूजा के तत्व लोग देखने लगे। उसपर पहला विवाद जिन्ना ने उठाया। जिसे मुस्लिम लीग ने अपने विरोध का मुद्दा बना लिया। आजादी की लड़ाई में मुस्लिम लीग ने वंदे मातरम् का प्रबल विरोध किया। कांग्रेस ने उसे मुस्लिम समाज की भावना से जोड़कर देखा। जिसके कारण जवाहरलाल नेहरू समिति की सिफारिश पर कांग्रेस ने 1937 में इसके कुछ अंशों को निकाल दिया। उस काट-छांट के बाद कांग्रेस ने इसे राष्ट्रगान के रूप में अपनाया। तब से ही वंदे मातरम् पर राजनीतिक विवाद की छाया बनी हुई है। वह उसके साथ चलती रहती है। लेकिन कांग्रेस ने जिन्ना को मुस्लिम समाज का अकेला प्रतिनिधि माना जबकि उसी समय रिजाउल करीम ने 1930 में ‘वंदे मातरम् और आनंद मठ’ की समीक्षा में लिखा कि ‘यह गूंगा को जबान और कलेजे के कमजोर लोगों को साहस देता है।’
उन्होंने यह भी लिखा कि बंकिमचंद्र ने इस गीत से देशवासियों को चिरकालिक उपहार दिया। उस विवाद को परे रखते हुए संविधान सभा ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की पहल पर जन-गण-मन के साथ इसे भी राष्ट्रगीत का दर्जा दिया।

मानना होगा कि तमाम विवादों के बावजूद वंदे मातरम् में अवतारी क्षमता है। यह अन्ना हजारे के आंदोलन में प्रकट हुई। अन्ना हजारे ने भी विवादों की परवाह नहीं की और वंदे मातरम् को प्रेरणा का नया स्रोत बना दिया। यह प्रकट हुआ कि वंदे मातरम् राष्ट्रीय संस्कृति की गीत रूप में धरोहर है। कोई भी गीत एक सांस्कृतिक कला तथ्य होता है। उसपर राजनीतिक विवाद नजरिए के कारण पैदा किया जाता है। जो उसे स्वदेशी, राष्ट्रीयता और देशभक्ति का प्रतीक मानते हैं उनके लिए वंदे मातरम् मंत्र है। मंत्र वही होता है जिसे समय-समय पर सिद्ध करना पड़ता है। जवाहरलाल नेहरू और जिन्ना को इसमें सांप्रदायिकता दिखी। यह उनकी अपनी राजनीतिक भूमिका थी।


ऐसा भी नहीं है कि अन्ना हजारे ने बहुत दिनों बाद वंदे मातरम् को जन-जन की जुबान पर ला दिया हो। 1997 में ए.आर. रहमान इसे अपने सुरताल में बांधा। 2002 में बीबीसी विश्व सेवा के 25 हजार श्रोताओं ने इसे भारत के दो सर्वाधिक लोकप्रिय गीतों में से एक माना। अन्ना हजारे के आंदोलन ने वंदे मातरम् को एक नया अर्थ दिया है। जाहिर है कि वंदे मातरम् का अर्थ हमेशा इस पर निर्भर करता रहा है कि किस समय और किस उद्देश्य से इसका उपयोग किया जा रहा है। अन्ना की आंधी में यह देश में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के नए संकल्प का शंखनाद हो गया है। इस गीत के अतीत की गौरवशाली स्मृतियां अब हमारे वर्तमान को गढ़ने जा रही है।
(वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय)

Thursday, September 8, 2011

कैद में मोहम्मद साहब के पद चिन्ह


मोहम्मद साहब के पद चिन्ह>

आज हम जहां सैर पर हैं, वह फिरोजशाह के बेटे फतेहशाह की कब्रगाह है। यह इसलिए भी पाक मानी जाती है, क्योंकि यहां मक्का से मंगवाए गए वे पत्थर लगे हैं जिसपर मोहम्मद साहब चला करते थे। 13वीं शताब्दी में फिरोजशाह ने अपने आध्यात्मिक सलाहकार मखदूम जेहान गश्त से इस पत्थर को मक्का से मंगवाया था। वह इसे अपनी कब्र पर लगवाना चाहता था, लेकिन संयोग था कि फिरोजशाह से पहले उसके बेटे फतेहशाह की मृत्यु हो गई। और वह पवित्र पत्थर उसी की कब्र पर लगा दी गई।

खैर, आज इस जगह पर चित्रगुप्त मार्ग और ऑरिजनल रोड से पहुंचा जा सकता है। यह पहाड़गंज से आगे कुतुबमार्ग पर सदर बाजार की तंग गलियों में है और ‘कदम शरीफ’ के नाम से मशहूर है जो कई दरवाजों से घिरी इमारत है। यहां एक मस्जिद भी है। फिरोजशाह ने तो यहां एक मदरसा भी बनवाया था जो अब अस्तित्व में नहीं है। प्रचलित है कि इस इमारत को फिरोजशाह ने अपनी कब्रगाह के तौर पर बनवाया था ताकि उसे यहां दफनाय जा सके। इमारत के एक छोर पर एक गुंबद युक्त छोटी इमारत का निर्माण कराया गया था। इसके मध्य में एक आयताकार कब्र बनाई गई थी जो फिरोजशाह के लिए थी।

इतिहासकारों का कहना है कि फिरोजशाह बड़ा ही धार्मिक व्यक्ति था। उसने संत मखदूम जेहान को मक्का भेजा था ताकि वहां से हजरत मोहम्मद का लबादा लाया जा सके। पर मखदूम इस काम में असफल रहे। उन्होंने फिरोजशाह को बताया कि हजरत मोहम्मद की ऐसी बहुत सी चीजें हैं जिसे खलीफा अपने-आप से अगल नहीं करना चाहते हैं। इसके बाद फिरोजशाह ने ढेर सारे तोहफे के साथ उन्हें फिर मक्का भेजा। इससे प्रभावित होकर खलीफा ने मोहम्मद के पैरों के निशान वाले पत्थर फिरोजशाह को भिजवाए। इस पत्थर को फिरोजशाह अपनी कब्र पर लगाना चहाता था। पर यह हो न सका। दरअसल, फिरोजशाह के बेटे फतेहशाह ने अपने पिता से वादा लिया था कि उसकी कब्र पर उक्त पत्थर लगाए जाएंगे। दुर्भाग्य से जब ऐसा हुआ तो फतेहशाह को वहीं दफनाया गया जिसे फिरोजशाह ने अपने लिए बनवाया था और उसकी कब्र पर उन पत्थरों को लगा दिया गया। इसके बाद वह दरगाह कदम शरीफ कहलाया।

पहले दारा सिकोह और फिर जयसिंह की सेना में रहा एक इतालवी लेखक निकोलो मोन्युकी ने अपनी किताब ‘स्टोरिया दी मुगल’ में लिखा है कि कदम शरीफ को हजरत मोहम्मद के पदचिन्ह को रखने के लिए बनवाया गया था। और वह 17वीं शताब्दी में मस्लमानों द्वारा दर्शन किए आने वाले सबसे प्रमुख तीर्थस्थलों में था। पुस्तक में यह भी कहा गया है कि मुगल बादशाह औरंगजेब ने इस जगह को अपने धार्मिक उद्देश्य के लिए भी इस्तेमाल किया था।


फतेहशाह की कब्रगाह>

मुसलमानों की यह पवित्र दरगाह महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर है, लेकिन आज बदहाली के कगार पर है। हालांकि यह पुरातत्व विभाग के अधीन नहीं। एक मुस्लिम परिवार इसकी देख-रेख करता है। अंदर प्रवेश करने पर पूरी जमीन कबूतरों की गंदगी से भरी पड़ी दिखती है। फतेहशाह की कब्र पर भी धूल जमे हुए हैं। यहां पवित्र पत्थर कोई अता-पता नहीं है। वहां रहने वाले जहीर से पूछा तो उसने कहा, “1947 के दंगों में दंगाइयों ने इस पत्थर को निकाल दिया था। तभी से वह हमारे पास है।” कहने पर वह उस पवित्र पत्थर को दिखाता भी है। हालांकि आसपास के लोग अलग राय रखते हैं। वे कहते हैं कि सरकारी विभागों की अनदेखी के कारण इन लोगों ने यहां कब्जा जमा रखा है। गौर करें कि यह इमारत उसी फिरोजशाह ने बनवाई थी जिसने दिल्ली को न सिर्फ खूबसूरत बनाया, बल्कि जब कोई पुरातत्व विभाग नाम की चीज नहीं थी तब भी कुतुबमीनार जैसी ऐतिहासिक इमारतों का जीर्णोद्धार करवाया था। आज सबकुछ है। इसके बावजूद यह पवित्र इमारत उपेक्षित है। गंदगी में सनी हुई।

(श्रुति अवस्थी की खास रपट)

Tuesday, September 6, 2011

हारा मन फुदकन में खोजे चेतन


अन्ना हजारे ने जो कार्यक्रम चलाया, उसमें जनता की बहुत भागीदारी रही। विशेषकर नया मध्यवर्ग शहरों में मुखरित हुआ। और वह सक्रिय है। अभी जो कुछ हुआ है उसपर कई तरह की प्रतिक्रियाएं आई हैं। इसे आंदोलन माना जा रहा है। निजी तौर पर अभी मैं इसे कोई आंदोलन नहीं मानता हूं। हां, इसे एक कैंपेन जरूर कहूंगा। जो अन्ना हजारे के व्यक्तिगत अनुभव, उनकी सोच और सामाजिक जिम्मेदारी के आधार पर शुरू हुआ। आज देश के हजारों-लाखों लोगों के मन में बस एक ही सवाल है जो मूलत: भ्रष्टाचार से जुड़ा है। निश्चय ही इस सवाल को सार्वजनिक बनाने में अन्ना का बढ़ा योगदान रहा।

इस कैंपेन की विशेषता ही है कि वह वर्तमान व्यवस्था, सरकार और नेतृत्व के प्रति गहरा शक पैदा करता है और एक तरीके के घबराहट को भी जन्म देता है। यानी यह डिसट्रक्ट भी है और मिसट्रक्स भी। आप देखेंगे कि महात्मा गांधी ने समय-समय पर अंग्रेजों की काफी आलोचना की। इसके बावजूद यह कहा कि हम इनपर भरोसा कर सकते हैं। दरअसल, उनके मन में यह बात कहीं-न-कहीं गहरे बैठी थी कि ब्रिटिश सरकार आपसी सहमति के बाद जिस किसी नतीजे पर पहुंचेगी अंततोगत्वा उसका क्रियान्वयन जरूर करेगी। आज इसपर भी संकट खड़ा हो गया है। सरकार और नेतृत्व पर कोई यकीन करने को तैयार नहीं है। निश्चय ही इसमें कसूर व्यवस्था चलाने वालों का है और यह उनकी बड़ी असफलता है। मैं यह भी कहुंगा कि इस आंदोलन में जो लोग अन्ना के साथ बातचीत कर रहे थे वे राजनैतिक तौर पर परिपक्व नहीं थे। यह देश का दुर्भाग्य ही है।


यह अन्ना का पहला राष्ट्रीय अभियान है। वैसे तो अन्ना अबतक 14 कैंपेन चला चुके हैं। इनमें चार-पांच स्थानीय स्तर के रहे है। कुछेक सूचना के अधिकार कानून को लेकर उन्होंने चलाए थे। पर राष्ट्रीय स्तर पर उनका यह पहला अनुभव है। इसलिए उनकी अपनी सीमा भी है जो उनके अंदर निहित है। हमने देखा कि 28 अगस्त को जो कैंपेन सम्पन्न हुआ, वह उसे अभिव्यक्त भी कर रहा था। उन्हें इस बात का शायद अंदाजा भी नहीं था कि पूरे भारत में लोग उठ खड़े होंगे। यहां एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यवस्था परिवर्तन पर वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में भी उन्होंने कोई रूपरेखा नहीं दी है। न ही इस बारे में कोई जानकारी दी है। फिलहाल वे केवल राजनैतिक स्तर पर ही सुधार की बात कर रहे हैं। वह भी केंद्रीय स्तर पर। दूसरी बात यह कि इस कैंपेन में राजनैतिक संभावनाएं काफी कम हैं, क्योंकि जबतक यह उबाल कोई नेतृत्व पैदा नहीं करता है तबतक इस बात की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती है। हालांकि इसने जनता को जागृत कर दिया है, लेकिन बुनियादी तबदीली के लिए कोई नेतृत्व ही नहीं है।

सामाजिक स्तर पर भी जो कुप्रथाएं हैं और उसकी वजह से जो भ्रष्टाचार है, उसे किसी कानून से खत्म करना मुमकिन नहीं है। इसके लिए तो सामाजिक सुधार की जरूरत पड़ती है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय गांधीजी ने सामाजिक सुधार को लेकर कई प्रयोग किए थे। साथ ही रचनात्मक कार्यों पर बल दिया था। लेकिन इस कैंपेन में सामाजिक आंदोलन की कोई प्रवृति हमें दिखाई नहीं पड़ती है। यहां उपवासों के माध्यम से समाज की चेतना को कुरेदकर सुधार लाने का पहली बार प्रयास किया गया है। वह भी ऐसे व्यक्ति द्वारा जिसकी क्षमता अबतक स्थानीय और राज्य स्तर की चुनौतियों से लड़ने की रही है। यह उनका अवगुन नहीं है, बल्कि सीमा है। जिससे ‘आगे देखो’ जैसी सोच की संभावना यहां नहीं दिखती है। वैसे कई बातें कही गई हैं, फिर भी कोई स्पष्ट विचार या सोच उभरकर सामने नहीं आ रहा है। न तो अन्ना में और न ही उनके सहयोगियों में। हां, इस कैंपेन से प्रभावित होकर समाज के अंदर से वैसे प्रभावी लोग आगे आ जाएं तो बात अलग है। दरअसल जो समाज 64 साल से कभी बोला ही नहीं, वह अब बोल रहा है। हिंदुस्तान में जो हारे हुए और निराश लोग हैं उन्हें इससे एक अवसर नजर आया है। यहां एक कविता याद आती है, “हारा मन फुदकन में खोजे चेतन।”
इतने के बावजूद भारत में सिविल सोसाइटी का अपना महत्व है। वह स्थानीय स्तरों पर विभिन्न समय और रूपों में सक्रिय रहा है। मैं मानता हूं कि सिविल सोसाइटी का सरकार में दखल कम होना चाहिए। पर जब राजनैतिक हालात इतने खराब हो जाएं कि वह अपना काम ही न कर सके तो उन्हें बाहर आना पड़ता है। गत 50 सालों के राजनीतिक चलन से ऐसी स्थिति बनी कि सिविल सोसाइटी को सरकार में दखल देना पड़ा है। इस बिंदु पर अन्ना ने ऐतिहासिक काम किया है। लेकिन सिविल सोसाइटी की तासीर ऐसी होती है कि वह निरंतर कोई देशव्यापी आंदोलन नहीं चला सकता है। इसके लिए तो नेतृत्व की जरूरत होती है। आज इसपर विचार करने का समय है कि इन परिस्थितियों में सिविल सोसाइटी किस तरह इसे आगे ले जाएगी। यह जिम्मेदारी राजनीतिक पार्टीयों की भी है कि वह इसे नेतृत्व प्रदान करे, पर फिलहाल इसकी संभावना नहीं दिख रही है।

दरअसल, इसके अंदर जो संभावनाएं हैं उसे समझने की क्षमता आज के नेतृत्व में नहीं दिख रही है। न ही अभी कोई तिलक, गांधी या फिर आंबेडकर निकलता दिखाई दे रहा है। गत 47 दिनों में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और अखबारों में करीब 300 आलेख आ चुके हैं। यह समाज के सजग होने की निशानी जरूर है, पर इसमें भी नई सोच के बीज अभी तक नहीं दिख रहे हैं। फ्रांस और रूस की क्रांति हुई तो कई नई प्रतिभाएं सामने आईं। राजनीति के साथ-साथ कला, साहित्य पर भी उसका प्रभाव पड़ा। अन्ना हजारे के इस आंदोलन का अभी वह प्रभाव नहीं है। सरकारी स्तर पर कुछ कमजोरियां निकलकर आ रही हैं, यह उसी पर केंद्रित है। इसमें विद्यार्थियों की भागीदारी जरूर रही, पर दूसरे छात्र आंदोलनों से इसकी तुलना करें तो इसमें वे लक्षण हमें नहीं मिलेंगे। कुल मिलाकर इससे सामाजिक चेतना की ऐसी कोई जमीन अभी नहीं बनी है जिससे नया पौध निकल आए।

(अन्ना आंदोलन पर मशहूर पत्रकार देवदत्त के विचार)