<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774</id><updated>2012-02-16T03:44:39.552-08:00</updated><category term='geet'/><title type='text'>खंभा</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default?start-index=101&amp;max-results=100'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>151</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-7438233484812032275</id><published>2012-02-09T00:01:00.000-08:00</published><updated>2012-02-09T00:04:33.752-08:00</updated><title type='text'>खतरे में खजुराहो</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-XhsnM2rqHus/TzN95MI8FpI/AAAAAAAAAZ0/cGR-QM-h31Y/s1600/khajuraho-image.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 136px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-XhsnM2rqHus/TzN95MI8FpI/AAAAAAAAAZ0/cGR-QM-h31Y/s320/khajuraho-image.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5707043574273283730" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कम से कम हजार साल से खजुराहो की पहचान उसके मंदिरों से है। वह पहचान खतरे में है, क्योंकि मध्य प्रदेश शासन जिस कोशिश में लगा है अगर वह सफल हो गया तो सबसे पहले खजुराहो के मंदिर नष्ट होने लगेंगे। मंदिर हैं तो खजुराहो है। मंदिरों के वगैर खजुराहो की कल्पना ही बड़ी भयावह होगी। प्रकृति ने खजुराहो को धरती से थोड़ा ऊपर बनाया है। शायद इसीलिए कि उसपर जो मंदिर खड़े होंगे वे अपनी आध्यात्मिक आभा बिखेरेंगे। उन्हीं मंदिरों के कारण खजुराहो का स्थान विश्व धरोहर में बना हुआ है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो मध्य प्रदेश में तीन स्थान हैं जिन्हें विश्व धरोहर में माना जाता है। दूसरे जो दो हैं उनमें एक सांची के स्तूप हैं। दूसरा भीम बैठका है, लेकिन खजुराहो में दुनिया से जितने लोग आते हैं उतने शायद दूसरे स्थानों पर नहीं जाते। खजुराहों के मंदिरों में दुनिया का आकर्षण उसकी कला के कारण है। पर्यटक अपनी इन रूचियों के कारण वहां पहुंचता है। उन पर्यटकों की सुविधा के लिए वहां हवाई पट्टी है और होटलों की शृंखला है। इस चकाचौंध से दूर खजुराहो का आध्यात्मिक महत्व अक्षुण बना हुआ है। इसलिए भी कि वहां चौसठ योगिनियों का वह मंदिर है जहां हर योगी एक बार पहुंचना ही चाहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसे पुराण में खोजने जाने की जरूरत नहीं है। इस समय के नामी योगी स्वामी राम की जीवनी के पन्ने-दर-पन्ने खजुराहो के उस मंदिर की अलौकिक गाथा के गवाह है। स्वामी राम के एक उत्तराधिकारी राजमणि तिगुनेत हैं। वे अमेरिका के हिमालय इंस्टीट्यूट को संभालते हैं। उन्होंने स्वामी राम की जीवनी लिखी है। स्वामी राम की कई जीवनियों में से सबसे अधिक प्रामाणिक उनकी लिखी ही मानी जाती है। वह है - ‘एैट दी इलेवन्थ ऑवर’। इस तरह खजुराहो जितना ही आधुनिक है उतना ही उसमें भारत की परंपरा का प्रवाह है। उसे संवारने के लिए हर साल खजुराहो महोत्सव होता है। जो इन दिनों चल रहा है।&lt;br /&gt;जरा सोचिए, मध्य प्रदेश शासन इन बातों से बेपरवाह होकर वहां दो-दो थर्मल पॉवर प्रोजेक्ट ले आने की तैयारी कर रहा है। किसानों से जमीन ली जा रही है। किसान उसका विरोध कर रहे हैं। उन्हें जानने का हक है जिसकी प्रशासन परवाह नहीं कर रहा है और उन्हें मजबूर किया जा रहा है कि वे अपनी जमीन शासन को सौंप दें। अगर थर्मल पॉवर प्रोजेक्ट आ गया तो खजुराहो का नष्ट होना कुछ सालों की बात ही होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी बात नहीं है कि इस खतरे से मध्य प्रदेश शासन अवगत न हो। खजुराहो के एक सजग नागरिक नमित वर्मा ने गांठ बांध ली है कि लड़ेंगे और अपनी धरोहर बचाएंगे। वे दिल्ली के लुटियन और भोपाल के श्यामला हिल्स से थोड़ा ऊंचे उठकर अपनी चिट्ठियों से आगाह कर रहे हैं। उसका असर भी हुआ है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने उनकी चिंता को उचित ठहराया है। सबसे पहले पिछले साल मई में उन्होंने एक लंबा पत्र लिखा। जो हर उस खास व्यक्ति को भेजा गया जिसका थोड़ा-सा भी हाथ अनुचित काम को रोकने में लग सकता है। कहने की जरूरत नहीं है कि इस लंबी सूची में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित मध्य प्रदेश शासन के सभी महत्वपूर्ण व्यक्ति थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत सरकार के वन और पर्यावरण मंत्रालय के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने उनके पत्र पर माना कि खजुराहो से थोड़ी दूर पर ही एनटीपीसी का जो सुपर थर्मल पॉवर प्रोजेक्ट प्रस्तावित है वह स्थापित मानकों पर आधारित नहीं है। उसके लिए पर्यावरण संबंधी जिस तरह का अध्ययन किया जाना चाहिए वह नहीं हुआ है। अगर थर्मल पॉवर प्रोजेक्ट लगता है तो एक तरफ खजुराहो की विश्व धरोहर के नष्ट होने का जहां खतरा पैदा हो जाएगा वहीं पन्ना के टाइगर संरक्षण वाले वनों पर भी संकट मंडराएगा। उसी पत्र में यह सूचना भी है कि मंत्रालय ने इस प्रोजेक्ट को मंजूरी नहीं दी है, लेकिन यह माना है कि प्रोजेक्ट को लाने से पहले इस तरह के ऐहतियाती उपाय जरूरी हैं जिससे खजुराहो और पन्ना के जंगलों में संरक्षित टाइगर को कोई नुकसान न हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह भी अजीब-सी बात है कि जिस पॉवर प्रोजेक्ट को वहां लाने के प्रयास हो रहे हैं उसके लिए कोयला बहुत दूर से लाया जाएगा।  यह एक ऐसा तथ्य है जो संदेह पैदा करता है कि दिखाया जो जा रहा है उससे अधिक बड़ी बात छिपाई जा रही है। इस बारे में नमित वर्मा ने अपनी दूसरी चिट्ठियों में कुछ सवाल उठाएं हैं। जिनका संबंध खनन के लिए लाइसेंस जारी करने से है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;आरोप है कि थर्मल पॉवर प्रोजेक्ट कांग्रेस के एक नेता की सीमेंट फैक्टरी के लिए लाया जा रह है। यह जांच का विषय है कि उसमें मध्य प्रदेश भाजपा के किन नेताओं की हिस्सेदारी है।&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; क्या मध्य प्रदेश सरकार वहां खनन माफिया की गिरफ्त में आ गई है और उससे ध्यान हटाने के लिए पॉवर प्रोजेक्ट की आड़ ले रही है। इस बात के संकेत नहीं है कि राज्य सरकार अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहती है। राज्य सरकार के इरादे पर ही पूरे क्षेत्र में सवाल खड़ा हो गया है। आखिर वह इरादा क्या है। सरकार की चुप्पी संदेह को बढ़ा रही है। संभव है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की विकास यात्रा के दौरान उस क्षेत्र में उन्हें लोगों को जवाब देना पड़े।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(लेखक वरिष्ठ पत्रकार &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;रामबहादुर राय&lt;/span&gt; हैं)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-7438233484812032275?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/7438233484812032275/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=7438233484812032275' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/7438233484812032275'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/7438233484812032275'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2012/02/blog-post_09.html' title='खतरे में खजुराहो'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-XhsnM2rqHus/TzN95MI8FpI/AAAAAAAAAZ0/cGR-QM-h31Y/s72-c/khajuraho-image.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-6621591385536284123</id><published>2012-02-06T22:49:00.000-08:00</published><updated>2012-02-06T22:52:00.970-08:00</updated><title type='text'>यूपी में उमा फैक्टर</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-dP-wpw7HulE/TzDJpSBeIpI/AAAAAAAAAZo/RU6E1z1nlh0/s1600/08-uma-bharti-303.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 225px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-dP-wpw7HulE/TzDJpSBeIpI/AAAAAAAAAZo/RU6E1z1nlh0/s320/08-uma-bharti-303.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5706282438928245394" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;उत्तर प्रदेश का जो मिजाज पिछले 20 सालों में बना है, उसमें अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस कहीं ठहर नहीं रही है। हालांकि, हवा जरूर बना रही है, पर तल के नीचे हाल बुरा है। इन राष्ट्रीय पार्टियों की मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं। यह साफ दिख रहा है कि अबतक समाजवादी पार्टी (सपा) सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का विकल्प नहीं बन पाई है। हालांकि, प्रदेश की जनता बसपा की वापसी नहीं चाहती, लेकिन वह सपा को भी गद्दी सौंपना नहीं चाहती। वह सपा की करतुतों को भूली नहीं है। सपा की खुली लूट और जातीय आतंक का भय अब भी उसके जेहन में है। वहीं मायावती के नेतृत्व में शासन संगठित भ्रष्टाचार का जरिया बना। इससे लोग अचंभित हैं। यहां कोई तीसरा विकल्प निकलता तो यकीनन, जनता उसकी तरफ जाती। चुनाव त्रिकोणी होता। पर ऐसा नहीं है। संगठन के मामले में तो कांग्रेस इस समय भाजपा से भी पीछे है। बिहार विधानसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस लगातार पिछड़ रही है, जबकि उसके पहले कांग्रेस की हवा बन रही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर प्रदेश में तीसरे विकल्प के रूप में भाजपा एक समय सामने आती दिख रही थी। सूबे की राजनीति को समझने वाले बताते हैं कि यदि प्रदेश के भाजपाई नेताओं ने उमा भारती का नेतृत्व स्वीकारा होता तो पार्टी का काया-पलट हो सकता था, क्योंकि उमा भारती के आने मात्र की सूचना से पूरे प्रदेश के कार्यकर्ताओं और समर्थकों में जो गहरी निराशा थी, वह खत्म हो गई। पार्टी में नई जान आ गई थी। प्रदेश में उमा भारती की जो सभाएं हुईं, उससे स्पष्ट हुआ कि जो जमातें पार्टी से छिटक चुकी थीं, वह भी वापस आने लगी है। अगर भाजापा की प्रदेश ईकाई के नेताओं में अंतर्कलह न होता और उनमें स्वयं को सबसे ऊपर देखने का नजरिया न रहता तो पार्टी इस विधानसभा चुनाव में अब से बेहतर स्थिति में होती। क्योंकि अन्ना आंदोलन से प्रदेश में जो माहौल बना है, उसमें आम आदमी की नजरों में कांग्रेस विकल्प बनकर नहीं आ पा रही थी। इस माहौल का फायदा भाजपा उमा भारती के नेतृत्व में उठा सकती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह भी देखने में आया कि उत्तर प्रदेश में प्रतिद्वंद्वी पार्टियों ने भी उमा भारती के आने पर ही भाजपा को नोटिस में लेना शुरू किया। राहुल गांधी स्वयं उनके पीछे पड़े। इससे साफ है कि उमा की वापसी से उन्हें अपनी जमीन खिसकती मालूम हुई। सूबे की राजनीति में उमा भारती के आने का जो असर महसूस किया गया, वह अनायास नहीं है, बल्कि वजह गहरी है। भाजपा के जो नेता आज प्रदेश में स्थापित हैं, उनसे काफी पहले से उमा भारती का इस प्रदेश से खास परिचय है। वह एक जानी-पहचानी नेता रह चुकी हैं। 1986 में जब अयोध्या आंदोलन की नींव पड़ी तो उमा भारती उसी समय से प्रदेश में पहचानी जाने लगी थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि, विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का यह निर्णय कि उमा भारती चुनाव की कमान संभालेंगी और संजय जोशी संगठन का काम देखेंगे, बड़ा ही साहसपूर्ण था । इसका प्रदेश में गहरा असर हुआ। पर प्रदेश के नेताओं ने उन्हें प्रभावशून्य करने की पूरी कोशिश की। इस खींच-तान में पार्टी को जो फायदा हो सकता था, वह होता नहीं दिख रहा है। कुछ लोगों की राय यह भी है कि उमा भारती के आने से कल्याण सिंह की कमी पूरी हो सकती थी। संभवत: वह उनसे ज्यादा प्रभावशाली भी सकती थीं, क्योंकि वह महिलाओं में भी खासी लोकप्रिय हैं। पर अभी स्थिति दूसरी है। विशेषज्ञों की राय में अनुकूल परिस्थितियों में भाजपा ने अवसर गंवाया है। यह विडंबना ही है कि पार्टी अबतक मुख्यमंत्री का उम्मीदवार तय नहीं कर पाई है। ऐसे में साफ है कि उमा भारती के आने का जो फायदा पार्टी उठा सकती थी उसमें वह पिछड़ गई।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-6621591385536284123?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/6621591385536284123/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=6621591385536284123' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/6621591385536284123'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/6621591385536284123'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2012/02/blog-post_06.html' title='यूपी में उमा फैक्टर'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-dP-wpw7HulE/TzDJpSBeIpI/AAAAAAAAAZo/RU6E1z1nlh0/s72-c/08-uma-bharti-303.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-6168309413390212547</id><published>2012-02-05T04:14:00.000-08:00</published><updated>2012-02-05T21:51:56.568-08:00</updated><title type='text'>सोनिया गांधी के खिलाफ करुंगा जांच की मांग: डॉ.स्वामी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-cVB1ngxmeBM/Ty52aROx_nI/AAAAAAAAAZc/2dy-tfCvJ8o/s1600/Subramaniam_Swamy_PTI.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-cVB1ngxmeBM/Ty52aROx_nI/AAAAAAAAAZc/2dy-tfCvJ8o/s320/Subramaniam_Swamy_PTI.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5705627971599072882" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- 2-जी स्पेक्ट्रम मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सरकार की तरफ से केंद्रीय संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि फैसला संप्रग सरकार के खिलाफ नहीं है। इसपर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जवाब&lt;/span&gt;-&lt;blockquote&gt; अब मैं कपिल सिब्बल की हर झूठी बातों का जवाब देने लग जाउं तो दूसरे कामों के लिए तो वक्त ही नहीं रहेगा। आप देख लीजिए, उन्होंने कहा था कि लाइसेंस के आवंटन में सरकार को कोई राजस्व घाटा नहीं हुआ, पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इससे देश को काफी बड़ा नुकसान हुआ है। कोर्ट ने सभी 122 लाइसेंसों को रद्द तक कर दिया है।&lt;/blockquote&gt; अब कपिल सिब्बल को तो कम से कम मांफी मांगनी चाहिए थी। मैं तो समझता हूं कि नैतिक आधार पर इस्तीफा देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट से इतना जोरदार थप्पड़ अबतक किसी को नहीं पड़ा है। मीडिया को उनसे नुकसान के बारे में सीधा सवाल करना चाहिए था, पर किसी ने डट कर नहीं पूछा। उनसे कहना चाहिए था कि जवाब दो अन्यथा इस्तीफा दो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- 2-जी मामले के मुख्य अभियुक्त ए.राजा कहते हैं कि जो कुछ भी उन्होंने किया वह प्रधानमंत्री की जानकारी में था। इसके बावजूद आपके निशाने पर डा.मनमोहन सिंह नहीं हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- हां, वे नहीं हैं, क्योंकि सीधे तौर पर क्या इससे जुड़ा कोई अधिकार उनके पास था। यह समझना भी जरूरी है। यह सच है कि उनके पास एक सार्वजनिक नैतिक अधिकार है, पर हमसब पहले दिन से ही जानते हैं कि डॉ.मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के रूप में सोनिया गांधी ने क्यों चुना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- आपने एक बार मांग की थी कि 2-जी स्पेक्ट्रम की फिर से नीलामी हो और उसमें कपिल सिब्बल की कोई भूमिका न रहे। अब आपकी नीलामी की मांग पर तो सुप्रीम कोर्ट ने भी मुहर लगा दी है। टेलीकॉम नियामक प्राधिकरण (ट्राई) को इस प्रक्रिया पर सुझाव देने को कहा है। क्या आप इससे संतुष्ट हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- हां, यह बिल्कुल सही फैसला है। यहां ट्राई की ही जिम्मेदारी बनती है। दरअसल हमारे यहां ऐसी जितनी भी संस्थाएं हैं, जैसे- ट्राई, सीएजी आदि सभी को इन लोगों ने अपना पिछलग्गू बना दिया है। किसी में जवाब-तलब करने की हिम्मत ही नहीं बची है। हालांकि, धीरे-धीरे स्थिति बदल रही है। अब जब सुप्रीम कोर्ट ने ही कहा है तो ट्राई को बल मिलेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- इसमें कपिल सिब्बल की कितनी भूमिका होगी?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- उनकी कोई भूमिका नहीं होगी। देशभर की निगाहें उधर होंगी। सिब्बल स्वयं पीछे हट जाएंगे। साथ ही उनके बेटे की भी इसमें कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए, जो आजकल टेलीकॉम कंपनी के वकील हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- क्या आपकी याचिकाओं पर आए इस फैसले से आपका मूल उद्देश्य पूरा हो गया है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- लाइसेंस को रद्द करने के बाबत जो याचिका डाली थी, उसका उद्देश्य तो अब पूरा हो गया है। अब एक दूसरी बात है। मैंने कहा था कि पी.चिदंबरम के खिलाफ सीबीआई जांच हो, इसका भी फैसला देर-सबेर कोर्ट में ही होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल-कानूनी प्रक्रिया से भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने की आपने एक पद्धति विकसित की है। क्या आप एक उदाहरण प्रस्तुत कर यह बताना चाहते हैं कि अभी आंदोलन की जरूरत नहीं है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- जी बिल्कुल। जब हमें आजादी नहीं मिली थी। यहां अंग्रेज थे और तानाशाही थी, उस समय आंदोलन की बात समझ में आती है। आज वैसी परिस्थिति नहीं है। मैं मानता हूं कि आज के कानून में बेशक थोड़ा विलंभ हो जाए, पर हम उसके माध्यम से लड़ाई लड़ सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- भ्रष्टाचार ने निपटने के लिए तो आपने भी एक संगठन बनाया है&lt;/span&gt;।&lt;br /&gt;जवाब-&lt;blockquote&gt; हां। ‘एक्शन एगेंस्ट करप्सन’ बनाया है। इसमें 15 वरिष्ठ लोग हैं। वे सभी अलग-अलग क्षेत्र से हैं। राजनीतिक क्षेत्र से केएन.गोविंदाचार्य, बुद्धिजीवियों में गुरुमूर्ति, पत्रकार गोपी कृष्णन, संयुक्त राष्ट्र से कल्याण रमण आदि लोगों को शामिल किया है&lt;/blockquote&gt;। इस संगठन का पहला लक्ष्य यही होगा कि विदेशी बैंकों में जो भारत का कालाधन जमा है उसे वर्तमान कानूनी प्रक्रिया में वापस कैसे ला सकते हैं, इसके रास्ते तलाशना। रामदेव भी इसी राय के हैं, इसलिए हमलोगों ने मिलने का फैसला किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल-आपने 2011 में प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा था जिसमें कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए थे। साथ ही उनके खिलाफ जांच की मांग की थी। आपकी भविष्य की योजनाओं में फिलहाल यह मुद्दा कहां है ?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है कि भ्रष्टाचार की शिकायत मिलने पर जांच का फैसला करने में चार महीने से अधिक का समय नहीं लगाया जा सकता। साथ ही यह भी कहा गया है कि जांच के लिए अनुमति लेने की कोई जरूरत नहीं है। &lt;blockquote&gt;मैं दो-तीन दिनों में सीबीआई को ऐसे दस्तावेज भेजने वाला हूं, जिसके आधार पर मांग करुंगा कि वह सोनिया गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करे।&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- आप जनता पार्टी के अध्यक्ष हैं। आपकी आगे की योजना क्या है&lt;/span&gt;?&lt;br /&gt;जवाब- पुराना जनसंघी हूं। जनता पार्टी में जनसंघ का विलय हो, मैं इसके पक्ष में कभी नहीं था। खैर, ये सब चलता रहा। बाद में जब शंकराचार्य की गिरफ्तारी हुई तो मैं आगे आया और उन्हें छुड़वाने में भूमिका निभाई। इसके बाद जो घटनाक्रम रहा, धीरे-धीरे उसकी वजह से विश्व हिन्दू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से मेरी निकटता बढ़ी। इसी दौरान रामसेतू का भी मामला उठा तो संबंध बनते गए। आज वे सभी चाहते हैं कि हिन्दुओं को यदि इकट्ठा करना है तो भाजपा के साथ मिलकर मुझे काम करना चाहिए। बातचीत भी हुई है कि मैं एनडीए का सदस्य बनूं। अब देखते हैं, आगे क्या होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;(डॉ.स्वामी से मेरी यह बातचीत 3 फरवरी,2012 को हुई है। पूरी बातचीत प्रथम प्रवक्ता के आगामी अंक में पढ़ सकते हैं)&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-6168309413390212547?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/6168309413390212547/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=6168309413390212547' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/6168309413390212547'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/6168309413390212547'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2012/02/blog-post.html' title='सोनिया गांधी के खिलाफ करुंगा जांच की मांग: डॉ.स्वामी'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-cVB1ngxmeBM/Ty52aROx_nI/AAAAAAAAAZc/2dy-tfCvJ8o/s72-c/Subramaniam_Swamy_PTI.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-4856692074338832498</id><published>2012-01-25T03:43:00.000-08:00</published><updated>2012-01-25T03:45:23.734-08:00</updated><title type='text'>मैदान के सिपाही, आंगन में उलझन</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-wYAZEfmSI94/Tx_rK1t3p5I/AAAAAAAAAZQ/IxHwrxszGjA/s1600/Digvijay_Singh_8636.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 273px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-wYAZEfmSI94/Tx_rK1t3p5I/AAAAAAAAAZQ/IxHwrxszGjA/s400/Digvijay_Singh_8636.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5701534224725026706" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिल्कुल आखिरी समय में भाजपा नेतृत्व ने घोषणा की। कहा है कि उमा भारती उत्तर प्रदेश के ‘चरखारी’ विधानसभा सीट से चुनाव लड़ेंगी। हालांकि, यह आधी घोषणा है। पूरी घोषणा के लिए अब भी सही समय का इंतजार हो रहा है। उमा भारती के संबंध में लिया जाने वाला हर फैसला पार्टी अध्यक्ष नितिन गडगरी के लिए चुनौती-पूर्ण रहा है। वह उमा भारती की पार्टी में वापसी की घोषणा का हो या कोई और। नितिन गडकरी को हर जगह अग्नि-परीक्षा देनी पड़ी है। इसलिए वे फूंक-फूंककर कदम बढ़ाना चाहते हैं, सो फिलहाल आधी घोषणा ही की है। इसकी वजह कोई बाहरी नहीं है, बल्कि उमा भारती की लोकप्रियता और पार्टी के अंदरखाने की राजनीति है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ दिग्विजय सिंह हैं। वे भी मध्य प्रदेश से हैं। पिछले दो सालों से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को स्थापित करने में जुटे हैं। कहा जाता है कि वे राजीव गांधी के करीबी लोगों में थे। एक साक्षात्कार में वे स्वयं कह चुके हैं कि राजीव गांधी का मुझे बहुत स्नेह मिला। तो क्या दिग्गी राजा इन दिनों उस स्नेह का कर्ज चुकाने में लगे हैं! खैर, जो भी हो, यह तो साफ-साफ नजर आता है कि वे अपनी ही केंद्र सरकार को कटघरे में लाकर मुसलमानों की तरफदारी का सिलसिला चलाए हुए हैं। वह भी पिछले दो सालों से। दिग्गी राजा यह सब हवा में नहीं कर रहे हैं। कांग्रेस की राजनीति को जो लोग जानते-समझने हैं, उनका कहना है कि दिग्विजय सिंह विधानसभा चुनाव के मद्देनजर फार्मूले की राजनीति कर रहे हैं, ताकि पार्टी को जीत मिले और सूबे में वह अपना पांव जमा सके। फिलहाल ऐसी राजनीति उनकी मजबूरी है, क्योंकि इस बात को वे अच्छी तरह जानते-समझते हैं कि उत्तर प्रदेश में पार्टी संगठन के स्तर पर दूसरी पार्टियों के मुकाबले काफी कमजोर है। वहीं पार्टी का खोया जनाधार भी तत्काल वापस लाना एक बड़ी चुनौती है, इसलिए सूबे में वे फार्मूले की राजनीति में डूबे हैं। मंजिल तक पहुंचने का यही उनके लिए एक मात्र सरल रास्ता है, जिससे चुनाव में पार पाने के साथ-साथ वे युवराज को सूबे में स्थापित कर सकते हैं। पर, चुनाव देख मौसमी पक्षी उड़ने लगे हैं। सूबे में मुसलमानों की दो पार्टियां बन गई हैं। पहली- पीस पार्टी है, जबकि दूसरी का नाम ‘कौमी पार्टी’ है। ये मौसमी पक्षियां उनके लिए समस्या ही हैं, क्योंकि इनकी गतिविधियां कहीं दिग्गी राजा व राहुल की मेहनत पर पानी न फेर दे। वैसे, कांग्रेस की गतिविधि को देखकर राजनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि अब राजनीति संगठन बनाकर नहीं हो रही है, बल्कि पार्टियां फार्मूले पर आधारित राजनीति कर रही हैं, इसलिए पार्टी कार्यकर्ता नाम की चीज भी खत्म हो रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, 1993 तक दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे। इसी साल कांग्रेस को वहां के विधानसभा चुनाव में जीत मिली तो वे सूबे के मुख्यमंत्री बनाए गए। तब अजित जोगी, मोतीलाल वोरा, विद्याचरण शुक्ल, कमलनाथ जैसे नेता उनके प्रतिद्वंद्वी थे। लेकिन उस वक्त अर्जुन सिंह ने दिग्गी राजा का ही नाम आगे बढ़ाया था। 1998 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने पार्टी नेतृत्व को इस शर्त पर पुन: चुनाव जीतकर आने का आश्वासन दिया  था कि उन्हें टिकट बंटवारे की पूरी छूट दी जाए। उन्हें यह छूट मिली और पार्टी एक बार फिर सत्ता में आई। कहा जाता है कि तब टिकट बंटवारे के काम में प्रदेश की नौकरशाही ने उनकी खूब मदद की थी। पर, 2000-2003 में उन्हें दो तरफ से चुनौतियां मिलने लगी थीं। एक यह कि उमा भारती मध्य प्रदेश में सक्रिय हो गई थीं। राम मंदिर के साथ-साथ मंडल आंदोलन का जो जन-उभार था, वह पूरी तरह उमा भारती के पक्ष में था। दूसरी बात कांग्रेस पार्टी के अंदर भी विरोध के स्वर उठने लगे थे। अंतत: 2003 के चुनाव में दिग्विजय की राजनीतिक पराजय हुई। इस चुनावी हार के बाद वे प्रदेश से विस्थापित भी हो गए। सूबे में उनकी सक्रियता कम से कमतर होती चली गई। अब करीब 10 साल बाद वे उत्तर प्रदेश में पार्टी के सर्वेसर्वा हैं। उम्मीदवारों के चयन में उनकी खूब चली है। सो बुंदेलखंड में खुले तौर पर कहा जा रहा है कि वे अपने रिश्तेदारों को टिकट दिला रहे हैं। इससे सूबे के नेता खफा हैं। दिग्गी राजा का तैयार किया गया समीकरण गड़बड़ हो रहा है। अब इस समस्या से पार पाना उनके लिए चुनौती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहीं उमा भारती की स्थिति भिन्न है। पार्टी की कमान इनके हाथों में नहीं है। वह छह साल बाद पार्टी में आई हैं। हालांकि, इससे पार्टी को एक जननेता मिला है। पार्टी को संगठित करने में भी मदद मिली है। कार्यकर्ताओं में उत्साह लौटा है। वहीं संगठन जो बेजान था, उसे इसी बहाने संजय जोशी ने मजबूत करने की कोशिश की है। पर, सबकुछ उमा भारती के अनुकूल नहीं है। सूबे के दौरे में जब उन्हें जन समर्थन मिलना शुरू हुआ तो प्रदेश के नेताओं ने इसे अपने लिए ठीक संकेत नहीं माना। भरसक कोशिश की गई कि उमा भारती सूबे में कोई असर न डाल सकें। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इन मुश्किलों से उमा भारती कैसे पार पाती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गौरतलब है कि 1991 में जब भाजपा अपने बल पर सत्ता में आई थी तो उसे 228 सीटें मिली थीं। हालांकि, तब विधानसभा में 425 सीटें थीं। हालांकि, उस चुनाव को प्रभावित करने वाले कई कारक थे। पार्टी को अयोध्या आंदोलन का फायदा मिला था, जबकि पार्टी के नेता और विरोधी दलों को इस बात का अंदाजा नहीं था। उस समय पार्टी का जो वर्ग चरित्र था, उसमें कल्याण सिंह का नेतृत्व पार्टी के लिए अनुकूल था। सवर्ण पार्टी के समर्थक थे, जबकि पिछड़े वर्ग से पार्टी का नेता था। एक बार फिर यह कमी पूरी हो सकती है। बशर्ते पार्टी का सवर्ण नेतृत्व उमा भारती को अपना स्वाभाविक नेता माने, पर इससे उलटा हो रहा है। प्रदेश के ज्यादातर नेता उन्हें निष्प्रभावी बनाने में लगे हैं। भाजपा को जानने वाले बताते हैं कि सूबे में पार्टी को तभी सफलता मिल सकती है जब सहयोगी संगठन और पार्टी पूरी ताकत से इसमें लगेगी। अब देखना यह है कि एक-दूसरे के आमने-सामने कई चुनावों में आ चुके दिग्गी राजा और उमा भारती यहां अपनी ही मुश्किलों से कैसे पार पाते हैं। मैदान के सिपाही तो फिलहाल आंगन की उलझनों से ही मुक्त नहीं हो पा रहे हैं, जबकि रणभेरी बज चुकी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-4856692074338832498?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/4856692074338832498/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=4856692074338832498' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/4856692074338832498'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/4856692074338832498'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2012/01/blog-post_25.html' title='मैदान के सिपाही, आंगन में उलझन'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-wYAZEfmSI94/Tx_rK1t3p5I/AAAAAAAAAZQ/IxHwrxszGjA/s72-c/Digvijay_Singh_8636.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-6757321550017122227</id><published>2012-01-02T05:33:00.000-08:00</published><updated>2012-01-02T05:42:48.224-08:00</updated><title type='text'>भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी से बातचीत</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-zfqnSBhaH_w/TwGzXgWg9DI/AAAAAAAAAZE/hBN5vRF3F28/s1600/BJP-President-Nitin-Gadkari.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 337px; height: 223px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-zfqnSBhaH_w/TwGzXgWg9DI/AAAAAAAAAZE/hBN5vRF3F28/s400/BJP-President-Nitin-Gadkari.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5693028620375749682" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए सभी पार्टियों ने अपने उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं। भाजपा काफी देरी से उम्मीदवारों के नाम घोषित कर रही है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- हमारी संसदीय बोर्ड (पार्लियामेंट्री बोर्ड) की बैठक चल रही है। हमलोग जल्दी ही सभी उम्मीदवारों के नामों की घोषणा करने वाले हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- मुख्यमंत्री पद के लिए पार्टी की रणनीति क्या होगी?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- हमलोगों ने यह तय किया हुआ है कि पार्टी राजनाथ सिंह, उमा भारती, कलराज मिश्र और प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही के नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी। चुनाव में जो लोग चुनकर आएंगे, वे लोग ही अपने नेता का चयन करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- तो क्या पार्टी चुनाव लड़ रही है और उसमें से सामुहिक नेतृत्व को उभार रही है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- यहां सामुहिक नेतृत्व को उभारने का प्रश्न नहीं है। लोकतंत्र में तो चुनाव जीतकर आने वाले लोग ही अपने नेता का चुनाव करते हैं। हां, कभी-कभी जब सर्वसम्मति से नेता तय रहता है तो उनके नेतृत्व में पार्टी चुनाव लड़ती है। फिलहाल तो हम उत्तर प्रदेश में इन चारो नेताओं के नेतृत्व में चुनाव लड़ेंगे। इसके बाद चुनाव जीतकर आने वाले विधायक अपने नेता का चुनाव करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- भारतीय जनता पार्टी में ही कई लोग मानते हैं कि टिकट बंटवारे को लेकर होने वाली देरी से पार्टी को नुकसान हो रहा है। आपका क्या विचार है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- नहीं, बिल्कुल नुकसान नहीं होगा। आप देखेंगे कि जिन-जिन लोगों ने अपने उम्मीदवारों के नाम पहले ही घोषित किए हैं, वे बार-बार अपने टिकट बदल रहे हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि पहले नाम घोषित करने के बावजूद उन्हें कोई फायदा नहीं हुआ। वैसे भी मैं इसे सही नीति नहीं मानता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- क्या टिकट बंटवारे को लेकर नए-पुराने चेहरों के बीच आपने कोई खास रणनीति बनाई है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- पार्टी के कार्यकर्ता जिनके साथ हैं और जो जनता में लोकप्रिय है, उन्हें ही हम टिकट देंगे।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल-कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश चुनाव में टिकट बंटवारे को लेकर आप पर काफी दबाव है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- यह सच नहीं है। मेरे ऊपर किसी का दबाव नहीं है। मैं सोच-विचार कर निर्णय कर रहा हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- आज उत्तर प्रदेश में भाजपा दूसरी पार्टीयों के मुकाबले कहां खड़ी है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- देखिए, उत्तर प्रदेश में लोगों ने मुलायम सिंह जी के गुंडाराज को पूरी तरह से खारिज कर दिया था और फिर इसके विकल्प में लोगों ने मायावती जी को चुना था। पर इनके कार्यकाल में भ्रष्टाचार अपने चरम पर है। जनता इनकी सरकार को हटाना चाहती है। कांग्रेस की नैया भी डूब रही है। अब ऐसी स्थिति में लोगों के पास भाजपा एक बेहतर विकल्प है। प्रदेश की स्थिति तेजी से बदल रही है। इससे मुझे उम्मीद है कि चुनाव के नजदीक आते-आते हमारे पुराने वोटर और समर्थक वापस आएंगे और भाजपा बहुमत की ओर बढ़ेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- मायावती सरकार ने प्रदेश को चार भागों मे बांटने और कांग्रेस पार्टी मुस्लिम आरक्षण की बात कह कर अपने-अपने दाव चल रही है। भाजपा ने इससे निपटने की क्या रणनीति बनाई है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- भारतीय जनता पार्टी 21वीं सदी और विकास की राजनीति करना चाहती है। हम समाज को एक करना चाहते हैं। जाति, पंत, धर्म, भाषा और लिंग के आधार पर उसको विभाजित करना हमें कभी भी मंजूर नहीं है। अब देखिए, क्या हो रहा है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने ही कहा है कि हम धर्म के आधार पर आरक्षण न दें। जाति के आधार पर जो सामाजिक, आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हैं, उन्हें आरक्षण मिल रहा है। वहीं मुस्लिम समाज में भी जो लोग ओबीसी के अंतर्गत आते हैं उन्हें भी इसका लाभ मिल रहा है। अब हमने धर्म के आधार पर आरक्षण देना शुरू किया तो इससे नए प्रश्न उठेंगे। संविधान में भी यह मान्य नहीं है। केवल वोट बैंक की राजनीति के लिए ऐसी बातें करना और लोगों के बीच झगड़े लगा देना, देश के लिए स्वास्थकर नहीं है। जनता को कांग्रेस की इस राजनीति को समझना चाहिए।&lt;br /&gt;अब रही बात मायावती जी की तो उन्हें पिछले साढ़े चार सालों में राज्य को विभाजित करने की बात क्यों नहीं सूझी। ठीक चुनाव से पहले यह निर्णय क्यों लिया गया। नए राज्यों के निर्माण से पहले उसकी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति का गहरा अध्ययन किया जाना चाहिए। यहां जब चुनाव सिर पर है और इसमें हारने की प्रबल संभावना है तो नई-नई घोषणाएं करना ठीक नहीं। इसमें चुनावी राजनीति का सस्तापन दिखता है। जनता इस बात को समझती है। उसे इन पार्टियों से सावधान रहना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- क्या भाजपा चुनाव के बाद किसी अन्य पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाना चाहेगी?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- हमलोगों ने तय किया है कि चुनाव से पहले और उसके बाद किसी भी परिस्थिति में मुलायम सिंह यादव और मायावती जी के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेंगे। जिन लोगों से हमारे विचार नहीं मिलते। सिद्धांत विपरीत हैं। उनसे समझौता करने से क्या फायदा। इसके परिणाम तो हम भुगत चुके हैं। आज उत्तर प्रदेश में जो हमारी पार्टी पीछे आई, इसका कारण है कि हमने मायावती और मुलायम सिंह जी के साथ समझौते किए थे। हमारा वोटर इन बातों को कभी बर्दास्त नहीं करता। &lt;br /&gt;वैसे भी ये लोग तो कांग्रेस से ही मिले हुए हैं। जब-जब यूपीए सरकार संकट में आती है तो ये लोग उसके समर्थन में आगे आ जाते हैं। पीएसी में दोनों ने कांग्रेस की मदद की। परमाणु ऊर्जा के मामले में जब अविश्वास प्रस्ताव आया तो मुलायम सिंह जी ने बहिर्गमण किया और मायावतीजी ने समर्थन में वोट डाला। इन बातों को ध्यान में रखकर ही हमलोगों ने अपनी नीति बनाई है। उत्तर प्रदेश की जनता भी इन बातों को समझ रही है। वहां माहौल बदल रहा है। मुझे उम्मीद है कि चुनाव तक हम ऐसी स्थिति में होंगे कि अपने दम पर सरकार बना सकें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल-अन्ना जनलोकपाल को लेकर फिर आंदोलन तेज करने की तैयारी में हैं। क्या आने वाले चुनाव में भाजपा को इसका फायदा मिलेगा?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- यह तो समय ही बताएगा। मैं यह मानता हूं कि अन्नाजी का आंदोलन राजनीति से प्रेरित नहीं है, बल्कि यह भ्रष्टाचार मुक्त भारत के निर्माण के लिए है, जबकि कांग्रेस की सरकार एक से बढ़कर एक घोटाले कर रही है। कॉमनवेल्थ गेम में भ्रष्टाचार, 2जी स्पेक्ट्रम में घोटाला, ब्लैक मनी में 850 लोगों के नाम हैं, पर उनके नाम सरकार जाहिर नहीं कर रही है। इन सब की कीमत तो उन्हें चुकानी होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- उमा भारती ने बनारस में पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बताया था, जबकि उसी दिन पार्टी प्रवक्ता ने इसका खंडन कर दिया। तो पार्टी की नीति क्या है&lt;/span&gt;?&lt;br /&gt;जवाब- इसमें आडवाणीजी स्वयं अपनी बात स्पष्ट कर चुके हैं और मैं भी कह चुका हूं। मुझे लगता है कि बार-बार उन बातों को दोहराने की कोई आवश्यकता नहीं है। मैंने यह कहा है कि हमारी पार्टी में कई ऐसे नेता हैं, जिनमें प्रधानमंत्री पद को संभालने की पूरी क्षमता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- पार्टी अध्यक्ष बनते ही आपने कहा था कि पुराने लोगों को पार्टी में लाने की कोशिश करेंगे। जैसे- उमा भारती, कल्याण सिंह, गोविंदाचार्य आदि। पार्टी में उमा भारती, संजय जोशी लौट चुके हैं। अब किसका इंतजार किया जाए?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- किसी का इंतजार हो ऐसी बात नहीं है। हमने यह नीति बनाई है कि जो भी पुराने कार्यकर्ता थे उन्हें पार्टी से जोड़ा जाना चाहिए, क्योंकि वे विचारों के लिए काम कर रहे थे। यदि पार्टी को उनका सहयोग मिल सकता है तो उन्हें अवश्य लाना चाहिए। और केवल यही नाम नहीं हैं। हमने देशभर में पुराने छोटे-बड़े कार्यकर्ताओं को पार्टी से जोड़ा है। वे अब संगठन को मजबूत करने के लिए काम कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- कई लोगों का मानना है कि गोविंदाचार्य को पार्टी में लाया जाना चाहिए?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- जिनको पार्टी में लाना है, उनकी भी तो इच्छा होनी चाहिए। हम तो सभी को जोड़ना चाहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;(ये बातचीत श्रुति और ब्रजेश ने की है)&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-6757321550017122227?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/6757321550017122227/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=6757321550017122227' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/6757321550017122227'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/6757321550017122227'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी से बातचीत'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-zfqnSBhaH_w/TwGzXgWg9DI/AAAAAAAAAZE/hBN5vRF3F28/s72-c/BJP-President-Nitin-Gadkari.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-7086282261936908573</id><published>2011-11-06T23:41:00.000-08:00</published><updated>2011-11-07T00:09:46.838-08:00</updated><title type='text'>अब कश्मीरियत समस्या का समाधान नहीं- दिलीप पडगांवकर</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;हालांकि, कश्मीर मसले पर पहले भी भारत सरकार ने कई वार्ताकार नियुक्त किए, लेकिन यह पहली समिति है, जिसने बीते 11 महीने में राज्य के सभी जिलों के हर समुदायों के प्रतिनिधियों से मिलकर उनकी समस्याओं को समझने में लगाया। इसने 12 बार राज्य का गहन दौरा किया। हर बार एक रिपोर्ट अपने अनुभव के आधार पर गृह मंत्रालय को सौंपी। उन दिनों खासकर कुछ अंग्रेजी अखबारों ने उसके बारे में खबरें इस तरह छापीं जिससे लगा कि उनके पास रिपोर्ट की कॉपी हो। वार्ताकारों के मुताबिक उन खबरों में कोई सच्चाई नहीं होती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब 13वीं और आखिरी रिपोर्ट गृह मंत्री पी.चिदंबरम को वार्ताकारों ने सौंप दी है, तब समिति के अध्यक्ष&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; दिलीप पडगांवकर&lt;/span&gt; ने &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;रामबहादुर राय&lt;/span&gt; और &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ब्रजेश कुमार&lt;/span&gt; से खुली बातचीत की। इस बातचीत में उन्होंने रिपोर्ट के वे अंश बताए जिससे उसके बारे में एक परिप्रेक्ष्य सामने आता है। पूरी बातचीत यहां पढ़ सकते हैं-&lt;br /&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-S70N0_TmNUQ/TreRZ2RnufI/AAAAAAAAAY4/I9oTJmvcl4Y/s1600/dileep.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 220px; height: 280px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-S70N0_TmNUQ/TreRZ2RnufI/AAAAAAAAAY4/I9oTJmvcl4Y/s400/dileep.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5672162128948607474" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दिलीप पडगांवकर&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- वार्ताकार की समिति क्यों बनी ?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- 2010 में कश्मीर के हालात काफी बिगड़ गए थे। उसी वर्ष गर्मी के मौसम में पत्थरबाजी पर सुरक्षाकर्मियों की कार्रवाई में करीब 120 बच्चे मारे गए थे। इसके बाद दिन-प्रति-दिन स्थितियां बिगड़ती गईं। सितंबर, 2010 में सभी पार्टियों का एक प्रतिनिधिमंडल जम्मू-कश्मीर गया। वहां उसने सभी लोगों से बातचीत की, जिसमें अलगाववादी नेता भी शामिल थे। दिल्ली लौटकर प्रतिनिधिमंडल ने सरकार को एक रिपोर्ट दी, जिसमें कई सुझाव भी दिए गए। उस रिपोर्ट में एक सुझाव यह भी था कि भारत सरकार को एक ऐसी समिति बनानी चाहिए जो जम्मू-कश्मीर जाकर सभी क्षेत्र और वर्ग के लोगों से मिले। और फिर यह रिपोर्ट दे कि आखिर वे लोग क्या चाहते हैं। इसके बाद 13 अक्टूबर, 2010 को सरकार ने तीन सदस्यों की एक समिति बनाई। इसमें पूर्व सूचना आयुक्त एम.एम अंसारी, शिक्षाविद राधा कुमार और मैं शामिल किया गया। साथ ही मुझे इस समिति का अध्यक्ष बना दिया गया। इसके बाद जो काम हमें सौंपा गया वह यह था कि हमलोग प्रत्येक महीने जम्मू कश्मीर जाएं। वहां विभिन्न लोगों से मिलकर यह जानने की कोशिश करें कि इस राज्य की समस्या का राजनीतिक समाधान क्या हो सकता है।&lt;br /&gt;हमलोगों ने अपना काम तत्काल शुरू किया। बीते 11 महीने में हमलोग 12 बार जम्मू कश्मीर गए। राज्य के सभी 22 जिलों का दौरा किया। वहां लोगों से मिले। 700 से अधिक प्रतिनिधिमंडल हमसे मिलने आए जो समाज के हर वर्ग से थे। इसमें छात्र, शिक्षक, धार्मिक नेता, मानवाधिकार संगठन और गैर सरकारी संस्था से जुड़े लोग थे। हां, राजनीतिक पार्टियां भी थीं। इस दौरान हमने तीन गोलमेज सम्मेल भी किए। दो श्रीनगर में और एक जम्मू में। पहले सम्मेलन में राज्य के तीनों क्षेत्रों (जम्मू, कश्मीर और लद्दाख) से महिलाएं आईं। सम्मेलन में उन लोगों ने अपना पक्ष रखा। दूसरे में मूलत: शिक्षाविद व बुद्धिजीवी थे। तीसरा सम्मेलन हमलोगों ने जम्मू में किया था। इसमें कला-संस्कृति से जुड़े लोग राज्य के तीनों क्षेत्रों से आए थे। आखिर में हमलोगों ने तीन नागरिक सभाएं भी की थीं। इस दौरान लोगों ने दिल की बातें बताईं। फिर इसी बातचीत को हमलोगों ने अपनी रिपोर्ट का प्राथमिक स्रोत भी बनाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- जब आप यह जिम्मेदारी ले रहे थे तो क्या उस समय आपके मन में कोई हिचक थी?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- हम तीनों में दो लोगों का कश्मीर से पुराना ताल्लुक रहा है। राधा कुमार पिछले 15-16 सालों से कश्मीर मामले पर काम कर रही हैं। वह कई बार वहां जा चुकी हैं। स्थानीय लोग उन्हें निजी तौर पर जानते हैं। और मैं कश्मीर मसले पर 2002 में राम जेठमलानी की अध्यक्षता में बनी समिति का सदस्य था। तब हमलोग श्रीनगर, जम्मू और दिल्ली में कई लोगों से मिले थे। इसके अलावा हम दो लोगों की कश्मीर मामले में गहरी रुचि भी रही है। पर हां, जब समिति बनी तो मन में एक तरह का शक था। वह यह कि पिछले 63 सालों में कई बड़े अनुभवी लोगों ने इस मसले को हल करने की कोशिश की है। इसके बावजूद वे सफल नहीं हो सके। ऐसे में हम आगे कैसे बढ़े और इस पेंचीदे सवालों का कैसे सामना करें, यह बात मन में जरूर थी। लेकिन, दो दौरे के बाद हमें कई चीजें महसूस हुईं। और फिर उसी के आधार पर हमलोग आगे बढ़े।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- जिस काम को आपकी समिति ने पूरा किया है, क्या ऐसे कामों के लिए पहले भी कोई समिति बनी थी?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- इससे पहले दो वार्ताकार नियुक्त किए गए थे, जिसमें एक के.सी.पंत साहब थे। दूसरे एन.एन.वोहरा साहब। लेकिन, उनके काम और हमारे काम में फर्क यह रहा कि उनकी बातचीत बहुत कम लोगों से हुई। ज्यादातर बातचीत या मुलाकातें तो सर्किट हाउस या फिर गेस्ट हाउसों में हुईं। जबकि, हमलोग ने सभी जिला मुख्यालयों और कई गांवों में जाकर लोगों से मुलाकात की है। मैं समझता हूं कि पिछले 60 सालों में ऐसी कोई समिति या टीम नहीं है, जिसने इतना सधन दौरा किया और इतने लोगों से बातचीत की हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल-इस दौरान आपका अनुभव क्या रहा?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- अनुभव यह रहा कि राज्य के सभी इलाकों में लोग पीड़ित हैं और उसकी वजह अलग-अलग है। उन लोगों ने बातचीत के दौरान जो बताया और मेमोरेंडम दिए, उनमें से सत्तर प्रतिशत मानवाधिकार और सरकार के बारे में थे। उन लोगों ने कई बातें कहीं। एक तो उन्होंने यह बताया कि ऐसे कई कैदी हैं जो पिछले आठ-नौ सालों से जेल में बंद हैं, लेकिन उनके मामले की अदालती सुनवाई अबतक नहीं हुई है। प्रांतीय सशस्त्र बल (पीएसी) की तैनाती के बाद दिन-ब-दिन लोगों के हालात बिगड़ रहे हैं। दूसरी बात यह बताई कि नौकरी एक बड़ा सवाल है। युवकों को नौकरियां नहीं मिल रही हैं। इससे वे आतंकवादियों के साथ जा रहे हैं।&lt;br /&gt;इसके बाद जब हमने उनसे राजनीतिक अभिलाषा की बात की तो पाया कि वह एक-दूसरे से काफी भिन्न है। कश्मीर घाटी के लोग अलग तरह की उम्मीद रखते हैं। जबकि, जम्मू और लद्दाख के लोग दो भिन्न तरीके से सोचते हैं। इतना ही नहीं, इन तीनों क्षेत्रों के अंदर भी लोगों की सोच अलग-अलग है। मसलन कारगिल के लोगों की राजनीतिक अभिलाषा लेह के लोगों से बिलकुल भिन्न है। ठीक उसी तरह जम्मू के पांच मुस्लिम बहुसंख्य जिलों के लोगों की राजनीतिक अभिलाषा जम्मू शहर के लोगों से भिन्न है। अब जब इतनी विविधताएं हैं और लोगों की अलग-अलग उम्मीदें हैं तो फिर इनको कैसे एक साथ संबोधित किया जाए, यह सबसे बड़ा सवाल हमारे सामने था। मैं समझता हूं कि इन सवालों से गुजरने के बाद हमने जो सुझाव अपनी रिपोर्ट में दिए हैं, उससे शायद कोई रास्ता निकले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- आपकी नजर में कश्मीर समस्या क्या है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- मेरी नजर में तो इसके तीन पहलू हैं। पहला तो यह कि केंद्र और राज्य का संबंध। हमलोग जानते हैं कि विलय-पत्र पर जब महाराजा हरिसिंह ने हस्ताक्षर किए थे तो उस समय भारत सरकार के पास केवल तीन विषय थे विदेश नीति, रक्षा और कम्युनिकेशन। इसके अलावा सारे विषय राज्य के अधीन थे, लेकिन उसके बाद संविधान में अनुच्छेद 370 के महत्व को धीरे-धीरे कम करने की कोशिश हुई, जिसने जम्मू कश्मीर को एक अलग पहचान दी थी। भारत सरकार के कई कानून और संविधान के अनुच्छेद वहां लागू किए गए। इससे कश्मीर घाटी के लोग नाखुश थे। लेकिन, लद्दाख और जम्मू के बहुत सारे लोग खुश हुए, क्योंकि वे लोग भारत के साथ अधिक से अधिक जुड़ना चाहते थे।&lt;br /&gt;समस्या का दूसरा पहलू राज्य के आंतरिक क्षेत्रों से जुड़ा है। जैसे कि लद्दाख और जम्मू के लोग घाटी के लोगों से काफी नफरत करते हैं। वे आरोप लगाते हैं कि उनके साथ विभेदकारी व्यवहार किया गया है। यदि वे एक लाख लोग मिलकर एक विधायक को चुनते हैं तो घाटी में 83 हजार लोग एक विधायक को चुनते हैं। इसका अर्थ यह है कि घाटी के राजनेताओं को हमेशा सात सीटें अधिक मिलती हैं। हालांकि, आबादी कमोबेश एक ही है। दूसरी बात यह है कि वे लोग बताते हैं कि जम्मू कश्मीर लोक सेवा में ज्यादातर घाटी के ही लोग हैं। लद्दाख और जम्मू क्षेत्र के लोगों की संख्या काफी कम है। इतना ही नहीं, विकास निधि के नाम पर जो बजट आता है वह भी घाटी के नाम पर ही होता है। लद्दाख और जम्मू के हिस्से में तो इस बजट का नाम-मात्र ही आता है। सो इन बातों को लेकर लद्दाख और जम्मू में घाटी के खिलाफ सेंटिमेंट्स हैं। यह वहां की आंतरिक संरचना है, जिसपर पिछले 50 सालों में कई बार चर्चा हो चुकी है। बार-बार यह कहा जाता रहा है कि जबतक अधिकारों का इन तीनों क्षेत्रों में विकेंद्रीकरण नहीं किया जाएगा, तबतक स्थितियां नहीं बदलने वाली हैं।&lt;br /&gt;इसका तीसरा पहलू पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) से जुड़ा है। लाइन ऑफ कंट्रोल (एलओसी) ने बहुत सारे समुदायों को बांट दिया है। दोनों तरफ पहाड़ियां है। गुर्जर समुदाय के लोग हैं। गिलगिट को ही लें, वहां कई परिवारों के रिस्तेदार व पुरखे गिलगिट बलचिस्तान से हैं। यहां अचरज की बात यह है कि जब हम पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) की बात करते हैं, जिसे वे लोग आजाद कश्मीर कहते हैं तो वहां कश्मीरी बोलने वालों या एथनिक कश्मीरियों की आबादी एक प्रतिशत से भी कम है। हमें इस जनसांख्यकीय संरचना पर भी गौर करना चाहिए। क्योंकि, 1994 की बात है। संसद की एक रिजोल्युसन है जो कहती थी कि एक ही सवाल है वह यह कि पीओके को भारत में शामिल किया जाना चाहिए। इस तरह मेरी नजर में कश्मीर समस्या के तीन पहलू हैं। पहला केंद्र-राज्य संबंध। दूसरा आंतरिक शक्ति संरचना। और तीसरा पहलू जम्मू कश्मीर व पीओके से संबंधित है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- क्या कोई बाहरी शक्ति भी समस्या का कारण है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- हां, सबसे बड़ा कारण तो पाकिस्तान ही है। वह शुरू से ही जम्मू कश्मीर पर कब्जा करना चाहता है। इसके लिए उसने तीन बार युद्ध भी किए। इतना ही नहीं, पिछले करीब 20 सालों से आतंकवादियों को पनाह देकर और प्रशिक्षित कर हमारे कश्मीर में जो कुछ किया है उससे सभी वाकिफ हैं। निश्चय ही कश्मीर समस्या का यह एक महत्वपूर्ण पहलू है और वह इसलिए है क्योंकि, पाकिस्तान ने इसे अपने अस्तित्व का मुद्दा बना रखा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- यह धारणा बनी है कि संवैधानिक व्यवस्था के अंदर ही सार्थक स्वायत्तता की सिफारिश आप लोगों ने की है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- नहीं, हमलोगों ने ऐसी कोई सिफारिश नहीं की है। मैं तो यह कहूंगा कि पूरे रिपोर्ट में &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हमलोगों ने कहीं भी स्वायत्तता शब्द का भी इस्तेमाल नहीं किया है।&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- कश्मीर जहां भारत का अभिन्न अंग है वहीं अनुच्छेद 370 के तहत उसे विशेष दर्जा भी प्राप्त है। रिपोर्ट में इसके बारे में क्या है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- जब रिपोर्ट प्रकाशित होगी तो आपको पता चलेगा। पर, मैं अनुच्छेद 370 के बारे में जरूर कह सकता हूं। गृहमंत्री पी.चिदंबरम ने जम्मू कश्मीर के बारे में कहा था कि यह एक यूनीक स्टेट है। एक तरफ तो यह भारत का अटूट अंग है, वहीं दूसरी तरफ इसे एक विशेष राज्य का दर्जा भी प्राप्त है, जो अनुच्छेद 370 से मिला है। इसके अलावा जम्मू कश्मीर का भी एक संविधान है जो राज्य को भारत का अभिन्न अंग घोषित करता है। तो &lt;blockquote&gt;जम्मू कश्मीर की ये दोनों पहचान है। वहां के लोगों की भी दो पहचान है। एक यह कि वे भारत के नागरिक हैं। और दूसरे वे स्टेट सब्जेक्ट्स भी हैं। देश में कहीं भी ऐसी दोहरी पहचान वाले लोग नहीं हैं। अब इनकी दोहरी पहचान को समझना बहुत जरूरी है। साथ ही इसे कैसे निभाया जाए, इसकी चर्चा हमने रिपोर्ट में की है।&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- कश्मीर में काफी विविधताएं हैं। देश में लोगों को इसकी जानकारी काफी कम है। वे समझते हैं कि जम्मू कश्मीर एक मुस्लिम बहुल राज्य है। पर ये विविधताएं भी संरक्षित हों और लोगों की राजनीतिक और आर्थिक महत्वाकांक्षाएं भी पूरी हों, इसके लिए आपने रिपोर्ट में क्या रुख अपनाया है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- पिछले 60 सालों से हम लगातार एक ही गलती करते आ रहे हैं और वह यह कि हमने पूरे जम्मू कश्मीर के मसले को सिर्फ और सिर्फ कश्मीर घाटी की आंखों से देखा है। मैं यह मानता हूं कि घाटी में सबसे ज्यादा हिंसाएं हुईं। वहां काफी लोग मारे गए, लेकिन यह भी सच है कि गुलाम नबी आजाद को छोड़ राज्य के सभी मुख्यमंत्री घाटी से रहे। अलगाववादी संगठनों का घाटी से ही रिश्ता रहा। इसलिए मीडिया और अन्य लोगों का ध्यान कश्मीर घाटी पर ही केंद्रित रहा। इससे लद्दाख और जम्मू क्षेत्र लगातार उपेक्षित होता गया। ऐसे में जब हम विविधता की बात करते हैं तो वह अनेक प्रकार की है। एक तो भाषाई है। राज्य में कम से कम आठ भाषाएं व बोलियां बोली जाती हैं। सांस्कृतिक विविधताएं वहां आपको काफी दिखेंगी। एक महत्वपूर्ण बात और है। यह बात जो कही जाती है कि जम्मू कश्मीर एक मुस्लिम बहुल राज्य है, एक नजर में तो यह सही है पर इसका मतलब यह नहीं कि इनके बीच फर्क नहीं है। पहला फर्क तो यही है कि सिया-सुन्नी दोनों यहां रहते हैं। राज्य में जो सुन्नी मुसलमान नियंत्रण रेखा (एलओसी) के नजदीक रहते हैं वे फकरवाल, गुर्जर, पहाड़ी आदि हैं। वे लोग अपनी भाषा-संस्कृति में कश्मीर घाटी से पूरी तरह अलग हैं। यहां डोगरा लोग हैं। इनका सम्पन्न साहित्य है। संस्कृति काफी समृद्ध है। और इनमें हिन्दू-मुसलमान का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि ये दोनों डोगरा हैं और स्वयं को राजपूत कहते हैं। साथ ही  इसपर गर्व करते हैं। यह जानकारी देश के लोगों को नहीं है। बाहर के लोगों की तो बात ही छोड़ दें। रिपोर्ट में हमने इस बात को इसलिए प्रमुखता से उठाया है, क्योंकि मैं मानता हूं कि प्रत्येक समुदाय को यह हक मिलना चाहिए कि वह अपनी सांस्कृतिक विरासत को जिंदा रख सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- तो क्या कश्मीरियत इनको जोड़ती है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- हां, हमने कश्मीरियत पर भी काफी ध्यान दिया है। एक जमाने में इसका बड़ा मतलब था। और वह यह था कि अगल-अलग धर्म को मानने वाले इकट्ठा रह सकते हैं। विभिन्न संस्कृतियों में जीने-रहने वाले समुदाय एक साथ रह सकते हैं। पर मैं समझता हूं कि कश्मीरियत का यह स्वरूप अब काफी कम हो गया है। वह कुछेक क्षेत्रों में सीमित होकर रह गया है। यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कश्मीर वादी का जो इस्लाम था जिसे हम सूफी इस्लाम कहते हैं, वह पिछले बीसेक सालों में प्रतिक्रियावादी हो गया है। वहाबी और सलाफियों की संख्या काफी बढ़ गई है। इससे वादी का जो सूफियाना रंग था वह धीरे-धीरे धुल गया। अत: मैं अब यह नहीं समझता कि किसी भी राजनीतिक समाधान के लिए कश्मीरियत कोई आधार बन सकता है।&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- इन यात्राओं के दौरान आपने वहां के प्रशासन को कैसा पाया और वहां की अर्थव्यवस्था कैसी है? क्या वहां भी भ्रष्टाचार है? इससे निपटने के आपने क्या उपाय सुझाए हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- वहां सरकार काफी कमजोर है। हम सब जानते हैं कि जम्मू कश्मीर के विकास के लिए 90 प्रतिशत राशि भारत सरकार उपलब्ध कराती है, पर वे खर्च भी नहीं कर पाते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि विकास राशि के सदुपयोग के लिए जैसा प्रशासन और तंत्र चाहिए वह राज्य में नहीं है। अब बात रही भ्रष्टाचार की। यह तो सभी जगहों पर है, लेकिन जम्मू कश्मीर का भ्रष्टाचार काफी गहरा व अलग है। वहां डल झील के निकट हमने जो घर देखे, वैसा घर भारत में कहीं और देखने को नहीं मिला। सवाल उठता है कि आखिर यह पैसा आया कहां से! क्योंकि वहां न तो कोई उद्योग है। कोई कल-कारखाने भी नहीं हैं। हां, कार्पेट इंडस्ट्री जरूर है। सूखा मेवा है। थोड़ा राजमा और चावल है। फर्निचर है, लेकिन बाकी सभी चीजें तो बाहर से ही लानी पड़ती हैं। ऐसी स्थिति में भी वहां इतनी क्रय क्षमता कहां से आती है। वहां के दुकानों और मॉल्स में सामान भरे पड़े हैं। इसका एक ही मतलब हो सकता है कि वहां भ्रष्टाचार बहुत ज्यादा है। हम देखते हैं कि केरल में भी लोगों की क्रय शक्ति बहुत है तो इसका अर्थ समझ में आता है। वहां के लोग खाड़ी देशों में काम करने जाते हैं और वहां से पैसा आता है। लेकिन ऐसी स्थित जम्मू कश्मीर में नहीं है। इसके बावजदू वहां लोगों की क्रय शक्ति कैसे बढ़ रही है। इससे साफ है कि सरकार कमजोर है व भ्रष्टचार चरम पर है। इससे घाटी में एक तरह का द्वेश पैदा हुआ है। वहां लोगों के बीच गहरा असंतोष है। वे मानते हैं कि भारत सरकार कुछ नहीं कर पा रही है। उनका कहना है कि भारत सरकार पैसा तो देती है पर इस बात पर ध्यान नहीं देती कि उसका फायदा नीचे तक पहुंचा या नहीं। यही वजह है कि भारत के खिलाफ वहां भावनाएं भड़क रही हैं।&lt;br /&gt;देश के दूसरे हिस्सों में आर्थिक विकास को तेज करने के लिए भारत सरकार ने जो पहल किए हैं, वह मॉडल जम्मू कश्मीर में कैसे लागू किया जाए, इस पर ध्यान देने की जरूरत है। वहां निवेश को कैसे बढ़ावा मिले, इसपर नीति बनाने पर बल देना होगा। तभी रोजगार के अवसर पैदा होंगे। मेरा ख्याल यह है कि जम्मू कश्मीर और दिल्ली के बीच एक नई आर्थिक नीति बने ताकि इन हालातों से निपटा जा सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- उन समूहों से बात क्यों नहीं की जो अलगाववादी माने जाते हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- मैंने जम्मू कश्मीर के अपने पहले दौरे में ही कहा था कि हमलोग अलगाववादियों से मिलना चाहेंगे। उनसे बातचीत करना चाहेंगे। वे हमें बताएं कि कब और कहां मिलना है। किन शर्तों पर मिलना है आदि-आदि। पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। हालांकि, इन बातों को हमलोगों ने बार-बार दोहराया। फिर हमें कहा गया कि आप उन्हें एक औपचारिक पत्र लिखें। एक-एक को वह पत्र भेजा गया, पर उनमें से किसी एक का भी जवाब नहीं आया। अब जब लोग कहते हैं कि आप उनसे नहीं मिले तो मेरा कहना है कि आप उनसे सवाल करिए कि उन्होंने ऐसा क्यों किया। हमारी तरफ से जो कोशिश होनी चाहिए थी वह हमने की। पर उनका कोई जवाब नहीं आया। और मैं यह भी जानता हूं कि उन लोगों ने क्यों बातचीत नहीं की। इसलिए मैंने कहा कि आप बताएं कि कब बातचीत करनी है, मैं तैयार रहूंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल- उन लोगों ने क्यों नहीं बातचीत की?&lt;br /&gt;जवाब- मेरे ख्याल में वे लोग बातचीत के लिए इसलिए आगे नहीं आए, क्योंकि वे जो भी करते हैं उसके लिए उन्हें पाकिस्तान से हरी झंडी मिलती है। इससे अलग जो लोग भारत सरकार से बातचीत करने को तैयार हुए थे उनकी हत्या कर दी गई। पिछले वर्ष गनी भट्ट ने भी साफ-साफ कहा था कि हमने भारतीय सेना के ऊपर हत्या के आरोप लगाए थे, पर यह सही नहीं है। वहां के लोगों ने इनकी हत्या की थी। तब भट्ट साहब के भाई की ही हत्या कर दी गई थी। मीर वाइज के पिता की हत्या की गई थी। लोन ब्रदर्स के पिता की भी हत्या हुई थी। क्योंकि ये तीनों चाहते थे कि भारत सरकार से बातचीत की जाए। तो यहां एक तरफ डर भी है। अत: वे तब तक कुछ नहीं कहना चाहेंगे जबतक पाकिस्तान से उन्हें बातचीत के लिए संकेत नहीं मिल जाते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल-इस रिपोर्ट में समस्याओं के हल हैं या आप लोग जिन लोगों से मिले उनकी भावनाओं का प्रकटीकरण है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब-रिपोर्ट से सभी अध्यायों में वहां की परिस्थिति का विश्लेषण है। फिर कहा है कि वहां के लोग क्या-क्या चाहते हैं। इसमें बात हमने अपने सुझाव दिए हैं। मैं पत्रकार हूं इसलिए कहता हूं कि उसमें एक हिस्सा रिपोर्टिंग का है, जबकि दूसरा विश्लेषण का।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल-रिपोर्ट में कितने अध्याय हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- रिपोर्ट में कुल छह अध्याय हैं। छह एनेक्सचर हैं। रिपोर्ट पूरी तरह कसी(कॉम्पैक्ट) हुई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल-आपने कहा कि रिपोर्ट में स्वायत्तता का कहीं जिक्र नहीं किया है तो मीडिया में जो चर्चा हो रही है, वह क्या है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- उसमें कोई सच्चाई नहीं है। फिलहाल रिपोर्ट में क्या है, यह सिर्फ चार लोग ही जानते हैं। मैं, मेरे दोनों साथी और गृह मंत्री पी.चिदंबरम। यहां मैं एक बार फिर कहूंगा कि रिपोर्ट में स्वायत्तता शब्द भी आपको नजर नहीं आएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- यह धारणा बनी है कि आपने तीन रिजनल काउंसिल की बात की है। स्वायत्तता न सही, पर क्या आपने इसकी सिफारिश की है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब-देखिए&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; रिजनल काउंसिल की बात हमने नहीं उठाई है। 1950 से ही इसपर चर्चा होती रही है। शेख अब्दुल्ला साहब ने पहली बार जवाहरलाल नेहरू के सामने इस बारे में कुछ कहा था। इसके बाद इस मसले पर तीन बार चर्चा हुई। उसपर रिपोर्ट हुई। हालांकि, उसपर कोई फैसला नहीं लिया गया। इन बातों से अलग इस मुद्दे पर सबसे गहरा काम बलराज पूरी ने किया है। हम जम्मू में उनसे कई बार मिल चुके हैं और मैं इतना कह सकता हूं कि उनका हमारी रिपोर्ट पर गहरा प्रभाव है।&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- इस रिपोर्ट को थोड़े से शब्दों में आप कैसे समझाएंगे?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- मैं यह कहूंगा कि जम्मू कश्मीर का बहुत कठिन मसला है। इसे हल करने के लिए इज्जत, इंसाफ और इंसानियत के आधार पर आगे बढ़कर हम कोई योजना बना सकते हैं। जम्मू कश्मीर के तीनों क्षेत्रों यानी जम्मू, लद्दाख और कश्मीर घाटी को और वहां रहने वाले विभिन्न समुदाय के लोगों को ये तीनों चीजें मिलनी चाहिए। हमने इसका बारीक विश्लेषण रिपोर्ट में किया है।&lt;br /&gt;आप पाएंगे कि वहां सबसे गंभीर समस्या कश्मीरी पंडितों की है। मैं कठोर शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहता, पर जिस तरह भारत सरकार और भारतीय मीडिया द्वारा उन्हें नजरअंदाज किया गया, वह बेहद दुखद है। वे लोग घाटी से भाग दिए गए। जम्मू की झुग्गियों में उनकी नई पीढ़ी आ गई, जिसे कश्मीर के बारे में कुछ पता तक नहीं है। वे बुरी स्थिति में हैं, लेकिन किसी पार्टी ने संसद में एक बार भी उनकी समस्याओं पर सवाल नहीं उठाए, क्योंकि वे संख्या में थोड़े लोग हैं। राजनेताओं के वोट बैंक नहीं हैं। इतना ही नहीं, वहां जब 109 बच्चों की हत्या हुई तब भी उसकी चर्चा नहीं हुई, जबकि आरुषि मर्डर केस की खूब चर्चा हुई। अब वे लोग पूछते हैं, कहते हैं कि आपकी हमारी समस्या को लेकर कोई इमानदार रुचि तो है ही नहीं। बस एक राजनीतिक फुटबॉल बनकर रह गया है जम्मू कश्मीर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल-पाक अधिकृत कश्मीर के बारे में क्या कहा है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब-&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हमने कहा है कि वहां जो रास्ते बंद हैं उन्हें खोलना चाहिए। व्यापार बढ़ना चाहिए। परिवारों की आवा-जाही आसान कर देनी चाहिए। साथ ही धीरे-धीरे स्थानीय स्तर पर उन मसलों पर भी चर्चा होनी चाहिए जो दोनों तरफ अमूमन एक से हैं।&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- आपकी सलाह क्या होगी, सरकार इस रिपोर्ट को कब सार्वजनिक करे?&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;जवाब- हमने कहा है कि जल्द से जल्द रिपोर्ट को पब्लिक डोमेन में लाना चाहिए। मुझे बताया गया है कि अगले दो-एक दिनों में गृह मंत्री इस मसले पर प्रधानमंत्री से बातचीत करेंगे। इसके बाद सर्वदलीय समिति दुबारा बुलाई जाएगी। उनसे रिपोर्ट पर चर्चा होगी। उनके विचार लिए जाएंगे। और फिर उसे ध्यान में रखते हुए आगे की प्रक्रिया होगी। हमारा काम 12 अक्टूबर, 2011 को समाप्त हो गया है। पर हमें बताया गया है कि सूचना प्राप्त करने के लिए हमारी जरूरत पड़ सकती है। ऐसे स्थिति में जब-जब सरकार चाहेगी, हम मौजूद होंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल-आपने एक बार कहा था कि हमारी रिपोर्ट से कोई खुश नहीं होगा। अब जब आपने रिपोर्ट सौंप दी है तो गृह मंत्री की क्या प्रतिक्रिया है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- नहीं, मैंने यह कभी भी नहीं कहा। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मैंने सिर्फ इतना कहा कि रिपोर्ट को लागू करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए। और मैं देख रहा हूं कि अभी वह राजनीतिक इच्छाशक्ति है। इसकी वजह जरूर अलग-अलग हैं।&lt;/span&gt; पर वह इच्छाशक्ति है। गृहमंत्री से हमारी कई बार बातचीत हो चुकी है। हम प्रधानमंत्री से भी मिल चुके हैं। यूपीए की अध्यक्ष से भी हमारी बात हुई है। तीनों से आश्वासन दिया है कि रिपोर्ट को जल्द से जल्द आगे ले जाएंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-7086282261936908573?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/7086282261936908573/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=7086282261936908573' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/7086282261936908573'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/7086282261936908573'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='अब कश्मीरियत समस्या का समाधान नहीं- दिलीप पडगांवकर'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-S70N0_TmNUQ/TreRZ2RnufI/AAAAAAAAAY4/I9oTJmvcl4Y/s72-c/dileep.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-6100033125777869901</id><published>2011-10-21T01:50:00.000-07:00</published><updated>2011-10-21T01:54:12.187-07:00</updated><title type='text'>उम्मीद में किया सरहद पार</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-SSvo-RHjR2o/TqEy4lVwjxI/AAAAAAAAAYY/XITyUz4Uwvk/s1600/Image005000.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 400px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-SSvo-RHjR2o/TqEy4lVwjxI/AAAAAAAAAYY/XITyUz4Uwvk/s400/Image005000.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5665865753886232338" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;“कबीरा सोई पीर है, जो जाने पर पीड़। जो पर पीड़ ना जाने, सो काफिर बे पीर।।”  दीवार पर लिखी इस पंक्ति को दिखाते हुए गोविंद राम कहते हैं, “हमारा धर्म पाकिस्तान में नहीं बचा है। हां, जो बचा पाए, उसे लेकर यहां आ गए हैं।” तब बगल में बैठी आरती ने तपाक से कहा, “वहां घर से बाहर निकलने पर लोग परेशान हो जाते थे, जबकि हमारी पढ़ने की बड़ी इच्छा जगती है। इसलिए यहां आए हैं। बड़े कहते हैं कि अक्षर ज्ञान होगा, तभी अक्ल आएगी।” आरती 13 वर्ष की है, पर सवालों का जवाब सयानी व समझदार लड़की की तरह देती है। उसकी मां सोनाली कहती है, “यह हमारी बड़ी लड़की है।” गहरी नींद में सोई दूसरी बच्ची की तरफ इशारा करते हुए कहती है, “यह दामिनी है। हमारी सबसे छोटी लड़की। तीन बच्चे और हैं। वे लोग टीवी देख रहे हैं।” यही है गोविंद राम बागड़ी का परिवार। हालांकि, बूढ़े मां-बाप वहीं पाकिस्तान में ही हैं। उन्हें छोड़कर पूरा परिवार भारत आया है। भरे मन से गोविंद कहता है, “उन्होंने तो अपनी जिंदगी करीब-करीब जी ली। हमने भी आधी काट ली, पर इन बच्चों की जिंदगी को खराब क्यों होने दें?”&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;दरअसल, गोविंद राम समेत कुल 19 हिन्दू परिवार के 114 सदस्य पाकिस्तान के सिंध प्रांत से दिल्ली आए हैं। सबकी परेशानी वही एक है, जिसे गोविंद राम ने अभी-अभी बताया है। फिलहाल डेरा बाबा धुणी दास आश्रम इनका ठिकाना है। इसे वे अपना पनाहगार मान रहे हैं। यह आश्रम दिल्ली के मजनू का टीला में स्थित है। अर्जुन दास बागड़ी जत्था में शामिल एक दूसरे परिवार का मुखिया है। उसने बातचीत में कहा, “हमलोग पिछले चार-पांच सालों से वीजा लेने की कोशिश कर रहे थे, पर नहीं मिल पाता था।“ फिर धीरे से कान में कहा, “भाई, वहां अमेरिका का वीजा मिलना आसान है, पर भारत का नहीं।” बातचीत में विश्वास का माहौल बना तो वे लोग खुले। बताया कि हम जैसे लोगों को वीजा मिलने में बड़ी कठिनाई आती है। वैसे तो धार्मिक यात्रा के नाम पर जत्थे को वीजा मिलना थोड़ा आसान है, पर किसी अकेले परिवार को मिलना बहुत मुश्किल है। आखिरकार हारकर हमलोगों ने भी यही रास्ता चुना। बड़ी मेहनत के बाद दिल्ली और हरिद्वार शहर का धार्मिक समारोह में शिरकत के लिए 35 दिनों का वीजा मिला था। पर उसकी तारीख गत आठ अक्टूबर को ही समाप्त हो गई है। कानूनन वे अब भारत में रहने के अधिकारी नहीं हैं, लेकिन पूछने साफ-साफ कह-बोल रहे हैं,&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; “अब हमलोग उस दुनिया में नहीं लौटना चाहते जहां न तो हमारा धर्म सुरक्षित है और न ही हमारे बच्चे।”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जत्था में शामिल गुरमुख के परिवार में 21 सदस्य हैं। उसके माता-पिता भी साथ हैं। बातचीत के दौरान उसने बताया, “चार सितंबर को हमलोग ने बॉर्डर पार किया था।” उसकी पूरी कहानी सुनने के बाद जो बात समझ में आई, वह इस तरह है- सितंबर की पहली तारीख को सुबह-सबेरे घर-बार छोड़कर वे लोग जत्थे में शामिल हो गए थे। तब यह जत्था एक ऐसे सफर पर था जिसका परिणाम किसी को मालूम न था। जत्था में कुल 600 लोग थे। आखिरकार चार सितंबर को जत्था बाघा बार्डर पार किया। इसके बाद वे लोग कई भागों में बंट गए। जिन्हें नागपुर का वीजा मिला था, वे नागपुर की तरफ चले गए। कुछ लोग इंदौर और भोपाल गए। कुछ लोगों के पास जयपुर का वीजा था। वे वहीं रह गए। यानी कुल नौ शहरों की तरफ इन लोगों ने रुख किया। इनमें 114 लोग दिल्ली आए। वे अब भी यहीं हैं। इनमें 48 बच्चे ऐसे हैं जिनकी उम्र सात वर्ष या उससे कम है। एक बालक ऐसा भी है जो जत्था में शामिल अपने परिवार का अकेला सदस्य है। उसकी उम्र 13 साल है। पूछने पर गुरमुख ने बताया कि इसके नाम का वीजा मिल गया तो मां-बाप ने यह कहकर भेज दिया कि वे पीछे से आ रहे हैं। अब यह हर पहर उनकी राह देखता रहता है। जत्था में शामिल एक किशोर का नाम कन्हैया लाल है और उम्र 16 साल। वह अपने पांच भाई-बहनों व मां-बाप के साथ वीजा पाने में तो सफल रहा, पर किस्मत उसके साथ दूसरा ही खेल खेल रही है। वह कैंसर से पीड़ित है और फिलहाल दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती है। मां-बाप बेहाल हैं। अब वे कन्हैया की देख-भाल करें या अपने अन्य पांच बच्चों को संभालें। खैर, यहां ऐसी और भी कहानियां हैं, पर इतना जानना जरूरी है कि सभी विस्थापित हिन्दू परिवार पाकिस्तान के सिंध प्रांत के हैदराबाद, मठियारी, हाला आदि स्थानों से यहां आए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस लंबे सफर में उनकी जेब भी खाली हो गई है। हालांकि, खबर सुनकर मदद के लिए कई लोग आगे आए। खाने का सामान, बर्तन और बिस्तर उपलब्ध कराया है। इससे किसी तरह वे लोग अपना गुजर-बसर कर रहे हैं। सहयोग के लिए ईश्वरदास मौजूद हैं। उनके पास पुराना अनुभव है। वे 1987 में पाकिस्तान से भारत आए थे। लंबे संघर्ष के बाद भारत में रहने की अनुमति पाई। अब वे राजस्थान के श्रीगंगानगर में रहते हैं। पूछने पर ईश्वरदास कहते हैं,&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; “अब कोई क्या करे, मेरी नजरों के सामने इतिहास दोहरा रहा है। आज में 71 वर्ष का हूं। 24 साल पहले अपने बच्चों की हिफाजत के लिए यहां आया था। आज ये लोग आए हैं।”&lt;/span&gt; फिर आगे बताते हैं, “वहां के हालात बड़े खराब हैं। जबरन मजहबी तालीम दी जाती है। बच्चे उठा लिए जाते हैं। आप इनसे ही पूछो, बताएंगे।” साथ खड़े अर्जुन बागड़ी ने कहा कि वहां धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है। अंतिम संस्कार भी नहीं करने देते हैं। हमारी लड़कियों के साथ भी अच्छा व्यवहार नहीं करते। शिकायत करने के बावजूद स्थानीय अधिकारी हमारी बात नहीं सुनते हैं। गोविंद राम ने कहा कि हाला में स्कूल और कॉलेज दोनों है। बच्चे पढ़ने जाना चाहते हैं। पर हम उन्हें स्कूल भेजने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, वीजा की तारीख खत्म हो जाने के बाद इन लोगों का यहां रहना अवैध है, पर वे लोग चाहते हैं कि भारत सरकार मानवीय आधार पर उन्हें यहां रहने की अनुमति दे। इस बाबत वे कागजी प्रक्रिया में लगे हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर तिमारपुर थाने तक अपनी अर्जी पहुंचा आए हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक संपर्क साध पूरी जानकारी दे दी है। अब जवाब का इंतजार कर रहे हैं। यूनाइटेड नेशंस हाई कमिश्नर फॉर रिफ्यूजी (यूएनएचसीआऱ) के अनुसार वे लोग जो अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करते हैं वे रिफ्यूजी यानी शरणार्थी कहलाते हैं। तो क्या पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए इन हिन्दू परिवारों को शरणार्थी की संज्ञा दी जाएगी। हालांकि यह मामला यूएन बॉडी से जुड़ा है। पर वे लोग कहते हैं, “लोग तो हजार बातें करेंगे जी। हम भारत सरकार से इतना चाहते हैं कि वह हमें यहां कमाने-खाने की इजाजत दे ताकि हमारे इन बच्चों का भविष्य बन सके।” ह्युमन राइट लॉ नेटवर्क (एचआरएलएन) की 2007 की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत सरकार ने 2005 से 2006 के बीच 13,000 पाकिस्तानी हिन्दू को भारतीय नागरिकता दी थी। गौरतलब है कि वर्ल्ड रिफ्यूजी सर्वे-2007 के अनुसार भारत में उस समय तक 4,35,000 शरणार्थी निवास कर रहे थे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-6100033125777869901?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/6100033125777869901/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=6100033125777869901' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/6100033125777869901'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/6100033125777869901'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/10/blog-post_21.html' title='उम्मीद में किया सरहद पार'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-SSvo-RHjR2o/TqEy4lVwjxI/AAAAAAAAAYY/XITyUz4Uwvk/s72-c/Image005000.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-3259383228515005731</id><published>2011-10-20T00:55:00.000-07:00</published><updated>2011-10-20T00:56:57.937-07:00</updated><title type='text'>वे आजाद थे और आजाद रहे</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-HVt75KUu5mA/Tp_UO-fzjuI/AAAAAAAAAYM/1dsE6i7OTdw/s1600/Bhagwat-Jha-Azad.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 291px; height: 218px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-HVt75KUu5mA/Tp_UO-fzjuI/AAAAAAAAAYM/1dsE6i7OTdw/s400/Bhagwat-Jha-Azad.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5665480210015031010" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;“माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर । कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ॥” वह चिनमय मिशन ऑडिटोरियम था, जहां कबीर की ये वाणी गूंज रही थी। लोग बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद की शोक सभा में एकत्र हुए थे। तारीख आठ अक्टूबर थी। इस मौके पर लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने उन दिनों को याद किया जब उनकी पहली बार आजाद से मुलाकात हुई थी। उन्होंने कहा कि आजाद जी ने ताउम्र मुल्यों की राजनीति की। वहां कई और महत्वपूर्ण लोग थे। गृहमंत्री पी.चिदंबरम और दूसरे कई कांग्रेसी नेता भी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने आए। भागलपुर से लोकसभा सांसद शाहनवाज हुसैन भी थे। दरअसल, यही वह संसदीय क्षेत्र है जहां से आजाद ने राजनीति शुरू की थी। चुनकर संसद पहुंचे। पर 1989 में जब भागलपुर की जनता ने उन्हें नकार दिया तो आजाद ने सक्रिय राजनीति से ही संन्यास ले लिया। भारतीय राजनीति में ऐसे उदाहरण कम हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, आजाद का निधन 4 अक्टूबर को दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में हो गया था। वे पिछले कुछ समय से बीमार थे और एम्स में भर्ती थे। वे पहली बार 1957 में भागलपुर संसदीय क्षेत्र से चुनकर सांसद पहुंचे थे। हालांकि, 1977 में कांग्रेस के खिलाफ हवा चली तो वे हार गए। पर भागलपुर की जनता ने 1980 में उन्हें पुन: अपना प्रतिनिधि चुना। वे फरवरी 1988 से लेकर जनवरी 1989 तक लगभग ग्यारह महीने बिहार के मुख्यमंत्री पद पर भी रहे। हालांकि, उनकी राजनीतिक सक्रियता अपने प्रदेश से अधिक केन्द्रीय स्तर पर देखी जाती थी। उनकी पहचान एक ओजस्वी वक्ता के साथ-साथ किसी के भी मुंह पर खरी-खरी सुना देने की थी। इसके कई किस्से भागलपुर में मशहूर हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सब बातों के बावजूद 1989 के भागलपुर दंगे ने वहां की जनता और आजाद के बीच एक लकीन खींच दी। इससे आजाद काफी आहत हुए। उन्होंने राजनीति से ही संन्यास ले लिया। हालांकि, भागलपुर की जनता अंत तक उनकी राह देखती रही। उनका स्थान और दर्जा किसी दूसरे को नहीं दिया। पर वे नहीं आए। वे आजाद थे और आजाद रहे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-3259383228515005731?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/3259383228515005731/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=3259383228515005731' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/3259383228515005731'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/3259383228515005731'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/10/blog-post_20.html' title='वे आजाद थे और आजाद रहे'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-HVt75KUu5mA/Tp_UO-fzjuI/AAAAAAAAAYM/1dsE6i7OTdw/s72-c/Bhagwat-Jha-Azad.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-9169659035607660163</id><published>2011-10-07T23:38:00.000-07:00</published><updated>2011-10-07T23:46:57.738-07:00</updated><title type='text'>2जी घोटाले पर डॉ.सुब्रह्मण्यम स्वामी से बातचीत</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;फिलहाल देश में भ्रष्टाचार को रोकने के लिख सैद्धांतिक बहस चल रही है। आंदोलन हो रहे हैं। इस माहौल में डॉ.सुब्रह्मण्यम स्वामी मौजूदा कानून से ही भ्रष्टाचारियों को कैसे सजा दिलवाई जा सकती है, इसका उदाहरण पेश कर रहे हैं। एक बातचीत में उन्होंने कुछ प्रसंगों को बताया और समझाया है। आप भी पढ़ें-&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-rLYkeBm84ks/To_wMG3CqGI/AAAAAAAAAYE/KKiDyVRvmqo/s1600/dr-subrama.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-rLYkeBm84ks/To_wMG3CqGI/AAAAAAAAAYE/KKiDyVRvmqo/s320/dr-subrama.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5661007347418572898" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- नियंत्रण और महालेखा परीक्षक (सीएजी) और लोक लेखा समिति (पीएसी) की रिपोर्ट से भी पहले 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले को आपने उठाया। इसकी शुरुआत कैसे हुई?&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;जवाब- बात 10 जनवरी, 2008 की है। उस दिन रात 9.30 बजे भारत सरकार के दो अधिकारी मुझसे मिलने मेरे घर आए। हालांकि, उन दोनों को मैं पहले से जानता था, सो हमने उनसे मुलाकात की। उन्होंने बताया कि वे बड़े दुखी और परेशान हैं। इसके बाद पूरी जानकारी दी। कहा कि “आज दोपहर 2.45 बजे एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई, जिसमें कहा गया कि शाम 3.30 से 4.30 बजे के बीच जो डिमांड ड्राफ्ट लाएगा उसे 2जी स्पेक्ट्रम का लाइसेंस दिया जाएगा। इसके बाद वहां अफरा-तफरी मच गई, जबकि चंद चुने हुए लोगों को पहले से ही इसकी खबर थी। वे डिमांड ड्राफ्ट लेकर मंत्री के कमरे में तैयार बैठे थे। ऐसा मेरे जीवन में पहली बार हुआ है और हमलोग शर्म महसूस कर रहे हैं।” उनकी बातों को सुनने के बाद मेरी समझ में आया कि क्या कुछ हुआ होगा।&lt;br /&gt;मैं जानता हूं कि भ्रष्टाचार का बहुआयामी असर होता है। इसलिए हमनें सही जानकारी इकट्ठा की। इससे मालूम हुआ कि 2001 में स्पेक्ट्रम का जो मूल्य तय हुआ था, वह 2008 में लगभग दस गुणा ज्यादा हो सकता है। ऐसी स्थिति में साफ था कि राजस्व को बढ़ा नुकसान हुआ है और इसमें बड़ी रिश्वतखोरी हुई है। तब मैंने 2जी मामले को उठाने का मन बनाया। एक और बात भी है। हार्वर्ड विश्वविद्यालय में जब मैं पढ़ा रहा था तो वहां कई लोग बार-बार पूछ रहे थे कि भारत में यह सब क्या हो रहा है, क्या वहां कोई आवाज उठाने वाला भी नहीं है? आखिर भारत को क्या हो गया है? यह सब सुनने के बाद इस घोटाले को उजागर करने की मेरी इच्छाशक्ति प्रबल हो गई। मैंने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी। स्पेक्ट्रम आवंटन में जो घोटाला हुआ, उनसब का हवाला देते हुए ए.राजा के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी। यह बात नवंबर, 2009 की है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- अब जबकि सीएजी और पीएसी ने भी आपके आरोपों की पुष्टि कर दी है और कोर्ट भी कुछ मामलों की निगरानी कर रहा है तो इस समय आपने एक अलग मोर्चा गृह मंत्री पी.चिदंबरम के खिलाफ खोल दिया है। हालांकि, इसका जिक्र पीएसी की रिपोर्ट में भी संकेतों में है। पहले इस पर कोई विश्वास नहीं कर रहा था कि पी.चिदंबरम का भी इस घोटाले में हाथ हो सकता है, पर नए तथ्य इसकी पुष्टि कर रहे हैं। आपने जिन दस्तावेजों को आधार बनाया है, वे क्या हैं और उससे कौन-कौन सी बातें निकलती हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- हालांकि, पीएसी की रिपोर्ट जून, 2011 के अंत में आई थी, लेकिन मैंने इससे पहले ही 13 मई को कोर्ट में एक याचिका दायर की थी, जिसमें कहा था कि पी.चिदंबरम के खिलाफ जांच हो। पीएसी रिपोर्ट से जो भी दस्तावेजी तथ्य बाहर आए, वे मेरे पास पहले से मौजूद थे। उसी के आधार पर मैं आगे बढ़ा। इसके बाद जब पीएसी के रिपोर्ट में भी पी.चिदंबरम का नाम आया तो इससे मुझे बड़ा बल मिला। डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने जो रिपोर्ट लिखी है उसमें यह स्पष्ट है “वित्त मंत्री का दायित्व बनता है कि वे देश की तिजोरी की रक्षा करें, पर ऐसा लग रहा है कि वित्त मंत्री ने लापरवाही की है। अत: इसपर जरूर विचार होना चाहिए।” मेरे लिए यह भी एक आधार बना। हालांकि, बीच के दो महीने मैं विदेश में रहा, लेकिन वापस लौटने के बाद उसी कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहा हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- इसमें अबतक अदालत में आपको कितनी सफलता मिली है?&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;सवाल- अभी बहस चल रही है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के वकील ने केवल तकनीकी पक्ष रखा है। हालांकि मेरी तरफ से पेश किए गए हालिया साक्ष्य का उन्होंने खंडन नहीं किया है। इतना भर कहा है कि अब उन्हें चार्जसीट फाइल करनी है। इसलिए डॉ.स्वामी को इस कोर्ट में यह अधिकार नहीं है कि वे सीबीआई जांच की मांग करें।&lt;br /&gt;मेरी समझ से उनका तर्क कमजोर है। वह इसलिए क्योंकि गुजरात के मामले में 2001 में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया है, उसमें कहा गया है कि चार्जशीट दाखिल करने के बाद भी सीबीआई जांच की मांग कर सकते हैं। ऐसे में उनका तर्क अधिक समय तक टिक नहीं सकता है। हालांकि, दूसरी तरफ पी.चिदंबरम के वकील भी कह रहे हैं कि लक्ष्मण रेखा पार नहीं करनी चाहिए। कोर्ट ने इसका भी कड़ा जवाब दिया है। इससे साफ है कि उनके पास कोई तर्क नहीं है। वे अबतक मेरे किसी भी सवालों का जवाब देने में सफल नहीं हुए हैं। केवल यही कह रहे हैं कि यह कोर्ट सीबीआई जांच के आदेश नहीं दे सकती है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;br /&gt;सवाल- सूचना के अधिकार कानून (आरटीआई) से जो नए तथ्य सामने आए हैं, क्या उन तथ्यों को आपने कोर्ट में पहले ही पेश कर दिया है ?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- मुझे नहीं मालूम कि कोई व्यक्ति आरटीआई से इन बातों की जानकारी प्राप्त करने में जुटा है। उक्त व्यक्ति ने अखबारों को जानकारी दी होगी, पर ऐसा लगता है कि किसी अखबार वालों ने इन दस्तावेजों का सही तरीके से उपयोग नहीं किया। आखिर ऐसा क्यों हुआ, यह भी सोचने वाली बात है। मेरे पास जो दस्तावेज आए उनका आरटीआई से कोई सरोकार नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- अखबारों में आया है कि आरबीआई के गवर्नर और उस समय के वित्त सचिव डी सुब्बाराव जो ए.राजा और पी.चिदंबरम के साथ बैठक में मौजूद थे, सीबीआई उनसे भी पूछताछ करेगी। इससे आपको अदालत में कितना &lt;/span&gt;बल मिला? &lt;br /&gt;जवाब- अखबारों में तो कई बातें नहीं आई हैं। पी.चिदंबरम के वकील ने जाने-अनजाने कोर्ट में कहा कि डॉ.स्वामी ने जो तथ्य दिए हैं, उसकी अवश्य सीबीआई छानबीन करेगी और वस्तु-स्थिति से अवगत कराने वाली एक अतिरिक्त रिपोर्ट पेश करेगी। अब उनकी बातें मेरी समझ में नहीं आती हैं, क्योंकि मेरी भी तो यही मांग है। लेकिन वे यह भी कह रहे हैं कि यह कोर्ट सीबीआई को फिर से जांच के आदेश नहीं दे सकती है।&lt;br /&gt;मेरी समझ से उन लोगों को कोई रास्त नहीं दिख रहा है। हमने इतने तथ्य पेश किए हैं कि किसी के लिए भी यह कहना मुश्किल होगा कि आप ए.राजा को तो जेल भेज सकते हैं, पर पी.चिदंबरम के खिलाफ सीबीआई जांच नहीं हो सकती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- तो क्या आप कह रहे हैं कि पी.चिदंबरम के खिलाफ सीबीआई चार्जशीट दाखिल करेगी और उन्हें इस्तीफा देना पड़ेगा?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- पहले तो उनके खिलाफ एफआईआए दर्ज होगा। फिर जांच शुरू होगी। तब सवाल उठेगा कि ऐसी स्थिति में वे मंत्री पद पर कैसे बने रह सकते हैं। इसके बाद उन्हें इस्तीफा देना होगा। मैं समझता हूं कि उन्हें जांच के आदेश मात्र से ही इस्तीफा देना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- ए.राजा से इस्तीफा लेकर उन्हें जेल में डालकर सरकार और उनकी जांच एजेंसी सीबीआई ने जो जांच की दिशा तय की, उसे पी.चिदंबरम का नाम आने के बाद बदलने को तैयार नहीं है। क्या आपको लगता है कि कोर्ट के आदेश से उसे बदलना होगा?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सवाल- आज सीबीआई एक प्रतिद्वंदी के रूप में सामने आ रही है। क्योंकि मैंने कहा है कि इस मामले में उसने ठीक से काम नहीं किया है और जान-बूझकर पी.चिदंबरम को बचाने की कोशिश की है। अब वह अपने बचाव के लिए सफाई देने में लगी है। कह रही है कि उसने ऐसी कोई गलती नहीं की है, क्योंकि इसमें कोई खास तथ्य ही नहीं है। इसके बावजूद यदि कोर्ट आदेश देती है तो सीबीआई को उसे मानना होगा। मैं समझता हूं कि आज की परिस्थिति में सीबीआई यह दिखाना चाहेगी कि आपने विरोध किया, पर कोर्ट ने हमें आदेश दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;मैंने कोर्ट में उस साक्ष्य को पेश किया है जिसमें ए.राजा ने कहा है कि वह स्वान और यूनीटेक को स्पेक्ट्रम नहीं बेचना चाहते थे। पी.चिदंबरम के दबाव में उन्होंने ऐसा करना पड़ा।&lt;/blockquote&gt; &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;-डॉ.स्वामी&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- पी.चिदंबरम का बचाव सोनिया गांधी समेत पूरी कांग्रेस पार्टी कर रही है। प्रधानमंत्री भी उनके पक्ष में खड़े हैं। तब न्यायपालिका की क्या भूमिका होगी?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- सरकार और उसके कामकाज के बारे में जो लोग अच्छी तरह जानते हैं वे यह समझते हैं कि प्रधानमंत्री ने पी.चिदंबरम का पक्ष नहीं लिया है। उन्होंने यह नहीं कहा है कि चिदंबरम निर्दोष हैं। हां, यह कहा है कि मेरा उनपर विश्वास है। अगर वे यह कह दें कि चिदंबरम दोषी हैं तो मामला कल ही खत्म हो जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- राजनीतिक पार्टियां खासकर भारतीय जनता पार्टी ने पी.चिदंबरम के साथ प्रधानमंत्री को भी घेरना शुरू कर दिया है। वहीं आपका कहना है कि प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई सबूत नहीं है। क्या यह आपकी रणनीति का हिस्सा है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- दोनों है। दरअसल, प्रधानमंत्री को बार-बार घसीटने की जो बात होती है, सोनिया गांधी भी यही चाहती हैं। क्योंकि, वह अपने पुत्र राहुल गांधी को अब प्रधानमंत्री पद पर बैठाना चाहती हैं। मुझे इस बात की जानकारी है कि सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री के बीच टेलीफोन पर एक बातचीत हुई है। उस बातचीत में सोनिया गांधी ने साफ-साफ शब्दों में प्रधानमंत्री से कहा है कि वे दिसंबर में पद से इस्तीफा देकर राहुल गांधी का नाम प्रस्तावित करें। हालांकि, प्रधानमंत्री ने इसका कोई ठोस जवाब नहीं दिया। उन्होंने सोनिया गांधी की बातें जरूर सुनीं। दरअसल, आज इस इटालियन परिवार में एक घबराहट है। वे लोग चाहते हैं कि मनमोहन सिंह की जगह अब राहुल को पद पर आ जाना चाहिए और यदि ऐसा नहीं हुआ तो चीजें हाथ से बाहर चली जाएंगी। उन्हें यह संदेह भी है कि डॉ. मनमोहन सिंह मन से उनके साथ नहीं हैं। यहां तक बात आ गई कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने ही जान-बूझकर सारी सूचनाएं लिक की हैं, जबकि इसे गुप्त रखा जाना चाहिए था।&lt;br /&gt;एक और बात है कि आखिर प्रधानमंत्री का इसमें दोष क्या है? क्या यह कि वे भीष्म पितामह की तरह सब कुछ देखते रहे। इसमें दो राय नहीं कि वे दोषी हैं। यह सरकार चली जाए और उसके साथ मनमोहन सिंह भी जाएं तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। या फिर उनकी बारी सबसे आखिर में आए। मैं  सिर्फ इतना कहुंगा कि उनकी बारी जब आएगी तो कोई आपराधिक मामला नहीं बनेगा। वह नागरिक अपराध (सिविल क्राइम) का मामला होगा। इसका मतलब यह कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को ठीक तरीके से नहीं निभाया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-9169659035607660163?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/9169659035607660163/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=9169659035607660163' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/9169659035607660163'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/9169659035607660163'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/10/2.html' title='2जी घोटाले पर डॉ.सुब्रह्मण्यम स्वामी से बातचीत'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-rLYkeBm84ks/To_wMG3CqGI/AAAAAAAAAYE/KKiDyVRvmqo/s72-c/dr-subrama.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-78932684919939500</id><published>2011-10-05T02:53:00.000-07:00</published><updated>2011-10-24T23:50:43.580-07:00</updated><title type='text'>विवादों में घिरा ज्ञान केंद्र</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-_nRb1vFW3ec/Towq98TVSdI/AAAAAAAAAX8/TSlYoTLKDYk/s1600/gopa%2Bvc.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 213px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-_nRb1vFW3ec/Towq98TVSdI/AAAAAAAAAX8/TSlYoTLKDYk/s320/gopa%2Bvc.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5659946075345471954" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-EKQMYFJr2oE/TowpkyODPcI/AAAAAAAAAXc/DY-ivFs791Q/s1600/patra.tif"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 283px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-EKQMYFJr2oE/TowpkyODPcI/AAAAAAAAAXc/DY-ivFs791Q/s320/patra.tif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5659944543630605762" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;“मुझे संदेह है कि नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति हो गई है ? इस सवाल के जवाब में विदेश राज्य मंत्री ई अहमद ने कहा- नहीं।“  यह सवाल-जवाब राज्यसभा की 25 अगस्त, 2011 की कार्यवाही का हिस्सा है। क्या है कि “सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना।” नालंदा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय (एनआईयू) का सपना देखने वालों को पाश की यह पंक्ति रह-रहकर याद आ रही है। वे सवाल कर रहे हैं कि डॉ. गोपा सब्बरवाल कौन है?  वे यह भी जानना चाहते हैं कि शांति, ध्यान और सादगी की परंपरा वाला प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय अब किस नई बुनियाद पर खड़ा हो रहा है?&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt; ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके सपनों का यह ज्ञान केंद्र फिलहाल सवालों से घिरा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस महत्वाकांक्षी विश्वविद्यालय के पहले उप-कुलपति के बतौर डॉ.गोपा सब्बरवाल की नियुक्ति विवाद का मुख्य कारण है। पिछले दिनों पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने जब इस विश्वविद्यालय से स्वयं को पूरी तरह अलग कर लिया तो मामला और तूल पकड़ा। परियोजना को लेकर संदेह गहरा हुआ है। इस दौरान छानबीन के बाद जो दस्तावेज प्रथम प्रवक्ता के पास आए हैं वे दूसरी कहानी कह रहे हैं। इसके अनुसार विदेश मंत्रालय की तरफ से 9 सितंबर, 2010 को एक पत्र डॉ. गोपा सब्बरवाल को भेजा गया था। वह पत्र संख्या- s/321/10/2009(p) है। इस पत्र के अनुसार एनआईयू के मेंटर ग्रुप यानी सलाहकार मंडल की तरफ से डॉ.गोपा सब्बरवाल को नालंदा विश्वविद्यालय का उप-कुलपति नियुक्त किया गया है। साथ ही उनकी पगार 5,06,513 रुपए प्रति माह तय की गई है। दिल्ली के जोर बाग स्थित उनके घर पर जो सरकारी टेलीफोन लगा है वह भी एनआईयू के उप-कुलपति के नाम है। अब यह नियुक्ति कई सवाल खड़े कर रही है। क्योंकि भारत का राजपत्र इस बात की तसदीक करता है कि 25 नवंबर, 2010 से ‘नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम, 2010’ लागू होता है, लेकिन विदेश मंत्रालय के पत्र से पता चलता है कि डॉ.सब्बरवाल की नियुक्ति इसके 24 दिन पहले ही कर दी गई थी। आखिर यह सब कैसे हुआ लोग जानना चाहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-fg45sY4sbuY/TowpxytE4YI/AAAAAAAAAXk/9FwRYpsWtBo/s1600/patra%2B1.tif"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 172px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-fg45sY4sbuY/TowpxytE4YI/AAAAAAAAAXk/9FwRYpsWtBo/s200/patra%2B1.tif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5659944767099036034" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-LDMueJwOyTs/Towp9l3rawI/AAAAAAAAAXs/VTaTuZ1E124/s1600/patra%2B2.tif"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 22px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-LDMueJwOyTs/Towp9l3rawI/AAAAAAAAAXs/VTaTuZ1E124/s200/patra%2B2.tif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5659944969812273922" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;इतना ही नहीं नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम, 2010 (15.1)के अनुसार विश्वविद्यालय के उप-कुलपति की नियुक्ति का अधिकार सिर्फ राष्ट्रपति या इनके द्वारा नियुक्त विजिटर के पास है, लेकिन एनआईयू की सलाहकार मंडल ने इस भूमिका को किस आधार पर निभाया। यह भी समझ से परे है। इतना ही नहीं, अधिनियम में यह भी कहा गया है कि विश्वविद्यालय अपना मुख्यालय बिहार के नालंदा में ही खोलेगा। पर, दिल्ली स्थित आरके पुरम में आईबीसी बिल्डिंग में 22 जनवरी,2011 से नालंदा विश्वविद्यालय का कार्यालय चल रहा है। इसे विश्वविद्यालय ने 2,47,500 रुपए मासिक किराए पर लिया है। सूचना के अधिकार कानून से मिली जानकारी इन बातों की तसदीक करते हैं। हालांकि कुछ ऐसी सूचनाएं भी दी गई हैं जिससे साफ होता है कि वे तथ्य को छुपाने की कोशिश में है। एक सवाल के जवाब में कहा गया है कि मेंटर ग्रुप के लिए अपनी रिपोर्ट पेश करने के वास्ते कोई समय-सीमा तय नहीं की गई थी। वहीं दूसरे कागजात इसकी पुष्टि करते हैं कि इसके लिए नौ महीने का समय तय किया गया था। हालांकि ‘प्रथम प्रवक्ता’ यह पहले भी अपने पाठकों को इस बताता रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गौरतलब है कि पहली बार एनआईयू की कल्पना 1996 में जॉर्ज फर्नांडीस ने की थी। तब नालंदा अवशेष के निकट एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि वे इस महान संस्था को पुनर्जीवित करने का जिम्मा लेते हैं। पर वे इसमें सफल नहीं हो पाए। इसके बाद मार्च, 2006 में तात्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने अपनी बिहार यात्रा के दौरान नालंदा में एक अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के होने की वकालत की। उन्होंने कहा कि यहां विज्ञान, तकनीक, अर्थशास्त्र और आध्यात्म से जुड़े दर्शन पर प्राचीन और आधुनिक संदर्भ में विस्तृत अध्ययन का केंद्र बनाया जाए। तब विदेशों से भी नालंदा के पुनरुत्थान के वास्ते सहयोग को लेकर जोरदार पहल की बात चल रही थी। इसके लिए सिंगापुर और जापान समेत कई देश आगे आकर सहयोग देने को तैयार थे। बिहार सरकार भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थी। फरवरी, 2006 में तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा की अगुवाई में दिल्ली में भी एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इन सब के बीच एनआईयू की कल्पना को साकार करने के लिए भारत सरकार ने मई, 2007 में नोबल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री प्रोफेसर अमर्त्य सेन की अध्यक्षता में एक मेंटर ग्रुप का गठन किया। इस ग्रुप से कहा गया था कि वह उच्च कोटि के अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए तमाम पहलुओं पर विचार कर एक प्रारूप पेश करे। इसके लिए उसे नौ महीने का समय दिया गया था, पर वह लगातार टलता रहा। दो साल बाद भी उक्त रिपोर्ट को पेश नहीं किया जा सका था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि, 13-15 जुलाई, 2007 को मेंटर ग्रुप की पहली बैठक सिंगापुर में हुई। इस बैठक में सहयोग के लिए मेंटर ग्रुप ने एक 19 सदस्यीय सलाहकार समिति का गठन किया। इसमें केवल दो भारतीय शामिल किए गए, जिसमें एक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पुत्री व दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर उपिंदर सिंह थीं और दूसरी उनकी अभिन्न सहेली प्रोफेसर नयनजोत लाहिरी। नयनजोत लाहिरी भी दिल्ली विश्वविद्यालय में ही प्रोफेसर हैं। बाद में कायदे-कानून को बगल कर जिस गोपा सब्बरवाल को नालंदा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय का उप-कुलपति बनाया गया है वह भी दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्रीराम कॉलेज में समाजशास्त्र की रीडर रही हैं। कहा जाता है कि इन तीनों के बीच पुरानी और गहरी जान-पहचान है। तो क्या यह संबंधों का तोहफा है? और यह सहेलियों का विश्वविद्यालय बनने जा रहा है ? लोग यही सवाल पूछ रहे हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अनुसार भी किसी विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर प्रोफेसर की ही नियुक्ति हो सकती है। डॉ.सब्बरवाल तो प्रोफेसर से नीचे रीडर ही हैं। इतना ही नहीं एनआईयू से संबंधित अधिनियम को राष्ट्रपति की मंजूरी 21 सितंबर, 2010 को मिली थी, लेकिन इससे पहले ही 9 सितंबर, 2010 को उनकी कुलपति पद पर नियुक्ति हो गई। आखिर यह कैसे संभव हुआ। यही नहीं, कहा तो यह भी जाता है कि बतौर कुलपति डॉ. सब्बरवाल ने एसोसियेट प्रोफेसर अंजना शर्मा को एनआईयू का विशेष कार्य पदाधिकारी (ओएसडी) नियुक्त करवाया है। उनकी पगार 3,29,936 रुपए प्रति माह है।&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-b5Ly4VfoApM/TowqM5Ze0oI/AAAAAAAAAX0/dxGewyN1D-k/s1600/patra%2B4.tif"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 307px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-b5Ly4VfoApM/TowqM5Ze0oI/AAAAAAAAAX0/dxGewyN1D-k/s320/patra%2B4.tif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5659945232752366210" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उप-कुलपति समेत विश्वविद्यालय में नियुक्त अन्य कमर्चारियों का विवरण&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सवालों से घिरी डॉ.सब्बरवाल ने एक बयान में कहा है कि प्रोफेसर अमर्त्य सेन की अध्यक्षता वाली सलाहकार मंडल ने मुझे योग्य पाकर ही इस पद के लिए चुना है। वैसे इस पद के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा निर्धारित योग्यता जैसी कोई शर्त एनआईयू पर लागू नहीं होती, क्योंकि एक साल पहले केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए एक अलग कानून के तहत इस विश्वविद्यालय का गठन हुआ है। अपने बयान में उन्होंने यह भी कहा है कि डॉक्टर कलाम प्रोफेसर अमर्त्य सेन के अनुरोध के बावजूद एनआईयू का प्रथम विजिटर पद स्वीकारने को तैयार नहीं हुए थे। खबर है कि फिलहाल डॉक्टर सब्बरवाल अक्टूबर के तीसरे सप्ताह अमेरिका जाने की तैयारी कर रही हैं। उनकी योजना अमेरिका में ‘पारिस्थितिकी स्कूल’ के बाबत जानकारी एकत्र करने की है, जिसका उपयोग वह एनआईयू के लिए करेंगी। 22 सितंबर को अमेरिका के न्यूयार्क शहर में एशिया सोसाइटी के एक कार्यक्रम में प्रोफेसर अमर्त्य सेन का 45 मिनट का भाषण हुआ। इस दौरान वे उप-कुलपति की नियुक्ति पर कुछ भी कहने से बचते रहे। हालांकि, बिहार सरकार की खूब तारीफ की। गौरतलब है कि इस महत्वाकांक्षी विश्वविद्यालय के लिए बिहार की नीतीश सरकार ने 446 एकड़ जमीन उपलब्ध कराई हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, एनआईयू में नियुक्ति को लेकर ही नहीं, बल्कि पुनर्स्थापना को लेकर भी सैद्धांतिक भेद दिख रहे हैं। सोसाइटी फॉर एशिया इंटिग्रेशन (एसएआई) का कहना है कि प्रस्तावित बिल में नालंदा विश्वविद्यालय का उद्देश्य प्राचीन नालंदा विरासत को पुनर्स्थापित करना दर्ज है, लेकिन जो स्कूल स्थापित किया जा रहा है उसकी नालंदा परंपरा से अनभिज्ञता साफ दिख रही है। नालंदा रसायनशास्त्र, चिकित्सा, खगोल विज्ञान, धातु विज्ञान, गणित जैसे गैर धार्मिक वैज्ञानिक विषयों का शोध केंद्र भी था। परंतु मेंटर ग्रुप की अनुशंसा में विज्ञान से जुड़े किसी विषय पर अध्ययन का कोई प्रावधान ही नहीं है। मेंटर ग्रुप के अध्यक्ष को कटघरे में लेते हुए एसएआई के अध्यक्ष कहते हैं कि नालंदा परंपरा की खोज के लिए उस व्यक्ति को चुना गया जिनकी धारा, समझ और जीवनशैली बिल्कुल उलट है। नालंदा में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए सार्वजनिक वाद-विवाद की प्रथा थी। यह परंपरा प्रजातांत्रिक और पारदर्शी थी। यहां सब उलट-पुलटा दिखाई पड़ रहा है। बतौर उप-कुलपति डॉ.सब्बरवाल की नियुक्ति ही इसका बड़ा प्रमाण है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एनआईयू के गठन को लेकर मेंटर ग्रुप की लेट-लतीफी से परेशान होकर इसके निर्माण में सहयोग देने को आगे आए कई देश अब पीछे हटते दिख रहे हैं। शुरू-शुरू में सिंगापुर और जापान इस परियोजना को लेकर काफी उत्साही था। वे एशिया महाद्वीप की एकता के व्यापक लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए बौद्ध विरासत और साक्षा एशियाई परंपरा को मजबूत करना चाहते थे। पर ऐसा लगता है कि मेंटर ग्रुप की कार्यशैली ने इन सब चीजों पर पानी फेर दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बॉक्स-&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;इन स्थानों पर हुई मेंटर ग्रुप की बैठक। साथ ही खर्च हुए रुपए का विवरण&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;पहली बैठक- सिंगापुर (13-15 जुलाई, 2007)- 30,92,548.00 रुपए&lt;br /&gt;दूसरी बैठक- टोक्यो (14-16 दिसंबर, 2007) 38,88,243.00 रुपए&lt;br /&gt;तीसरी बैठक- न्यूयार्क (2-3 मई, 2008) 56,05,010.00 रुपए&lt;br /&gt;चौथी बैठक- नई दिल्ली (12-13 अगस्त, 2008) 16,04,190.00 रुपए&lt;br /&gt;अंतिम बैठक- गया (28-29 फरवरी, 2009) 29,23,012.00 रुपए&lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-78932684919939500?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/78932684919939500/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=78932684919939500' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/78932684919939500'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/78932684919939500'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='विवादों में घिरा ज्ञान केंद्र'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-_nRb1vFW3ec/Towq98TVSdI/AAAAAAAAAX8/TSlYoTLKDYk/s72-c/gopa%2Bvc.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-5997993776254532185</id><published>2011-09-16T02:25:00.001-07:00</published><updated>2011-09-16T02:28:12.654-07:00</updated><title type='text'>एक तस्वीर</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-6LuZsXZCAE4/TnMWLCtfZ6I/AAAAAAAAAXU/lrxfF9I3J1o/s1600/boy.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 267px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-6LuZsXZCAE4/TnMWLCtfZ6I/AAAAAAAAAXU/lrxfF9I3J1o/s400/boy.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5652886336242149282" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;20 महीने के नन्हें बच्चे को दूध पिलाती गाय। यह तस्वीर कंबोडिया की है। &lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-5997993776254532185?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/5997993776254532185/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=5997993776254532185' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/5997993776254532185'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/5997993776254532185'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/09/blog-post_16.html' title='एक तस्वीर'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail 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border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5650335621177257970" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अन्ना हजारे के आंदोलन से यह भी निकला है कि पीढ़ी चाहे कोई भी हो, ‘वंदे मातरम्’ हमारे जीवन में गहरे बैठा है। इसका किसी को प्रमाण चाहिए तो वह राजधानी दिल्ली के नजारे को देख ले। पिछले दिनों यहां अदभुत नजारा था। जो गीत समारोहों में सिमट गया था वह नया प्रतीक बनकर फिर से उभरा है। कभी यह लोकमानस में राष्ट्रवाद का द्योतक था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस गीत का इतिहास निराला है। यह प्रारंभ में वंदना गीत था।&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; बंकिमचंद्र ने इसे 1870 में रचा।&lt;/span&gt; उस समय उनके लिए यह रचना एकांत साधना थी। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;उसके ग्यारह साल बाद ‘आनंद मठ’ में उन्होंने इसे छपवाया।&lt;/span&gt; उपन्यास के छपते ही इसे अनूठी रचना मानी गई। वंदे मातरम् की छवि युद्धघोष की बनी, लेकिन वंदे मातरम् को वे ही जानते थे जिन्होंने आनंद मठ पढ़ा था। सालों बाद बंग-भंग के विरोध में जो स्वदेशी की लहर पैदा हुई उसपर वंदे मातरम् तैरने लगा। उस आंदोलन में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने वंदे मातरम् को लोकप्रिय बनाने में अग्रणी भूमिका निभाई। 1905 में रक्षाबंधन के दिन निकले जुलूस का उन्होंने नेतृत्व किया। उससे पहले 1896 में वे कलकत्ता कांग्रेस में वंदे मातरम् गा चुके थे। 1905 से 1908 का समय वंदे मातरम् से गूंजता रहा। कैसे कोई गीत लोकमानस में प्रवेश करता है यह कहानी ही वंदे मातरम् के विकास की यात्रा है। यह वह गीत है जो पुस्तक में कैद होकर नहीं रह सका। उसी दौर में यह राष्ट्रीयता को समझाने का जरिया बना। राष्ट्रवादियों ने अंग्रेजी सत्ता से लड़ने का इसे अस्त्र माना। वही दौर है जब अरविंद घोष ने अपनी कल्पना शक्ति का चमत्कार दिखाया और इसके रचयिता बंकिमचंद्र चटर्जी को ‘राष्ट्रवाद का ऋषि’ घोषित किया।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;उसी समय में बनारस कांग्रेस हुई। उसके अधिवेशन में वंदे मातरम् को सरला देवी ने गाया। जो रवीन्द्रनाथ टैगोर परिवार की थी। इस तरह एक गीत राष्ट्रवादियों के लिए नारा बनकर उभरा। उस समय के राष्ट्रवादी नेता इसे देश-भक्ति के नए धर्म का मंत्र समझते और बताते थे। अरविंद घोष उसी दौर में वंदे मातरम् पत्रिका का संपादन भी करते थे। जिसे राजद्रोह के आरोप में अंग्रेजों ने जब्त कर लिया। वही समय है जब वंदे मातरम् ने दक्षिण की यात्रा की। तमिल के महान कवि सुब्रह्मण्यम भारती ने 1905 में ही इसे अपनी भाषा में अनुदित किया। उसके बाद तो अनुवादों का क्रम चल पड़ा। मराठी, मलयालम, तेलगू आदि भाषाओं में वंदे मातरम् राष्ट्रीयता का वाहक बनकर पहुंचा। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;1915 में मोहनदास करमचंद गांधी जब महात्मा नहीं बने थे तब मद्रास की एक सभा में वंदे मातरम् सुनकर बोले कि ‘आपने जो सुंदर गीत गाया उसे सुनकर हम सब एकदम उछल पड़े। यह हम आप पर है कि कवि ने मातृभूमि के बारे में जो कहा है उसे साकार करने की कोशिश करें।’&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजादी की लड़ाई में जहां वंदे मातरम् भारत भक्ति का माध्यम बना। वहीं एक समय ऐसा आया जब उसमें मूर्ति पूजा के तत्व लोग देखने लगे। उसपर पहला विवाद जिन्ना ने उठाया। जिसे मुस्लिम लीग ने अपने विरोध का मुद्दा बना लिया। आजादी की लड़ाई में मुस्लिम लीग ने वंदे मातरम् का प्रबल विरोध किया। कांग्रेस ने उसे मुस्लिम समाज की भावना से जोड़कर देखा। जिसके कारण &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जवाहरलाल नेहरू समिति की सिफारिश पर कांग्रेस ने 1937 में इसके कुछ अंशों को निकाल दिया। उस काट-छांट के बाद कांग्रेस ने इसे राष्ट्रगान के रूप में अपनाया। तब से ही वंदे मातरम् पर राजनीतिक विवाद की छाया बनी हुई है। वह उसके साथ चलती रहती है। लेकिन कांग्रेस ने जिन्ना को मुस्लिम समाज का अकेला प्रतिनिधि माना जबकि उसी समय रिजाउल करीम ने 1930 में ‘वंदे मातरम् और आनंद मठ’ की समीक्षा में लिखा कि ‘यह गूंगा को जबान और कलेजे के कमजोर लोगों को साहस देता है।’&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt; उन्होंने यह भी लिखा कि बंकिमचंद्र ने इस गीत से देशवासियों को चिरकालिक उपहार दिया। उस विवाद को परे रखते हुए संविधान सभा ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की पहल पर जन-गण-मन के साथ इसे भी राष्ट्रगीत का दर्जा दिया।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मानना होगा कि तमाम विवादों के बावजूद वंदे मातरम् में अवतारी क्षमता है। यह अन्ना हजारे के आंदोलन में प्रकट हुई। अन्ना हजारे ने भी विवादों की परवाह नहीं की और वंदे मातरम् को प्रेरणा का नया स्रोत बना दिया। यह प्रकट हुआ कि वंदे मातरम् राष्ट्रीय संस्कृति की गीत रूप में धरोहर है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कोई भी गीत एक सांस्कृतिक कला तथ्य होता है। उसपर राजनीतिक विवाद नजरिए के कारण पैदा किया जाता है। जो उसे स्वदेशी, राष्ट्रीयता और देशभक्ति का प्रतीक मानते हैं उनके लिए वंदे मातरम् मंत्र है। मंत्र वही होता है जिसे समय-समय पर सिद्ध करना पड़ता है। जवाहरलाल नेहरू और जिन्ना को इसमें सांप्रदायिकता दिखी। यह उनकी अपनी राजनीतिक भूमिका थी।&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा भी नहीं है कि अन्ना हजारे ने बहुत दिनों बाद वंदे मातरम् को जन-जन की जुबान पर ला दिया हो। 1997 में ए.आर. रहमान इसे अपने सुरताल में बांधा। 2002 में बीबीसी विश्व सेवा के 25 हजार श्रोताओं ने इसे भारत के दो सर्वाधिक लोकप्रिय गीतों में से एक माना। अन्ना हजारे के आंदोलन ने वंदे मातरम् को एक नया अर्थ दिया है। जाहिर है कि वंदे मातरम् का अर्थ हमेशा इस पर निर्भर करता रहा है कि किस समय और किस उद्देश्य से इसका उपयोग किया जा रहा है। अन्ना की आंधी में यह देश में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के नए संकल्प का शंखनाद हो गया है। इस गीत के अतीत की गौरवशाली स्मृतियां अब हमारे वर्तमान को गढ़ने जा रही है।&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;(वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;)&lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-9083252724160577019?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/9083252724160577019/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=9083252724160577019' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/9083252724160577019'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/9083252724160577019'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/09/blog-post_09.html' title='‘वंदे मातरम्’ एक अवतारी गीत'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-ByyBG_XxCtc/TmoGT4oBr_I/AAAAAAAAAXM/r_M_e1JpxYU/s72-c/%25E0%25A4%25A4%25E0%25A4%25BF%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%2582%25E0%25A4%2597%25E0%25A4%25BE.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-1008389279711744796</id><published>2011-09-08T01:18:00.000-07:00</published><updated>2011-09-08T01:26:32.709-07:00</updated><title type='text'>कैद में मोहम्मद साहब के पद चिन्ह</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-2RafSRDXWq8/Tmh7W1RM4kI/AAAAAAAAAW8/UVM-m_d-VPg/s1600/Photo0252.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-2RafSRDXWq8/Tmh7W1RM4kI/AAAAAAAAAW8/UVM-m_d-VPg/s200/Photo0252.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5649901364722852418" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मोहम्मद साहब के पद चिन्ह&lt;/span&lt;/blockquote&gt;&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज हम जहां सैर पर हैं, वह फिरोजशाह के बेटे फतेहशाह की कब्रगाह है। यह इसलिए भी पाक मानी जाती है, क्योंकि यहां मक्का से मंगवाए गए वे पत्थर लगे हैं जिसपर मोहम्मद साहब चला करते थे। 13वीं शताब्दी में फिरोजशाह ने अपने आध्यात्मिक सलाहकार मखदूम जेहान गश्त से इस पत्थर को मक्का से मंगवाया था। वह इसे अपनी कब्र पर लगवाना चाहता था, लेकिन संयोग था कि फिरोजशाह से पहले उसके बेटे फतेहशाह की मृत्यु हो गई। और वह पवित्र पत्थर उसी की कब्र पर लगा दी गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, आज इस जगह पर चित्रगुप्त मार्ग और ऑरिजनल रोड से पहुंचा जा सकता है। यह पहाड़गंज से आगे कुतुबमार्ग पर सदर बाजार की तंग गलियों में है और ‘कदम शरीफ’ के नाम से मशहूर है जो कई दरवाजों से घिरी इमारत है। यहां एक मस्जिद भी है। फिरोजशाह ने तो यहां एक मदरसा भी बनवाया था जो अब अस्तित्व में नहीं है। प्रचलित है कि इस इमारत को फिरोजशाह ने अपनी कब्रगाह के तौर पर बनवाया था ताकि उसे यहां दफनाय जा सके। इमारत के एक छोर पर एक गुंबद युक्त छोटी इमारत का निर्माण कराया गया था। इसके मध्य में एक आयताकार कब्र बनाई गई थी जो फिरोजशाह के लिए थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहासकारों का कहना है कि फिरोजशाह बड़ा ही धार्मिक व्यक्ति था। उसने संत मखदूम जेहान को मक्का भेजा था ताकि वहां से हजरत मोहम्मद का लबादा लाया जा सके। पर मखदूम इस काम में असफल रहे। उन्होंने फिरोजशाह को बताया कि हजरत मोहम्मद की ऐसी बहुत सी चीजें हैं जिसे खलीफा अपने-आप से अगल नहीं करना चाहते हैं। इसके बाद फिरोजशाह ने ढेर सारे तोहफे के साथ उन्हें फिर मक्का भेजा। इससे प्रभावित होकर खलीफा ने मोहम्मद के पैरों के निशान वाले पत्थर फिरोजशाह को भिजवाए। इस पत्थर को फिरोजशाह अपनी कब्र पर लगाना चहाता था। पर यह हो न सका।  दरअसल, फिरोजशाह के बेटे फतेहशाह ने अपने पिता से वादा लिया था कि उसकी कब्र पर उक्त पत्थर लगाए जाएंगे। दुर्भाग्य से जब ऐसा हुआ तो  फतेहशाह को वहीं दफनाया गया जिसे फिरोजशाह ने अपने लिए बनवाया था और उसकी कब्र पर उन पत्थरों को लगा दिया गया। इसके बाद वह दरगाह कदम शरीफ कहलाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले दारा सिकोह और फिर जयसिंह की सेना में रहा एक इतालवी लेखक निकोलो मोन्युकी ने अपनी किताब ‘स्टोरिया दी मुगल’ में लिखा है कि कदम शरीफ को हजरत मोहम्मद के पदचिन्ह को रखने के लिए बनवाया गया था। और वह 17वीं शताब्दी में मस्लमानों द्वारा दर्शन किए आने वाले सबसे प्रमुख तीर्थस्थलों में था। पुस्तक में यह भी कहा गया है कि मुगल बादशाह औरंगजेब ने इस जगह को अपने धार्मिक उद्देश्य के लिए भी इस्तेमाल किया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-Q7wOkxxFhN0/Tmh7H_b3yVI/AAAAAAAAAW0/XAgUUzgMsYE/s1600/Photo0248.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-Q7wOkxxFhN0/Tmh7H_b3yVI/AAAAAAAAAW0/XAgUUzgMsYE/s320/Photo0248.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5649901109753923922" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;फतेहशाह की कब्रगाह&lt;/span&lt;/blockquote&gt;&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुसलमानों की यह पवित्र दरगाह महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर है, लेकिन आज बदहाली के कगार पर है। हालांकि यह पुरातत्व विभाग के अधीन नहीं। एक मुस्लिम परिवार इसकी देख-रेख करता है। अंदर प्रवेश करने पर पूरी जमीन कबूतरों की गंदगी से भरी पड़ी दिखती है। फतेहशाह की कब्र पर भी धूल जमे हुए हैं। यहां पवित्र पत्थर कोई अता-पता नहीं है। वहां रहने वाले जहीर से पूछा तो उसने कहा, “1947 के दंगों में दंगाइयों ने इस पत्थर को निकाल दिया था। तभी से वह हमारे पास है।” कहने पर वह उस पवित्र पत्थर को दिखाता भी है। हालांकि आसपास के लोग अलग राय रखते हैं। वे कहते हैं कि सरकारी विभागों की अनदेखी के कारण इन लोगों ने यहां कब्जा जमा रखा है। गौर करें कि यह इमारत उसी फिरोजशाह ने बनवाई थी जिसने दिल्ली को न सिर्फ खूबसूरत बनाया, बल्कि जब कोई पुरातत्व विभाग नाम की चीज नहीं थी तब भी कुतुबमीनार जैसी ऐतिहासिक इमारतों का जीर्णोद्धार करवाया था। आज सबकुछ है। इसके बावजूद यह पवित्र इमारत उपेक्षित है। गंदगी में सनी हुई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(श्रुति अवस्थी की खास रपट)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-1008389279711744796?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/1008389279711744796/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=1008389279711744796' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/1008389279711744796'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/1008389279711744796'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/09/blog-post_08.html' title='कैद में मोहम्मद साहब के पद चिन्ह'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-2RafSRDXWq8/Tmh7W1RM4kI/AAAAAAAAAW8/UVM-m_d-VPg/s72-c/Photo0252.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-1448638169863898357</id><published>2011-09-06T04:15:00.000-07:00</published><updated>2011-09-06T04:27:21.478-07:00</updated><title type='text'>हारा मन फुदकन में खोजे चेतन</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-FAbAbhUgPJE/TmYDCWTqdvI/AAAAAAAAAWs/M94U1sd6Xpw/s1600/anna.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 398px; height: 209px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-FAbAbhUgPJE/TmYDCWTqdvI/AAAAAAAAAWs/M94U1sd6Xpw/s400/anna.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5649206121465542386" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अन्ना हजारे ने जो कार्यक्रम चलाया, उसमें जनता की बहुत भागीदारी रही। विशेषकर नया मध्यवर्ग शहरों में मुखरित हुआ। और वह सक्रिय है। अभी जो कुछ हुआ है उसपर कई तरह की प्रतिक्रियाएं आई हैं। इसे आंदोलन माना जा रहा है। निजी तौर पर अभी मैं इसे कोई आंदोलन नहीं मानता हूं। हां, इसे एक कैंपेन जरूर कहूंगा। जो अन्ना हजारे के व्यक्तिगत अनुभव, उनकी सोच और सामाजिक जिम्मेदारी के आधार पर शुरू हुआ। आज देश के हजारों-लाखों लोगों के मन में बस एक ही सवाल है जो मूलत: भ्रष्टाचार से जुड़ा है। निश्चय ही इस सवाल को सार्वजनिक बनाने में अन्ना का बढ़ा योगदान रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;इस कैंपेन की विशेषता ही है कि वह वर्तमान व्यवस्था, सरकार और नेतृत्व के प्रति गहरा शक पैदा करता है और एक तरीके के घबराहट को भी जन्म देता है। यानी यह डिसट्रक्ट भी है और मिसट्रक्स भी। आप देखेंगे कि महात्मा गांधी ने समय-समय पर अंग्रेजों की काफी आलोचना की। इसके बावजूद यह कहा कि हम इनपर भरोसा कर सकते हैं। दरअसल, उनके मन में यह बात कहीं-न-कहीं गहरे बैठी थी कि ब्रिटिश सरकार आपसी सहमति के बाद जिस किसी नतीजे पर पहुंचेगी अंततोगत्वा उसका क्रियान्वयन जरूर करेगी। आज इसपर भी संकट खड़ा हो गया है। सरकार और नेतृत्व पर कोई यकीन करने को तैयार नहीं है। निश्चय ही इसमें कसूर व्यवस्था चलाने वालों का है और यह उनकी बड़ी असफलता है। मैं यह भी कहुंगा कि इस आंदोलन में जो लोग अन्ना के साथ बातचीत कर रहे थे वे राजनैतिक तौर पर परिपक्व नहीं थे। यह देश का दुर्भाग्य ही है।&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह अन्ना का पहला राष्ट्रीय अभियान है। वैसे तो अन्ना अबतक 14 कैंपेन चला चुके हैं। इनमें चार-पांच स्थानीय स्तर के रहे है। कुछेक सूचना के अधिकार कानून को लेकर उन्होंने चलाए थे। पर राष्ट्रीय स्तर पर उनका यह पहला अनुभव है। इसलिए उनकी अपनी सीमा भी है जो उनके अंदर निहित है। हमने देखा कि 28 अगस्त को जो कैंपेन सम्पन्न हुआ, वह उसे अभिव्यक्त भी कर रहा था। उन्हें इस बात का शायद अंदाजा भी नहीं था कि पूरे भारत में लोग उठ खड़े होंगे। यहां एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यवस्था परिवर्तन पर वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में भी उन्होंने कोई रूपरेखा नहीं दी है। न ही इस बारे में कोई जानकारी दी है। फिलहाल वे केवल राजनैतिक स्तर पर ही सुधार की बात कर रहे हैं। वह भी केंद्रीय स्तर पर। दूसरी बात यह कि&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; इस कैंपेन में राजनैतिक संभावनाएं काफी कम हैं, क्योंकि जबतक यह उबाल कोई नेतृत्व पैदा नहीं करता है तबतक इस बात की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती है। हालांकि इसने जनता को जागृत कर दिया है, लेकिन बुनियादी तबदीली के लिए कोई नेतृत्व ही नहीं है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;सामाजिक स्तर पर भी जो कुप्रथाएं हैं और उसकी वजह से जो भ्रष्टाचार है, उसे किसी कानून से खत्म करना मुमकिन नहीं है। इसके लिए तो सामाजिक सुधार की जरूरत पड़ती है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय गांधीजी ने सामाजिक सुधार को लेकर कई प्रयोग किए थे। साथ ही रचनात्मक कार्यों पर बल दिया था। लेकिन इस कैंपेन में सामाजिक आंदोलन की कोई प्रवृति हमें दिखाई नहीं पड़ती है। यहां उपवासों के माध्यम से समाज की चेतना को कुरेदकर सुधार लाने का पहली बार प्रयास किया गया है। वह भी ऐसे व्यक्ति द्वारा जिसकी क्षमता अबतक स्थानीय और राज्य स्तर की चुनौतियों से लड़ने की रही है। यह उनका अवगुन नहीं है, बल्कि सीमा है। जिससे ‘आगे देखो’ जैसी सोच की संभावना यहां नहीं दिखती है। वैसे कई बातें कही गई हैं, फिर भी कोई स्पष्ट विचार या सोच उभरकर सामने नहीं आ रहा है। न तो अन्ना में और न ही उनके सहयोगियों में। हां, इस कैंपेन से प्रभावित होकर समाज के अंदर से वैसे प्रभावी लोग आगे आ जाएं तो बात अलग है। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दरअसल जो समाज 64 साल से कभी बोला ही नहीं, वह अब बोल रहा है। हिंदुस्तान में जो हारे हुए और निराश लोग हैं उन्हें इससे एक अवसर नजर आया है। यहां एक कविता याद आती है, “हारा मन फुदकन में खोजे चेतन।”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इतने के बावजूद भारत में सिविल सोसाइटी का अपना महत्व है। वह स्थानीय स्तरों पर विभिन्न समय और रूपों में सक्रिय रहा है। मैं मानता हूं कि सिविल सोसाइटी का सरकार में दखल कम होना चाहिए। पर जब राजनैतिक हालात इतने खराब हो जाएं कि वह अपना काम ही न कर सके तो उन्हें बाहर आना पड़ता है। गत 50 सालों के राजनीतिक चलन से ऐसी स्थिति बनी कि सिविल सोसाइटी को सरकार में दखल देना पड़ा है। इस बिंदु पर अन्ना ने ऐतिहासिक काम किया है। लेकिन सिविल सोसाइटी की तासीर ऐसी होती है कि वह निरंतर कोई देशव्यापी आंदोलन नहीं चला सकता है। इसके लिए तो नेतृत्व की जरूरत होती है। आज इसपर विचार करने का समय है कि इन परिस्थितियों में सिविल सोसाइटी किस तरह इसे आगे ले जाएगी। यह जिम्मेदारी राजनीतिक पार्टीयों की भी है कि वह इसे नेतृत्व प्रदान करे, पर फिलहाल इसकी संभावना नहीं दिख रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, इसके अंदर जो संभावनाएं हैं उसे समझने की क्षमता आज के नेतृत्व में नहीं दिख रही है। न ही अभी कोई तिलक, गांधी या फिर आंबेडकर निकलता दिखाई दे रहा है। गत 47 दिनों में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और अखबारों में करीब 300 आलेख आ चुके हैं। यह समाज के सजग होने की निशानी जरूर है, पर इसमें भी नई सोच के बीज अभी तक नहीं दिख रहे हैं। फ्रांस और रूस की क्रांति हुई तो कई नई प्रतिभाएं सामने आईं। राजनीति के साथ-साथ कला, साहित्य पर भी उसका प्रभाव पड़ा। अन्ना हजारे के इस आंदोलन का अभी वह प्रभाव नहीं है। सरकारी स्तर पर कुछ कमजोरियां निकलकर आ रही हैं, यह उसी पर केंद्रित है। इसमें विद्यार्थियों की भागीदारी जरूर रही, पर दूसरे छात्र आंदोलनों से इसकी तुलना करें तो इसमें वे लक्षण हमें नहीं मिलेंगे। कुल मिलाकर &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;इससे सामाजिक चेतना की ऐसी कोई जमीन अभी नहीं बनी है जिससे नया पौध निकल आए।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;(अन्ना आंदोलन पर मशहूर पत्रकार देवदत्त के विचार)&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-1448638169863898357?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/1448638169863898357/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=1448638169863898357' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/1448638169863898357'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/1448638169863898357'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='हारा मन फुदकन में खोजे चेतन'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-FAbAbhUgPJE/TmYDCWTqdvI/AAAAAAAAAWs/M94U1sd6Xpw/s72-c/anna.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-642494595528105709</id><published>2011-08-31T03:49:00.000-07:00</published><updated>2011-08-31T04:11:44.381-07:00</updated><title type='text'>विदेश में अन्ना के समर्थक</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-uULpjO3LrFE/Tl4R-GWHydI/AAAAAAAAAWc/Wep0Zodcq54/s1600/anna5.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 266px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-uULpjO3LrFE/Tl4R-GWHydI/AAAAAAAAAWc/Wep0Zodcq54/s400/anna5.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5646970741322140114" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अन्ना को समर्थन देश में ही नहीं मिला, विदेश में भी सैकडों लोग घर से बाहर आए। अन्ना के समर्थन में नारे लगे। यहां अन्ना के समर्थन में पोस्टर लिए बच्ची।&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-642494595528105709?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/642494595528105709/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=642494595528105709' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/642494595528105709'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/642494595528105709'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/08/blog-post_31.html' title='विदेश में अन्ना के समर्थक'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-uULpjO3LrFE/Tl4R-GWHydI/AAAAAAAAAWc/Wep0Zodcq54/s72-c/anna5.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-2272025909751684284</id><published>2011-08-28T01:24:00.000-07:00</published><updated>2011-08-28T01:25:54.386-07:00</updated><title type='text'>अन्ना का अनशन टूटा</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-v9eXGW4fJks/Tln7bl2V-dI/AAAAAAAAAWU/AOJLcFBaGuw/s1600/anna.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-v9eXGW4fJks/Tln7bl2V-dI/AAAAAAAAAWU/AOJLcFBaGuw/s400/anna.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5645820059320711634" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ओह!ये इंतजार के पल।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-2272025909751684284?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/2272025909751684284/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=2272025909751684284' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/2272025909751684284'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/2272025909751684284'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/08/blog-post_28.html' title='अन्ना का अनशन टूटा'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-v9eXGW4fJks/Tln7bl2V-dI/AAAAAAAAAWU/AOJLcFBaGuw/s72-c/anna.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-5257061649566952294</id><published>2011-08-25T00:01:00.001-07:00</published><updated>2011-08-25T00:05:59.956-07:00</updated><title type='text'>नारों में तान देने आए थे नगाड़े वाले</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-wjNXLRiQ14s/TlXzqVq9gMI/AAAAAAAAAWM/UuIHc6zjkOk/s1600/DSC00288.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-wjNXLRiQ14s/TlXzqVq9gMI/AAAAAAAAAWM/UuIHc6zjkOk/s400/DSC00288.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5644685616676176066" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नगाड़े वालों की यह टोली 22 अगस्त की रात रामलीला मैदान पहुंची थी। वह वृंदावन से आई थी। जांच-पड़ताल के नाम पर पुलिसवालों ने इन्हें बाहर ही रोक दिया था। &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;टोली के साथ आए विनोद शर्मा ने हमें बताया, “हम अन्ना की आवाज में तान देने आए हैं।”&lt;/span&gt; 24 अगस्त की देर रात ढूंढ़ने के बावजूद वे हमें नहीं दिखे। हालांकि बीती रात मुश्किलों से भरी थी और रह-रहकर किसी कोने से ढोल की आवाज आ रही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल जो-जो टोलियां आई हैं उसका लेखा-जोखा है। फिलहाल तो इस तस्वीर में उस वृंदावनी टोली को देखें।&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-5257061649566952294?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/5257061649566952294/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=5257061649566952294' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/5257061649566952294'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/5257061649566952294'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/08/blog-post_25.html' title='नारों में तान देने आए थे नगाड़े वाले'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-wjNXLRiQ14s/TlXzqVq9gMI/AAAAAAAAAWM/UuIHc6zjkOk/s72-c/DSC00288.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-770111339733313863</id><published>2011-08-24T02:49:00.000-07:00</published><updated>2011-08-24T02:59:50.789-07:00</updated><title type='text'>अन्ना की रसोई</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-72hebBWF9hg/TlTLJpAi0JI/AAAAAAAAAWE/oPpCs81i7yE/s1600/DSC00287.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-72hebBWF9hg/TlTLJpAi0JI/AAAAAAAAAWE/oPpCs81i7yE/s400/DSC00287.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5644359599489470610" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अन्ना की रसोई का लुत्फ उठाते विदेशी मेहमान। पूछने पर बताया, "अदभुत नजारा है।"&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-770111339733313863?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/770111339733313863/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=770111339733313863' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/770111339733313863'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/770111339733313863'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/08/blog-post_24.html' title='अन्ना की रसोई'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-72hebBWF9hg/TlTLJpAi0JI/AAAAAAAAAWE/oPpCs81i7yE/s72-c/DSC00287.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-7146267360602224157</id><published>2011-08-20T04:38:00.000-07:00</published><updated>2011-08-20T04:44:25.162-07:00</updated><title type='text'>आगे बड़ी लड़ाई है...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-zOPPd1Px0Mw/Tk-dKDpT35I/AAAAAAAAAV0/ov1anZgfnj0/s1600/anna%2Bhazare%2Bvertical%2B-%2BAP_4.jpg.crop_display.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 237px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-zOPPd1Px0Mw/Tk-dKDpT35I/AAAAAAAAAV0/ov1anZgfnj0/s320/anna%2Bhazare%2Bvertical%2B-%2BAP_4.jpg.crop_display.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5642901654221348754" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;इससे पहले भी भ्रष्टाचार के विरुद्ध दो जनआंदोलन हो चुके हैं। आजकल उनसे ही अपनी-अपनी समझ से अक्सर लोग तुलना करते पाए जा रहे हैं। जब भविष्य को साफ-साफ पढ़ना मुश्किल होता है तब स्वाभाविक रूप से इतिहास की तरफ नजर जाती है और तुलना होने लगती है। कई बार कोई समानता न होने पर भी खिंच-    खांचकर तुलना की जाती है। वैसे तो हर जनआंदोलन की अपनी खास वजह होती है और उसका विकास उन परिस्थितियों में होता है जो तात्कालिकता से जुड़ी होती है। अन्ना हजारे के आंदोलन से पहले सातवें दशक में गुजरात और बाद में बिहार आंदोलन भ्रष्टाचार के विरुद्ध विगुल से शुरू हुआ, जिसमें जेपी का नेतृत्व मिला। उससे आंदोलन बिखरने से बचा और वह व्यवस्था परिवर्तन के लक्ष्य से प्रेरित हुआ। दूसरा आंदोलन विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में शुरू हुआ और राजीव गांधी को हराकर समाप्त हो गया। वे दोनों आंदोलन मूलतः राजनीतिक थे। अन्ना हजारे का आंदोलन जो अभी अपना आकार ग्रहण कर रहा है, वह राजनीतिक होने की दिशा में है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्ना हजारे ने जो चुनौती उछाली है वह नैतिक ही है। जिसे हल्का करने की चाले चलकर इस सरकार ने राजनीतिक बनने के लिए रास्ता खोल दिया है। नैतिक सवाल हमेशा सर्वव्यापी और समावेशी होता है। जब कोई आंदोलन राजनीतिक राह पकड़ता है तो वह सत्ता की धूरी पर टिक जाता है और युद्ध की युक्ति से चलता है। उसका  अपना पक्ष होता है और वह किसी को परास्त करने के लक्ष्य से प्रेरित हो जाता है। इसे एक घटना से समझना आसान होगा।&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; बात अक्टूबर 1974 की है। जेपी ने  बिहार के आंदोलन में विधानसभा को भंग करने की मांग रख दी। उनका कहना था कि बिहार विधानसभा जनता का विश्वास खो चुकी है इसलिए उसे भंग कर दिया जाना चाहिए। वह मांग इंदिरा गांधी को कई कारणों से पसंद नहीं आई। वे इसे अपने खिलाफ राजनीतिक अभियान समझने लगी थी। उन्होंने अपने गृहमंत्री उमाशंकर दीक्षित को निर्देश दिया कि वे बिहार के मुख्यमंत्री को दिल्ली बुलावें। उनसे बात करें और कहें कि बिहार सरकार जेपी को गिरफ्तार कर ले। 4 नवंबर 1974 को जेपी ने वह तारीख तय कर रखी थी जिस दिन विधानसभा को भंग करने का ज्ञापन दिया जाना था। पूरे राज्य में हस्ताक्षर अभियान चला और उसको ही राज्यपाल को सौंपा जाना था। इंदिरा गांधी चाहती थी कि बिहार के मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर जेपी को गिरफ्तार करें। इसके लिए ही गृहमंत्री उमाशंकर दीक्षित ने उन्हें दिल्ली बुलाया और  अपनी ओर से बताया कि इंदिरा गांधी क्या चाहती हैं। लोग शायद यकीन न करें पर यह सच है कि गृहमंत्रालय में उमाशंकर दीक्षित के सामने बैठे अब्दुल गफूर ने दो-टूक जबाव दिया, “यह मैं नहीं करूंगा। इस्तीफा देना पसंद करूंगा।“&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार यह काम  शीला दीक्षित कर सकती थी, बशर्ते पुलिस उनके अधीन होती। इतिहास से सीख लेकर  पी.चिदंबरम भी ऐसा कर सकते थे। लेकिन वे और उनके साथी मंत्री अन्ना हजारे  को राजनीति के पाले में डालने पर तुले हुए हैं। इस कारण वे सच बोलने के बजाए पूरे देश को गुमराह कर रहे हैं कि अन्ना हजारे को गिरफ्तार दिल्ली पुलिस ने किया है। अफसोस यह है कि विपक्ष भी इसका सही जवाब नहीं दे रहा है। सच यह है कि अन्ना हजारे के बारे में जो भी पुलिस कार्रवाई हुई है वह केबिनेट की राजनीतिक मामलों की समीति का फैसला है। जो प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की सहमति के बगैर हो ही नहीं सकता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्ना हजारे ने अपने आंदोलन को अहिंसक बनाए रखने की हर कोशिश की है। इस अर्थ में वे सविनय अवज्ञा के नए प्रबोधक बन गए हैं। उन्हें स्वतःस्फूर्त समर्थन मिल रहा है। संभवतः इस तरह के समर्थन की उम्मीद उन्हें भी नहीं रही होगी। ये लोग तो अवश्य ही अवाक हैं जो कहते रहे हैं कि समाज में आंदोलन का भाव बदल गया है। इस जन-उभार ने यह दिखा दिया है कि मुद्दा सही हो और नेतृत्व निस्वार्थी हो तो लोग उसके पीछे चलेंगे। लोग जान की बाजी लगा देंगे। उन्हें सिर्फ पता होना चाहिए कि किस मकसद से उनका आह्वान किया जा रहा है। सरकार ने गोलमेज बातचीत में वक्त गवाया और अन्ना को भरमाया। आजादी की लड़ाई में अंग्रेज यही तरीका अपनाते थे और हर बार उन्हें मुंह की खानी पड़ती थी। अन्ना की शक्ति सामान्य जन है। उनकी जो कमजोरी है उसे मीडिया ने पूरा कर दिया है। मीडिया ही लोगों से संवाद कर रहा है। इस संवाद ने अभियान को आंदोलन की शक्ल दे दी है और नारे लगने लगे हैं कि ‘अन्ना नहीं आंधी है’&lt;br /&gt;इस तरह के नारे जनभावनाओं को प्रकट करते हैं। अब यह जानने और समझने का समय नहीं है कि अन्ना क्या हैं और क्या नहीं हो सकते। यह सवाल भी नहीं रह गया है कि वे कब क्या बोलें। जो आज मायने रखता है और जो भविष्य में अपनी छाप छोड़ेगा वह यह है कि लोगों के मन में अन्ना की छवि क्या है। इस अर्थ में यह आंदोलन दो  समानांतर छवियों का संघर्ष है। एक अन्ना की चमकदार छवि है जो लोगों को आकर्षित कर रही है तो दूसरी यूपीए सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह की टूटती छवि है जो लोगों के मन में वितृष्णा पैदा कर रही है। यह ईमानदार और बेईमान का टकराव नहीं है। यह बनती बिगड़ती छवि का जनमानस में गहराता हुआ असर है। इसी लिहाज से तुलनाओं को देखा जा सकता है जब लोग इमरजंसी को याद करने लगे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बात का सही आकलन तो बाद में ही हो सकता है कि जिस मध्यवर्ग को खारिज किया जा रहा था वह अचानक क्यों आंदोलन में कूद पड़ा है। क्या उसकी आंतरिक बनावट बदल गई है। क्या यह भूमंडलीकरण में राज्यतंत्र के ढीले पड़ते प्रभाव का द्योतक है। क्या यह मध्यवर्ग वह है जो राज्यतंत्र की इसलिए परवाह नहीं करता क्योंकि उसके आर्थिक हित निजी क्षेत्र में नीहित हैं। क्या इसलिए सिर्फ शासन में भ्रष्टाचार का मुद्दा अन्ना हजारे के आंदोलन में प्रमुख है? ये ऐसे सवाल हैं जिनका तुरंत जवाब ढूंढना अंधेरे में तीर चलाने जैसा होगा। यह कहना भी अभी जल्दबाजी होगी कि इस आंदोलन ने जो राह पकड़ी है वह किस मंजिल पर पहुंचेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस आंदोलन की खूबी इसमें है कि इसने नागरिक को प्रेरित कर दिया है। उसकी उस आस्था को जगा दिया है कि वही भ्रष्टाचार की बुराई को दूर करने में सहायक हो सकता है। इसी आस्था ने उसे सड़क पर उतारा है। सविनय अवज्ञा का यह बल वास्तव में लोकतंत्र का आधार है। यह आधार जितना मजबूत होगा उतनी ही ऊंची इमारत लोकतंत्र की खड़ी हो सकेगी। इस अंदोलन से जनलोकपाल की जनआकांक्षा प्रकट हो रही है। देखने में यह बड़ी है, लेकिन परिणाम में यह एक संस्था को ही जन्म देगी। उससे समूची व्यवस्था का जो संकट है वह हल नहीं होगा। उसे हल करने के लिए इससे कहीं बड़े जनआंदोलन की तैयारी करनी होगी। यह भी याद रखना होगा कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध शुरू हुआ यह तीसरा जनआंदोलन है जो संसदीय लोकतंत्र के पाले में जाकर दम न तोड़ बैठे। इसलिए भ्रष्टाचार के मूल स्रोतों पर चौतरफा और मारक प्रहार का सतत आंदोलन ही सार्थक तरीका हो सकता है।&lt;br /&gt;(जनलोकपाल आंदोलन पर वरिष्ठ पत्रकार &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;रामबहादुर राय&lt;/span&gt; का मत)&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-7146267360602224157?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/7146267360602224157/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=7146267360602224157' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/7146267360602224157'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/7146267360602224157'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/08/blog-post_20.html' title='आगे बड़ी लड़ाई है...'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-zOPPd1Px0Mw/Tk-dKDpT35I/AAAAAAAAAV0/ov1anZgfnj0/s72-c/anna%2Bhazare%2Bvertical%2B-%2BAP_4.jpg.crop_display.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-1477535484789350498</id><published>2011-08-20T02:21:00.000-07:00</published><updated>2011-08-20T02:24:43.201-07:00</updated><title type='text'>लोकपाल बिल लs कs रहब</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-znMPkrvmVLE/Tk99TH0fGMI/AAAAAAAAAVs/OAlTvBPrdBM/s1600/anna.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 202px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-znMPkrvmVLE/Tk99TH0fGMI/AAAAAAAAAVs/OAlTvBPrdBM/s320/anna.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5642866625588697282" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;वह खुली पंचायत थी। अन्ना की टीम से एक पत्रकार ने सवाल किया कि आप प्रधानमंत्री से पटवारी तक को लोकपाल के दायरे में लाना चाहते हैं। लेकिन एनजीओ को इससे बाहर रखा है। ऐसा क्यों है ? इसपर अरविंद केजरीवाल बोले। कहा, “ हम उन एनजीओ को जन-लोकपाल के दायरे में लाने पर सहमत हैं जो सरकारी पैसे से काम कर रहे हैं।” केजरीवाल उन एनजीओ को जन-लोकपाल के दायरे में लाने पर सहमत नहीं थे जो बगैर सरकारी सहयोग के चलते हैं। इसपर जब पूरक सवाल किए गए तो वे आक्रामक हो गए। फिर जो कहा उसका लब्बोलुआव यह था कि मीडिया भी तो इसके दायरे में नहीं आना चाहती। हजारों लोगों के सामने चल रही उस प्रेस-वार्ता का नजारा अलग था। वहां खड़े लोग इसे देख-सुन रहे थे। साथ ही सवाल और फिर जवाब पर राय-दर-राय जाहिर कर रहे थे। यह सिलसिला लंबा चला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, आधा रामलीला मैदान कीचड़ से पटा है। फिर भी लोगों की आवाजाही जारी है। कई लोग जमे हैं। नारे लगा रहे हैं, “अन्नाजी के पास है, अनशन का ब्रह्मास्त्र है।” यही नहीं, दूसरे नारे भी हैं। मसलन- “मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना। अब तो सारा देश है अन्ना।।“ यह नजारा केवल रामलीला मैदान का नहीं है। निकटवर्ती इलाकों में भी नारे गूंज रहे हैं। मैदान के बाहर तो ठेठ देहादी मेला जैसा नजारा है। छोटे-छोटे बच्चे 10 रुपए के दो तिरंगे बेच रहे हैं। पूछ कर यदि न लें तो चार देने को तैयार हैं। आंदोलन की पोशाक बन चुकी ‘अन्ना टोपी’ भी यहां मिल रही है। उसपर लिखा है, ” मैं अन्ना हूं।” हालांकि इस टोपी की शक्ति पर राजनीतिक गलियारों में बहस जारी है। पर यहां पहुंचे कई लोग इसे सिर पर डालकर उत्साह में चूर हैं। वे नारे लगा रहे हैं, “पूरा देश खड़ा हुआ है। जनलोकपाल पर अड़ा हुआ है।।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम आठ बजे के आसपास फिर बारिश शुरू हो जाती है। फिर भी लोग यहां खड़े हैं। बारिश से सरोबोर होकर। तमाम चैलनों पर यहां से लाइव रिपोर्टिंग की जा रही है। उन लोगों ने अपने वास्ते अस्थाई मंच बना रखा हैं। रात 10 बजे के आसपास भीड़ कम होने लगती है। हालांकि, जो लोग वहां हैं वे अब भी नारों-गीतों में डूबे हुए हैं। मैदान की दाई तरफ प्राथमिक उपचार की सुविधा हैं। वहां कुछेक लोग लगातार खड़े नजर आ रहे हैं। पूछने पर पता चला कि जिसे कोई तकलीफ हो रही है वह यहां आ रहा है। रोशनी की व्यवस्था कम है और पुलिस की चहलकदमी बढ़ रही है। अब व्यक्ति अब भी पट्टा लिए बैठा है। उस पर लिखा है, “अन्ना हजारे के अछि ललकार, भ्रष्टाचारी नेता होशियार। लोकपाल बिल लs कs रहब, मैथिल समाज के अईछ आवाज।।” इस पढ़ते-पढ़ते हम मैदान से बाहर आ जाते हैं। 20 अगस्त की सुबह-सबेरे वह उसी स्थान पर दिख रहा है। हवा फिर गर्म हो रही है। &lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-1477535484789350498?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/1477535484789350498/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=1477535484789350498' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/1477535484789350498'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/1477535484789350498'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/08/s-s.html' title='लोकपाल बिल लs कs रहब'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-znMPkrvmVLE/Tk99TH0fGMI/AAAAAAAAAVs/OAlTvBPrdBM/s72-c/anna.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-1876519107541968065</id><published>2011-08-19T03:35:00.000-07:00</published><updated>2011-08-19T03:36:28.495-07:00</updated><title type='text'>एक आंदोलन ‘भूदान’ भी था</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-Dv0ruftYM10/Tk48oqFsA5I/AAAAAAAAAVk/nX_1QZ448fY/s1600/VinobaBhave.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 195px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-Dv0ruftYM10/Tk48oqFsA5I/AAAAAAAAAVk/nX_1QZ448fY/s320/VinobaBhave.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5642514052332389266" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;वह 18 अप्रैल, 1951 की तारीख थी, जब आचार्य विनोबा भावे को जमीन का पहला दान मिला था। उन्हें यह जमीन तेलंगाना क्षेत्र में स्थित पोचमपल्ली गांव में दान में मिली थी। यह विनोबा के उसी भूदान आंदोलन की शुरुआत थी, जो अब इतिहास के पन्नों में दर्ज है या फिर पुराने लोगों की स्मृति में। खैर, विनोबा की कोशिश थी कि भूमि का पुनर्वितरण सिर्फ सरकारी कानूनों के जरिए नहीं हो, बल्कि एक आंदोलन के माध्यम से इसकी सफल कोशिश की जाए। 20वीं सदी के पचासवें दशक में भूदान आंदोलन को सफल बनाने के लिए विनोबा ने गांधीवादी विचारों पर चलते हुए रचनात्मक कार्यों और ट्रस्टीशिप जैसे विचारों को प्रयोग में लाया। उन्होंने सर्वोदय समाज की स्थापना की। यह रचनात्मक कार्यकर्ताओं का अखिल भारतीय संघ था। इसका उद्देश्य अहिंसात्मक तरीके से देश में सामाजिक परिवर्तन लाना था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, तब विनोबा पदयात्राएं करते और गांव-गांव जाकर बड़े भूस्वामियों से अपनी जमीन का कम से कम छठा हिस्सा भूदान के रूप में भूमिहीन किसानों के बीच बांटने के लिए देने का अनुरोध करते थे। तब पांच करोड़ एकड़ जमीन दान में हासिल करने का लक्ष्य रखा गया था जो भारत में 30 करोड़ एकड़ जोतने लायक जमीन का छठा हिस्सा था। उस वक्त प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (पीएसपी) के नेता जयप्रकाश नारायण भी 1953 में भूदान आंदोलन में शामिल हो गए थे। आंदोलन के शुरुआती दिनों में विनोबा ने तेलंगाना क्षेत्र के करीब 200 गांवों की यात्रा की थी और उन्हें दान में 12,200 एकड़ भूमि मिली। इसके बाद आंदोलन उत्तर भारत में फैला। बिहार और उत्तर प्रदेश में इसका गहरा असर देखा गया था। मार्च 1956 तक दान के रूप में 40 लाख एकड़ से भी अधिक जमीन बतौर दान मिल चुकी थी। पर इसके बाद से ही आंदोलन का बल बिखरता गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1955 तक आते-आते आंदोलन ने एक नया रूप धारण किया। इसे ‘ग्रामदान’ के रूप में पहचाना गया। इसका अर्थ था ‘सारी भूमि गोपाल की’। ग्रामदान वाले गांवों की सारी भूमि सामूहिक स्वामित्व की मानी गई, जिसपर सबों का बराबर का अधिकार था। इसकी शुरुआत उड़ीसा से हुई और इसे काफी सफलता मिली। 1960 तक देश में 4,500 से अधिक ग्रामदान गांव हो चुके थे। इनमें 1946 गांव उड़ीसा के थे, जबकि महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर था। वहां 603 ग्रामदान गांव थे। कहा जाता है कि ग्रामदान वाले विचार उन्हीं स्थानों पर सफल हुए जहां वर्ग भेद उभरे नहीं थे। वह इलाका आदिवासियों का ही था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर बड़ी उम्मीदों के बावजूद साठ के दशक में भूदान और ग्रामदान आंदोलन का बल कमजोर पड़ गया। लोगों की राय में इसकी रचनात्मक क्षमताओं का आम तौर पर उपयोग नहीं किया जा सका। दान में मिली 45 लाख एकड़ भूमि में से 1961 तक 8.72 लाख एकड़ जमीन गरीबों व भूमिहीनों के बीच बांटी जा सकी थी। कहा जाता है कि इसकी कई वजहें रहीं। मसलन- दान में मिली भूमि का अच्छा-खासा हिस्सा खेती के लायक नहीं था। काफी भूमि मुकदमें में फंसी हुई थी, आदि-आदि। कुल मिलाकर ये बातें अब भुला दी गई हैं। हालांकि, कभी-कभार मीडिया में भूदान में मिली जमीन के बाबत खबरें आती रहती हैं। आचार्य विनोबा का भूदान आंदोलन लोगों के जेहन में रह गया है। जानकारों की राय में आजादी के बाद यह उन पहली कोशिशों में से एक था, जहां रचनात्मक आंदोलन के माध्यम से भूमि सुधार की कोशिशें की गई थी। सो लोगों ने बड़ी कोशिशें की हैं, इस समाज को आगे लाने की। दुख है कि वह कोशिश राजनीतिक या फिर शासकीय मकड़ाजाल में फंसकर रह जाती है।&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-1876519107541968065?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/1876519107541968065/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=1876519107541968065' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/1876519107541968065'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/1876519107541968065'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/08/blog-post_19.html' title='एक आंदोलन ‘भूदान’ भी था'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-Dv0ruftYM10/Tk48oqFsA5I/AAAAAAAAAVk/nX_1QZ448fY/s72-c/VinobaBhave.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-8588956338700549158</id><published>2011-08-18T03:31:00.000-07:00</published><updated>2011-08-18T03:33:40.616-07:00</updated><title type='text'>आपातकाल का वह दौर</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-QrTrt2Xmf54/TkzqSfafTVI/AAAAAAAAAVc/WRRouqOr0Yg/s1600/Indian-Herald-Emergency-Headline.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 268px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-QrTrt2Xmf54/TkzqSfafTVI/AAAAAAAAAVc/WRRouqOr0Yg/s320/Indian-Herald-Emergency-Headline.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5642142036579536210" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;26 जून 1975&lt;/span&gt; का दिन आजाद भारत के इतिहास में काला दिन था। वह दिन अचानक नहीं आया था। धीरे-धीरे इसकी हवा बनी। पहले तो जनवरी 1974 में गुजरात में अनाजों व दूसरी जरूरी चीजों की कीमतों में वृद्धि हुई जन आक्रोश फैला। वह छात्रों के असंतोष के रूप में सामने आया। फिर इसका दायरा तेजी से बढ़ता गया। विपक्षी दल भी इसमें हिस्सा लेने लगे। पूरे राज्य में हंगामों का दौर शुरू हो गया। दूसरी तरफ मार्च 1974 में बिहार के छात्र भी सड़क पर उतर आए। छात्रों के बुलावे पर राजनीति से संन्यास ले चुके जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन का नेतृत्व संभाला। तब उन्होंने इसे संपूर्ण क्रांति का नारा दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जेपी ने छात्रों और लोगों से कहा कि वे सरकारी कार्यालयों और विधानसभा का घेराव करें। मौजूदा विधायकों पर त्यागपत्र देने के लिए दबाव बनाएं। सरकार को ठप कर दें और जन सरकार गठित करें। इसके बाद जेपी ने बिहार से निकलकर पूरे देश में फैले भ्रष्टाचार और कांग्रेस व इंदिरा गांधी के निष्कासन को लेकर आंदोलन संगठित करने का निर्णय लिया। देशभर में अपने खिलाफ बहती बयार और&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; गुजरात विधानसभा में मिली चुनावी हार के ठीक 14 दिन बाद यानी 26 जून 1975 को देश में आंतरिक आपातकाल की घोषणा कर दी।&lt;/span&gt;  प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई। सरकार के किसी भी विरोधों पर पाबंदी लगा दी गई। रातोंरात आंतरिक सुरक्षा प्रबंधन कानून (मीशा) के तहत देश के शीर्ष विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी हुई। कुल &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;19 महीनों&lt;/span&gt; में हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया। कांग्रेस पार्टी पर भी कठोर नियंत्रण लगा दिया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपातकाल दौरान जेपी द्वारा गठित ‘छात्र युवा संघर्ष वाहिनी’ आंदोलन को तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, ट्रेड यूनियन के नेता, जनसंघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े छात्र नेता अपने-अपने स्तर पर इसका विरोध कर रहे थे। आखिरकार &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;18 जनवरी, 1977 को इंदिरा गांधी ने अचानक मार्च में लोकसभा चुनाव कराए जाने की घोषणा की।&lt;/span&gt; राजनीतिक बंदियों को रिहा कर दिया गया। प्रेस से सेंसरशिप हटा लिया गया। राजनीतिक सभा करने की आजादी बहाल कर दी गई। 16 मार्च को स्वतंत्र और निष्पक्ष माहौल में चुनाव संपन्न हुआ। इंदिरा गांधी और संजय गांधी दोनों ही चुनाव हार गए।&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-8588956338700549158?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/8588956338700549158/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=8588956338700549158' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/8588956338700549158'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/8588956338700549158'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/08/blog-post_18.html' title='आपातकाल का वह दौर'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-QrTrt2Xmf54/TkzqSfafTVI/AAAAAAAAAVc/WRRouqOr0Yg/s72-c/Indian-Herald-Emergency-Headline.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-7511530329565974366</id><published>2011-08-17T01:31:00.000-07:00</published><updated>2011-08-17T01:36:02.356-07:00</updated><title type='text'>डीयू से निकला रैला, अब अन्ना नहीं अकेला</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-WgpYx4AgCx8/Tkt9SegBUUI/AAAAAAAAAVU/QEe-UM_0o24/s1600/anna-hazare-398_062211101519.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 168px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-WgpYx4AgCx8/Tkt9SegBUUI/AAAAAAAAAVU/QEe-UM_0o24/s320/anna-hazare-398_062211101519.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5641740714590163266" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;दोपहर होते-होत छत्रशाल स्टेडियम के आस-पास हजारों लोग इकट्ठा हो चुके थे। वहां माहौल ठीक वैसा ही था, जैसा 8 अप्रैल को जंतर मंतर पर दिखा था। नारे लग रहे थे- &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;“जबतक भ्रष्टाचारियों के हाथ में सत्ता है। तबतक कैसे मेरा भारत महान है।“&lt;/span&gt; कुछ छात्र पर्चा दिखा रहे थे, उसपर लिखा था- &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;“डीयू से निकला रैला। अन्ना नहीं है अब अकेला।“&lt;/span&gt; साथ-साथ एक और नारे लग रहे थे- “सोनिया गांधी निकम्मी है। भ्रष्टाचारियों की मम्मी है।” इतना ही नहीं था। आगे भी वे कह रहे थे- &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;“सरकारी लोकपाल धोखा है। अभी भी बचा लो मौका है।“&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छत्रशाल स्टेडियम से दीवार पर एक छात्र पट्टी लिए खड़ा था। उसपर लिखा था-“बेइमानी का तख्त हटाना है, भ्रष्टाचार मिटाना है।” इसी नारे के ठीक नीचे लिखा था- &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;“यह कैसा स्वराज्य है, जहां भ्रष्टाचारियों के सिर पर ताज है।”&lt;/span&gt; नारे और भी थे जो वहां की फिजाओं में गूंज रहे थे। तभी स्टेडियम के भीतर से बुलाते हुए एक व्यक्ति ने कहा, “भाई साहब यहां पीने का पानी तक नहीं है। पुलिस सुबह 09.20 में यहां लाई है, लेकिन स्टेडियम में पानी की कोई व्यवस्था नहीं है।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोपहर 1.50 तब भीड़ इतनी बढ़ गई की पुलिस को स्टेडियम के गेट खोलने पड़े। हालांकि, पुलिस इस कोशिश में लगी थी कि अधिक से अधिक लोग स्टेडियम के भीतर आ जाएं। पर वह इस काम को पूरा करने में असफल रही। विश्वविद्यालय व निकटवर्ती इलाकों से छात्रों का हुजूम एक-एक कर पहुंच रहा था। शाम तीन बजे तक करीब 10-12 हजार लोगों की भीड़ जमा हो गई थी। इस भीड़ में हिन्दु कॉलेज के प्राध्यापक रतन लाल भी दिखे। वे नारा लगा रहे थे- &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;“हिंदु-मुश्लिम-सिख-ईसाई। भ्रष्टाचारियों ने इन सब को खाई।।“&lt;/span&gt; पास ही खड़े संदीप ने बताया कि वे अन्ना के कहने पर सात दिन की छुट्टी लेकर आए हैं। अंकिता प्राथमिक स्कूल की शिक्षिका हैं। यहां अन्ना के समर्थन में आई हैं। साथ खड़े एक छात्र के हाथ में पोस्टर है। उसपर लिखा है- &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;“शहीदो हम शर्मिंदा हैं। भ्रष्टाचारी जिंदा हैं।”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेबस पुलिस के चेहरे पर तब हंसी की रेखा दिख रही थी जब नारे लग रहे थे- &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;“ये अंदर की बात है, पुलिस हमारे साथ है।” &lt;/span&gt;सैकडों की संख्या में खड़ी पुलिस उन लड़कों को संभालने में असमर्थ थी जो नारे लगा रहे थे- &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;“अन्ना से तुम डरते हो। पुलिस को आगे करते हो।”&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम 3.10 पर स्टेडियम के दोनों तरफ के रास्ते जाम हो गए। पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने ही उस जाम को नियंत्रित करने में पुलिस का सहयोग दिया। कुछ छात्र सफाई काम में भी लगे थे। वे 17 अगस्त की सुबह भी सफाई करते दिखे। सड़क पर बिखरी हुई बोतलें उठा-उठाकर कुडेदान में डाल रहे थे। अब देखना यह है कि बल पकड़ता यह आंदोलन किस दिशा में बढ़ता है। हालांकि, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह संसद में इस मसले पर अपना मत रख चुके हैं। पर उनकी बात से आवाम सहमत नहीं दिख रही हैं। वह अब भी सड़क पर है।&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-7511530329565974366?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/7511530329565974366/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=7511530329565974366' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/7511530329565974366'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/7511530329565974366'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='डीयू से निकला रैला, अब अन्ना नहीं अकेला'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-WgpYx4AgCx8/Tkt9SegBUUI/AAAAAAAAAVU/QEe-UM_0o24/s72-c/anna-hazare-398_062211101519.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-8139794592982061530</id><published>2011-07-22T05:29:00.000-07:00</published><updated>2011-07-22T05:34:19.560-07:00</updated><title type='text'>इबादत के रंग</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-5EDv2rCFtSc/Tiltj7-M_2I/AAAAAAAAAVM/6PkB3ypDtnA/s1600/%25E0%25A4%2587%25E0%25A4%25AC%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25A6%25E0%25A4%25A4.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 180px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-5EDv2rCFtSc/Tiltj7-M_2I/AAAAAAAAAVM/6PkB3ypDtnA/s320/%25E0%25A4%2587%25E0%25A4%25AC%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25A6%25E0%25A4%25A4.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5632153273164955490" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बुल्ले शाह की इबादत का अपना ही अंदाज था। यूं बात करते थे अपने खुदा से-&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ असी भी तैनूं पियारे हां&lt;br /&gt;कि मैहियों घोल घुमाई ?&lt;br /&gt;बस कर जी हुण बस कर जी&lt;br /&gt;काई गल असां नाल हस कर जी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हिन्दी में-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कुछ मैं भी तुझ को प्यारा हूं&lt;br /&gt;या मैं ही तुझ पर वारा हूं ?&lt;br /&gt;बस कर दो, अब बस कर दो&lt;br /&gt;हंसकर कुछ मुझसे तुम कह दो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-8139794592982061530?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/8139794592982061530/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=8139794592982061530' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/8139794592982061530'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/8139794592982061530'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='इबादत के रंग'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-5EDv2rCFtSc/Tiltj7-M_2I/AAAAAAAAAVM/6PkB3ypDtnA/s72-c/%25E0%25A4%2587%25E0%25A4%25AC%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25A6%25E0%25A4%25A4.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-6204541672931405742</id><published>2011-06-27T04:14:00.000-07:00</published><updated>2011-06-27T04:25:27.535-07:00</updated><title type='text'>‘पीर गायब’ के किस्से</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-s005unkThZs/TghmR6dLEWI/AAAAAAAAAU8/bzjqQuHhV_0/s1600/res3.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 267px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-s005unkThZs/TghmR6dLEWI/AAAAAAAAAU8/bzjqQuHhV_0/s320/res3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5622856592707490146" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;"पीर गायब"&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-LxwVcZgYWjA/Tghmk29OaII/AAAAAAAAAVE/uAU4hb81NUI/s1600/baoli-near-pir-ghaib.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-LxwVcZgYWjA/Tghmk29OaII/AAAAAAAAAVE/uAU4hb81NUI/s320/baoli-near-pir-ghaib.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5622856918185699458" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पीर गायब से लगी बावड़ी&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;फिरोज शाह तुगलक वह शासक था, जिसने अपने शासनकाल में कई इमारतें बनवाईं। इन्हीं में से एक है दिल्ली के उत्तरी रिज में स्थित हिंदूराव अस्पताल से लगी एक इमारत। इसका नाम है- ‘पीर गायब’। इसी इमारत से लगी हुई एक बावड़ी भी है। पीर गायब छोटी दो मंजिला इमारत है। फिरोज शाह ने इसे चौदहवीं शताब्दी के मध्य में बनवाया था।&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस जमाने में इमारत का उपयोग शिकारगाह एवं जानवरों को तलाशने के समय किया जाता था। तब इमारत की पहचान कुश्क-ए-शिकारा के नाम से थी। हालांकि, इस जगह के बारे में कुछ और कहानियां भी मशहूर हैं। जैसे यह इमारत कभी खगोलीय प्रेक्षणा के लिए इस्तेमाल की जाती रही होगी। ऐसा इसलिए माना जाता है, क्योंकि इसके दक्षिणी कमरे की फर्श और छत को भेदता हुआ एक सुराख है जो गोलाकार रूप लिए हुए है। शायद यही वजह है कि इसका एक नाम कुश्क-ए-जहांनुमा भी है, जिसका अर्थ-विश्व दर्शन महल है। ऐसी ही दूसरी कहानी भी मशहूर है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;बहरहाल, एक अनगढ़े पत्थरों से निर्मित इस इमारत का जीर्णोद्धार अभी हाल ही में हुआ मालूम पड़ता है। दूसरी मंजिल पर पहुंचने वाली सीढ़ियां नई बनी दिखती हैं। इसके बचे अवशेषों में दो संकरे कक्ष उत्तर और दक्षिण की ओर हैं। दूसरी मंजिल पर भी दो कमरे हैं। अंग्रेजों के समय में तो इसका इस्तेमाल सिर्फ क्रांतिकारियों को पकड़ने या फिर उनकी स्थिति का जायजा लेने के लिए किया जाता था। 1857 के सैनिक विद्रोह के दौरान अंग्रेज सैनिक इस ऊंची इमारत पर चढ़कर अपनी बंदूकों से निशाना साधते थे, क्योंकि उस वक्त रिज के जंगल में यह एक ऊंची इमारत थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस इमारत के अहाते में एक बावड़ी भी है जो कि इलाके में पानी की आपूर्ति के लिए बनवाई गई थी। पर आज वह एक गहरे गड्ढे के रूप में नजर आती है। आज यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन एक संग्रहणीय इमारत से ज्यादा हिंदूराव अस्पताल की कचरा-पेटी नजर आती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पढें श्रुति अवस्थी की रिपोर्ट&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-6204541672931405742?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/6204541672931405742/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=6204541672931405742' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/6204541672931405742'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/6204541672931405742'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/06/blog-post_27.html' title='‘पीर गायब’ के किस्से'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-s005unkThZs/TghmR6dLEWI/AAAAAAAAAU8/bzjqQuHhV_0/s72-c/res3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-580387538586016704</id><published>2011-06-24T01:24:00.000-07:00</published><updated>2011-06-24T01:32:48.823-07:00</updated><title type='text'>राजनीति में विचारनिष्ठा के पुनर्जागरण का युग आया है: उमा भारती</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/--p-N4pcEVBo/TgRKUdszcdI/AAAAAAAAAU0/Vs1A1DVWz84/s1600/ub.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 230px;" src="http://3.bp.blogspot.com/--p-N4pcEVBo/TgRKUdszcdI/AAAAAAAAAU0/Vs1A1DVWz84/s320/ub.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5621699950295609810" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;भारतीय जनता पार्टी की तेजतर्रार नेता साध्वी उमा भारती 2005 में पार्टी से अचानक बाहर हो गई थीं। तब उनके निष्कासन को राजनीति विश्लेषक पार्टी की अंदरूनी खींच-तान का परिणाम मान रहे थे। इसके बाद 30 अप्रैल 2006 को उमा भारती ने उज्जैन के निकट स्थित महाकाल में नई पार्टी की घोषणा की। नाम रखा- भारतीय जनशक्ति पार्टी। उस समय अपनी पार्टी को भाजपा का पुनर्जन्म बताते हुए उमा ने खुद को 'पन्ना धाय' की संज्ञा दी थी और राष्ट्रवादी विचारधारा को जीवित रखने की प्रतिज्ञा ली थी। पर, लोकप्रियता के बावजूद उनकी पार्टी को मध्य प्रदेश में कोई खास चुनावी सफलता नहीं मिली। हालांकि, इस दौरान उमा भारती गंगा अभियान से भी जुड़ी रहीं।  आखिरकार 25 मार्च, 2010 को उन्होंने अपनी ही पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। और अब सात जून को भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने अचानक उनके पार्टी में शामिल होने की घोषणा कर दी है। उमा भारती बताती हैं कि यह अचानक क्यों हुआ, इसकी जानकारी तो उन्हें भी नहीं है। भावी योजनाओं के साथ-साथ इस बाबत प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत  के संपादित अंश। &lt;blockquote&gt;श्रुति अवस्थी और ब्रजेश कुमार से हुई पूरी बातचीत के लिए प्रथम प्रवक्ता पढ़ें।&lt;/blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल: करीब छह साल बाद भारतीय जनता पार्टी में वापसी पर क्या महसूस कर रही हैं ?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब: छह साल नहीं, साढ़े पांच साल बाद। छह साल तो पूरे नहीं हुए। फिलहाल कुछ भी नया महसूस नहीं कर रही हूं, क्योंकि जब मैंने अलग पार्टी बनाई तो उसमें भारतीय जनता पार्टी के ही कार्यकर्ता थे और विचारधारा भी वही थी। यही वजह है कि भाजपा से जाना तो महसूस हुआ, पर आना महसूस नहीं हुआ। जब पार्टी से जाना हुआ तो संवाद में दूरी आ गई थी। इससे जाना महसूस हुआ, लेकिन अब जब आ गई हूं तो ऐसा महसूस नहीं हो रहा है कि कोई चीज हुई हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल: आपके पार्टी में लाए जाने की  मीडिया में कई बार खबरें आईं, पर तब ऐसा नहीं हुआ। सात जून को अचानक इसकी घोषणा की गई। इसकी कोई खास वजह थी ?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब: इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं है। हां,  नितिन गडकरी जी और आडवाणी जी पिछले एक-डेढ़ साल से मुझे पार्टी में आने के लिए कह रहे थे। बाकि अचानक यह घटनाक्रम क्यों हुआ, यह मेरी जानकारी में नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल: आपके पार्टी में आने को इतना गोपनीय रखा गया कि यह खबर आई कि इसकी जानकारी खुद आपको भी नहीं थी कि सात जून को आप भाजपा में शामिल होने जा रही हैं। इसकी कोई खास वचह तो होगी।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब: मैं इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं करना चाहती। आडवाणी जी, नितिन गडकरी जी और अशोक सिंघल जी के ऊपर मेरा पूरा विश्वास है। मैं इन लोगों से किसी न किसी कारण लगातार संपर्क में रही हूं। वे लोग जो कुछ कह रहे हैं, वह सही है। मैं उनके निर्णय को ठीक मानती हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल: उत्तर प्रदेश के भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों की मांग पर आपको पार्टी में लाया गया। ऐसा कहा जा रहा है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब: मैं देशभर में जहां भी जाती थी भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता मुझसे मिलते थे। वे पार्टी में आने का आमंत्रण देते थे। मैं गत दिसंबर के महीने में जब द्वादश ज्योतिर्लिंग की यात्रा पर गई थी तो वहां मंदिरों में श्रद्धालुओं का जो भी समूह मिलता था, वह एक ही बात कहता था कि आप भाजपा में शामिल हो जाइये। इसलिए मैं तो यही मानती हूं कि उत्तर प्रदेश ही क्यों, भाजपा का कोई भी कार्यकर्ता जहां भी होगा उसको इस बात से खुशी होगी कि मैं पार्टी में वापस आई हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल: पार्टी अध्यक्ष ने मुख्य तौर पर आपको जो जिम्मेदारी सौंपी  है वह क्या है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब: उन्होंने इसकी घोषणा की है। हां, मैं गंगा से जुड़े मुद्दे को लेकर पहले से सक्रिय थी और भाजपा में भी गंगा सेल है तो मुझे उसका काम सौंपा गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल: उत्तर प्रदेश में जगह-जगह से खबरें आ रही हैं कि आपकी भाजपा में वापसी से कार्यकर्ता काफी उत्साहित हैं। आपके शुक्रताल तीर्थ स्थल और मेरठ के कार्यक्रर्मों से भी यह स्पष्ट हुआ। तो क्या यह माना जाए कि उत्तर प्रदेश में भाजपा को उसका स्वाभाविक नेता मिल गया है ?&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब: यह कोई नई बात नहीं है, इसलिए मैं ऐसा बिल्कुल भी नहीं मानूंगी। हां, मैं यह जरूर मानती हूं कि मेरे आने से वे काफी खुश हैं। मैं पार्टी से चली गई थी तो इसका उन्हें दुख था। ऐसा बिलकुल नहीं है कि उत्तर प्रदेश में कोई नया नेता आ गया है। यहां नेताओं का अभाव नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल: यह सब 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर किया गया है, ऐसी धारणा है। आपके सामने दिग्विजय सिंह ही कांग्रेस की ओर से यहां उपस्थित हैं। आप इस चुनौती को किस तरह देखती हैं?&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;जवाब: मैं व्यक्तिगत स्तर पर कभी टकराव नहीं करती। न ही व्यक्तिगत स्तर पर हमारा किसी से विरोध है। दिग्विजय सिंह मेरे बड़े भाई जैसे हैं और वे भी मुझे छोटी बहन मानते हैं। लेकिन हां, यह एक बड़ी नियती ही है कि मध्यप्रदेश में उन्हें हराने का काम मुझे मिला। इतना ही नहीं, मैं जब बिहार का काम देख रही थी तो चुनाव के दौरान वे लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस गठबंधन का जिम्मा संभाले हुए थे और लालू के वकील की भूमिका में थे। 2003 में मध्य प्रदेश में मेरे हाथों हारने के बाद वे बिहार में भी हारे। यह अजीब बात है कि उनको मात देने का मौका मुझे ही मिलता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल: समय बदल गया है। 2003 में दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश तक सीमित थे। अब आठ साल बाद वे पार्टी के महासचिव और 10 जनपथ के वास्तविक प्रवक्ता के रूप में एक राष्ट्रीय नेता की छवि पा चुके हैं। इससे आपका काम कितना कठिन होगा ?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उत्तर: मैंने आपसे पहले ही कहा कि उत्तर प्रदेश में ऐसा कुछ भी नहीं है। पहले वहां कांग्रेस तो सामने आए। हां, वहां हमें सपा और बसपा का मुकाबला करना है। कांग्रेस पार्टी वहां इतिहास का विषय बन गई है, इसलिए मैं नहीं मानती कि कांग्रेस से हमारी कोई टक्कर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल: यही सही, पर सपा-बसपा से टक्कर के लिए ही पार्टी से आपको कितना सहयोग मिलेगा ?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- मुझे पार्टी से सहयोग नहीं चाहिए। मैं तो पार्टी की कार्यकर्ता हूं और इससे उलट यह मानती हूं कि हमारा राष्ट्रीय दायित्व है कि हम उत्तर प्रदेश में पार्टी की स्थिति को सुधारें, क्योंकि उत्तरप्रदेश से ही भारत की राजनीति में विकृतियां उत्पन्न हुई हैं। इस प्रदेश से दो प्रकार की राजनीति सामने आई। एक तो यह कि दलित वर्ग को यहां अपने दम पर सत्ता मिली। हालांकि, सबसे बड़ा दलित आंदोलन तमिलनाडु में हुआ। महात्मा ज्योतिबा फूले ने भी आंदोलन चलाया। इसके बावजूद राजनीतिक आंदोलन के द्वारा सत्ता-शीर्ष तो उसे उत्तर प्रदेश में ही मिला, जब मायावती बहुमत प्राप्त कर मुख्यमंत्री बनीं। &lt;br /&gt;पर यहां सबसे बुरी बात यह रही कि जो लोग मुसलमानों के हितैषी बनते थे, उन्हीं के शासनकाल में मुसलमानों की स्थिति दयनीय हुई। डॉन-माफियाओं के साथ जुड़ाव यहीं के मुसलमानों का माना गया। प्रदेश के बुनकर-जुलाहे निरंतर बेरोजगार होते गए। कुल मिलाकर आज उत्तर प्रदेश के मुसलमानों की सबसे खराब हालत है। अत: मैं मानती हूं कि राष्ट्रीय हितों को यदि साधना है तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में परिवर्तन लाना होगा। प्रदेश में वैचारिक धरातल पर जो आंदोलन चलते रहे हैं, उसके मूल तत्व को बाहर लाना होगा। मैं यह कदापि नहीं कह रही हूं कि उन आंदोलनों को नकारा जाए। मेरा इतना भर कहना है कि चाहे वह दलित आंदोलन हो या रामजन्म भूमि का आंदोलन, इन आंदोलनों के मूल तत्वों को निकालकर एक नए राजनैतिक आधार पर वहां सत्ता प्राप्त करने की कोशिश करनी होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल: ऐसे में उत्तर प्रदेश का चुनावी मुद्दा क्या होगा ?&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;जवाब: ‘राम’ और ‘रोटी’ दोनों मुद्दा होगा। यानी मंडल भी और कमंडल भी। जो सांस्कृतिक आंदोलन हुए हैं, वह ‘कमंडल’ है और जो सामाजिक आंदोलन हुए हैं वह ‘मंडल’ है। ‘राम-मंदिर से राम-राज्य की ओर’ यही हमारा मुख्य नारा होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल: लेकिन, पिछले दिनों मुजफ्फरनगर जिले के शुक्रताल तीर्थ स्थल में तो आपने एक नया नारा दे दिया है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब: आप ठीक कह रहे हैं। पर वहां मैंने कार्यकर्ताओं के बीच नारा दिया है। आम लोगों के बीच तो हम दूसरी ही बात कहने जा रहे हैं। उनसे कहेंगे कि ‘प्रदेश बचाओ और सरकार बनाओ’। लेकिन मैंने कार्यकर्ताओं को वचन दिया है कि ‘आप मुझे गंगा दीजिए, मैं आपको सत्ता दूंगी।’ मैं पूरी कोशिश करुंगी कि गंगा के कामों में भाजपा के कार्यकर्ता लगें और जनता को भी इसके लिए प्रेरित करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल: आपने पार्टी से बाहर रहने के दौरान भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों को समान दूरी से देखा है। इनमें आपने क्या बदलाव देखा ?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब: जब हम राजनीतिक समीक्षा कर रहे होते हैं तो कुछ चीजों का हमेशा ध्यान रखना होता है। यदि हमें अपने दल के बारे में कुछ कहना है तो हम दल के अंदर ही कहेंगे। मुझे ‘भारतीय जनशक्ति पार्टी’ में कभी कोई कमी दिखती थी तो मैं बाहर बोलने नहीं जाती थी। पार्टी के अंदर ही बैठकर बात होती थी। इसलिए जब मैं भाजपा की समीक्षा करूंगी तो पार्टी के अंदर बैठकर ही करूंगी। बाहर मीडिया के सामने तो नहीं ही करूंगी। &lt;br /&gt;हां, जहां तक पूरी राजनीतिक व्यवस्था की समीक्षा का सवाल है तो मैं यह कह सकती हूं कि अभी एक समय आया है, जिसमें अचानक विचारधाराओं की अतिवादिता खत्म हुई है। जब देवगौड़ा की सरकार बनी तो उस समय वामपंथियों ने अपने आग्रह छोड़े। अपनी विचारनिष्ठाओं से कहीं न कहीं समझौता किया। फिर हमारी सरकार बनी, पर 2004 में हम नहीं जीत पाए। फिर मनमोहन सिंह की सरकार बनी तो उसे बचाने का प्रयास हुआ। इस प्रयास में जो स्थितियां बनीं, उनसब को मिलाकर एक बात कह सकती हूं कि राजनीति में विचारनिष्ठा के पुनर्जागरण का युग आया है। फिर से उसको पुनर्स्थापित करना है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-580387538586016704?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/580387538586016704/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=580387538586016704' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/580387538586016704'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/580387538586016704'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/06/2005-30-2006-25-2010-2012-2003-2003-10.html' title='राजनीति में विचारनिष्ठा के पुनर्जागरण का युग आया है: उमा भारती'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/--p-N4pcEVBo/TgRKUdszcdI/AAAAAAAAAU0/Vs1A1DVWz84/s72-c/ub.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-6695375084165896986</id><published>2011-06-22T23:27:00.000-07:00</published><updated>2011-06-22T23:29:17.211-07:00</updated><title type='text'>अन्ना के आंदोलन में भी गूंज रहे हैं गीत</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-Q2CMAg84zEg/TgLdN1Io0_I/AAAAAAAAAUs/5vN_2jmsrsU/s1600/08hazare1.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 189px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-Q2CMAg84zEg/TgLdN1Io0_I/AAAAAAAAAUs/5vN_2jmsrsU/s320/08hazare1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5621298514583147506" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;‘लोकपाल-लोकपाल, पास करो लोकपाल...’, ‘जन-जन की है यही पुकार, साफ करो अब भ्रष्टाचार...’, ‘जवाब दर सवाल है कि इंकलाब चाहिए...’। ये वे गीत हैं जो आठ जून को राजघाट पर गूंज रहे थे। इससे पहले 5 अप्रैल से 9 अप्रैल तक जंतर-मंतर पर भी गाए गये थे। यकीनन, आंदोलनों की ताप से निकले नारों और गीतों का बड़ा महत्व है। कहते हैं कि इससे आंदोलन को बड़ी ऊर्जा मिलती है। इन नारों में जितना तीखापन और गीत जितने ओजस्वी होंगे, आंदोलन में उतनी ही धार पैदा होगी। पिछले आंदोलनों से अनुभव पा चुके लोगों की भी यही राय है। वैसे भी राजघाट पर खड़े होकर एकबारगी इन बातों से सहमत हुआ जा सकता है। यहां औपचारिक भाषणों के बाद दोपहर 11.00 से नारों और गीतों का जो दौर चला वह अंत तक निरंतर बना रहा। मंच और उसके आस-पास इकट्ठा हुई युवाओं की टोलियां देर शाम तक इसमें डूबी दिखीं। वे एकजुट होकर गा रहे थे, ‘देश को बनाने को एक दूजे के साथ चलें।’ या फिर ‘हम होंगे कामयाब हम होंगे कामयाब, एक दिन...।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिन के 11 बज रहे थे। तभी मंच से महात्मा गांधी का प्रिय भजन ‘रघुपति राघव राजा राम..’ का गायन शुरू हुआ। इसके बाद गीत-संगीत और फिर नारों ने जो बल पकड़ा वह अंत तक बना रहा। नए-पुराने गीतों व नारों के बीच कई ऐसे गीत भी सुनाई दिए जो बल पकड़ रहे जन-लोकपाल अभियान की ही उपज थे। मसलन- ‘ऐ वतन ऐ वतन ऐ वतन, जाने-मन जाने-मन जाने-मन’, ‘लोकपाल-लोकपाल पास करो लोकपाल...’ आदि। इतना ही नहीं, यहां वे फिल्मी गीत भी खूब गाए जा रहे थे जो देशप्रेम का रूहानी अहसास कराते रहे हैं। जैसे- ‘ये धरती, ये अंबर अपना है रे...आ जा रे...’। अन्ना हजारे ने लोगों को संबोधित करते हुए स्वयं गाया- ‘दिल दिया है जान भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए..।’ भरी दोपहरी यानी 11.57 बजे लोग गा रहे थे, ‘अल्लाह तेरो नाम ईश्वर तेरो नाम।’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां आई छात्रों की एक टोली गीतों के माध्यम से ही अपनी बात कह रही थी। वे छात्र गा रहे थे, ‘सौ में अस्सी आदमी फिलहाल जब नासाज है, दिल पर रखकर हाथ कहिए देश क्या आजाद है... ?’। हालांकि, इसका जवाब उन्हीं के गीतों में था, जिसे उन्होंने अगली पंक्ति में साफ किया, ‘असली हिन्दुस्तान तो फुटपात पर आबाद है।’ पूछने पर इन छात्रों ने बताया कि यह ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन (आइसा) से जुड़ा एक सांस्कृतिक ग्रूप है जो गीतों के माध्यम से भ्रष्टाचार के खिलाफ देशभर में अलख जगाने की कोशिश कर रहा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-6695375084165896986?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/6695375084165896986/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=6695375084165896986' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/6695375084165896986'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/6695375084165896986'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/06/blog-post_5021.html' title='अन्ना के आंदोलन में भी गूंज रहे हैं गीत'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-Q2CMAg84zEg/TgLdN1Io0_I/AAAAAAAAAUs/5vN_2jmsrsU/s72-c/08hazare1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-2045642596432503254</id><published>2011-06-22T05:15:00.000-07:00</published><updated>2011-06-22T05:17:26.467-07:00</updated><title type='text'>लोकपाल बिल: लोक से सहमत नहीं सरकार</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-N8-OjinroWE/TgHdUJv3mfI/AAAAAAAAAUk/Yt6TDr1qmfs/s1600/anna_0.jpg.crop_display.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 236px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-N8-OjinroWE/TgHdUJv3mfI/AAAAAAAAAUk/Yt6TDr1qmfs/s320/anna_0.jpg.crop_display.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5621017148218907122" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;आखिरकार 16 अप्रैल से चली बैठक का सिलसिला असहमति के साथ थम गया है। लोकपाल बिल पर नागरिक समाज के प्रतिनिधियों और सरकार के बीच सहमति नहीं बन पाई। 21 जून को हुई अंतिम बैठक बिना किसी सहमति के खत्म हो गई। इसे देश का एक बड़ा वर्ग दुर्भाग्यपूर्ण मान रहा है। अब जब बैठकों का दौर खत्म हो गया है तो सरकार अपने पक्ष में माहौल बनाने के नुस्खे तलाश रही है। वहीं नागरिक समाज के प्रतिनिधि जन-अभियान चलाने की तैयारी में जुट गए हैं।  अब कड़े बिल के प्रावधानों और सरकारी ड्राफ्ट की खामियों की जानकारी जनता को देने अन्ना हजारे देशव्यापी दौरे करने वाले हैं। ताकि अधिक से अधिक जनसमर्थन उन्हें मिले। वे कह रहे हैं, “सरकार की मंशा सख्त लोकपाल बिल बनाने की नहीं है। वह जनता में गलतफहमी पैदा कर रही है। अब 16 अगस्त से अनशन पर बैठने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। लोग सरकार को सबक सिखाएंगे। उनका आंदोलन सरकार के खिलाफ होगा। अब सख्त लोकपाल कानून बना तो ही अनशन वापस होगा।” &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गत 5 अप्रैल की सुबह जब अन्ना ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन शुरू किया था तो लोकपाल बिल आम आदमी की जुबान पर आ गया। तब अन्ना के अभियान को जोर पकड़ता देख और आगामी पांच राज्यों के चुनाव के मद्देनजर सरकार ने उनकी मांगे मान ली थी। इसके बाद बातचीत का दौर चला। हालांकि, उस दौरान कई राजनीतिक दाव खेले गए। नागरिक समाज के प्रतिनिधियों पर आरोप दर आरोप लगाए गए। उन्हें विवाद में लाने की कोशिश हुई, पर दाल गली नहीं। अंतत: चौतरफ दबाव झेल रही सरकार गंभीर हुई। अब जो बिल तैयार हुआ है उससे नागरिक समाज संतुष्ट नहीं है। प्रशांत भूषण ने सरकारी मसौदे को बेहद निराशाजनक बताया हैं। और सरकारी मसौदे को भ्रष्टाचार रोकने का मात्र प्रतीकात्मक क़दम बताया। हालांकि वे अब भी प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाए जाने की अपनी मांग पर क़ायम हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-2045642596432503254?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/2045642596432503254/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=2045642596432503254' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/2045642596432503254'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/2045642596432503254'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/06/blog-post_22.html' title='लोकपाल बिल: लोक से सहमत नहीं सरकार'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-N8-OjinroWE/TgHdUJv3mfI/AAAAAAAAAUk/Yt6TDr1qmfs/s72-c/anna_0.jpg.crop_display.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-3754510403074238529</id><published>2011-06-15T01:29:00.000-07:00</published><updated>2011-06-15T01:32:11.421-07:00</updated><title type='text'>रहस्य में डूबा मालचा महल</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-pUSqCCKkHp0/Tfht2bgdaiI/AAAAAAAAAUc/9mSLaBnm83o/s1600/malchamahal_0.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 128px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-pUSqCCKkHp0/Tfht2bgdaiI/AAAAAAAAAUc/9mSLaBnm83o/s320/malchamahal_0.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5618361317008960034" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;दिल्ली के पठारी इलाके को दो नाम दिए गए। एक वह है, जिसे लोग उत्तरी रिज के नाम से जानते हैं। वहीं दूसरा दक्षिणी रिज है। उत्तरी रिज एक गुलजार इलाका है। यहां सैर-सपाटे के लिए काफी लोग आते हैं। एकांत जगह की तलाश में युवाओं का जोड़ा भी इन इलाकों में खूब दिखता है। पर इसके विपरीत दक्षिणी रिज बेहद शांत और विरान जगह है। इसी दक्षिणी रिज के बिहड़ में छीपा है एक रहस्यमयी महल। चाणक्यपुरी के सरदार पटेल क्रिसेंट पर। यह ठीक भू-जल संरक्षण केंद्र के बगल में स्थित है। नाम है- मालचा महल।&lt;/blockquote&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास में यह दर्ज है कि इस महल को फिरोजशाह तुगलक ने दक्षिणी पहाड़ी पर बनवाया था। यह महल उसका शिकारगाह था। पहाड़ी के एक टिले पर बने इस महल में करीब दस खिड़कियां एवं दरवाजे हैं। पेड़-पौधों व झाड़ियों से घिरा यह छोटा-सा महल करीब 700 साल पुराना है। आज यह एक शाही परिवार का बसेरा है। कहा जाता है कि यह शाही परिवार अवध के नवाब वाजिद अली शाह का है। जब अंग्रेजों ने नवाब वाजिद अली शाह को नजर-बंद कर 1856 में बर्मा भेज दिया तो उनका परिवार बिखर गया था। नवाब की कई रानियां थीं तथा कई बच्चे। इन्हीं वाजिद अली शाह के बेटों में से एक का निकाह बेगम विलायत महल से हुआ था। वाजिद अली के बाद उनकी रिआसत अंग्रेजों के कब्जे में आ गई। उनके बेटे ने अपना जीवन चलाने के लिए अंग्रेजों के यहां नौकरी करने का फैसला किया। जिसकी मौत के बाद बेगम विलायत महल ने लखनऊ में अंग्रेजों से अपनी जमीन पर हिस्सेदारी मांगने की कई बार कोशिशें कीं, पर अंग्रेजी हुकुमत ने इसे मानने से इनकार कर दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1947 में आजादी के बाद रिआसतों के परिवारों को पेंशन देने का इंतजाम किया गया। इसके बाद से बेगम विलायत महल को भी 500 रुपए प्रतिमाह मिलने लगा। पर 1975 में इंदिरा सरकार ने राजाओं के मिलने वाले पेंशनों को बंद कर दिया। इसके बाद बेगम अपने बच्चे रयाज व सकिना और 12 पालतू कुत्ते, चार-पांच नौकरों के साथ दिल्ली आ गई। यहां रेलवे प्लेटफार्म पर ही डेरा जमा दिया और सरकार से अपने रहने का इंतजाम करने के लिए गुहार लगाती रही। बेगम ने रेलवे प्लेटफार्म के वीआईपी वेटिंग लाउज को ही अपना वैकल्पिक आशियाना बना लिया। हटाने की कोशिश करने पर वह कुत्तों से डरातीं। साथ ही जहर खाकर आत्महत्या कर लने की धमकी भी देती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिरकार 1984 में इंदिरा गांधी ने बेगम विलायत महल की सुध ली। उन्हें शाही महल दिलाने का वादा भी किया। हालांकि इस बीच इंदिरा गांधी की हत्या हो गई, पर 1985 में राजीव गांधी ने विलायत महल को नवाब वाजिद अली शाह का वारिस मानते हुए रहने की जगह मुहैया करवाई। यह जगह थी- मालचा महल। एक बेगम को रहने के लिए ऐसा आवास मुहैया करवाया गया जो करीब-करीब खंडहर था। जहां जंगली घास महल की दीवारों से लेकर फर्श तक उगे हुए थे। लाल पत्थरों से बने इस महल में एक भी दरवाजा नहीं था। और तो और शाही वंशजों को सियार,  तेंदुआ और दूसरे जंगली जानवरों से घिरे जंगल में बिजली एवं पानी की सुविधाएं भी नहीं दी गई। यह सुविधाएं आज भी यहां मुहैया नहीं कराई गई हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिरकार बेगम विलायत महल ने अपनी गुमनामी से तंग आकर 1993 में हीरे के चुर्ण को खाकर खुदकुशी कर ली। पर उनके अधेड़ हो चुके बच्चे रियाज और सकिना आज भी उसी महल में रहते हैं। बगैर बिजली- पानी की सुविधा के। यकीनन यह महल एक धरोहर तो है, पर गुमनाम है। खुद आस-पास के लोग भी इसके बारे में कुछ नहीं जानते। जबकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की पुस्तक में इसे एक धरोहर बताया गया है। दिल्ली जोन के एएसआई के निदेशक के.के. मोहम्मद ने बताया, “यह इमारत एएसआई के संरक्षण में नहीं आती।’  महल झाड़-झांखाड़ से इस तरह घिरा है कि सामान्यत: नजर भी नहीं आता है। गौर से देखने पर बाहर एक तख्ती पर नजर जाती है। उसपर लिखा है, ‘रुलर्स ऑफ अवध  प्रिंसेस विलायत महल’।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पढ़ें &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;श्रुति अवस्थी&lt;/span&gt; की रिपोर्ट&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-3754510403074238529?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/3754510403074238529/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=3754510403074238529' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/3754510403074238529'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/3754510403074238529'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/06/blog-post_15.html' title='रहस्य में डूबा मालचा महल'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-pUSqCCKkHp0/Tfht2bgdaiI/AAAAAAAAAUc/9mSLaBnm83o/s72-c/malchamahal_0.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-8429213092036565056</id><published>2011-06-12T23:21:00.000-07:00</published><updated>2011-06-12T23:27:26.465-07:00</updated><title type='text'>पीएसी अध्यक्ष मुरलीमनोहर जोशी से बातचीत</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-kERPUEuwPV0/TfWtlxZm0xI/AAAAAAAAAUU/HPyKoGbXM4U/s1600/BL16_P1_PAC_478707e%2B%25281%2529.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 318px; height: 252px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-kERPUEuwPV0/TfWtlxZm0xI/AAAAAAAAAUU/HPyKoGbXM4U/s320/BL16_P1_PAC_478707e%2B%25281%2529.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5617586974642066194" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पीएसी अध्यक्ष मुरलीमनोहर जोशी से बातचीत हुई है, यहां प्रस्तुत हैं उसकी खास बातें-&lt;/span&gt; &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; सवाल-  गोपीनाथ मुंडे की अध्यक्षता में बनी ‘लोक लेखा समिति’(पीएसी) 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच करना चाहती थी, लेकिन वह नहीं कर सकी। आपकी समिति ने उसे जांच के दायरे में लिया। तब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से ही आपको विरोध का सामना करना पड़ा। क्या उससे पीएसी का काम-काज प्रभावित हुआ?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जवाब&lt;/span&gt;-  दरअसल, उस समय एक प्रकार का भ्रम फैलाया गया कि भाजपा मेरा विरोध कर रही है। मई, 2010 में मैंने जब 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच का काम शुरू किया था तो उस समय संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की कहीं कोई चर्चा नहीं थी और जून से लेकर सितंबर, 2010 तक हमलोग आठ-नौ बैठकें कर चुके थे। हां, यह सच है कि  जेपीसी का सवाल जब उठा तो कुछ लोगों ने कहा कि साहब पीएसी काम कर ही रही है तो जेपीसी की क्या जरूरत है। तब कुछ लोगों ने यह भी कहा कि जेपीसी की मांग उठानी ही है तो पीएसी का काम क्यों हो रही है ? सदन में इसपर बहस चल रही थी। इसी बहस में से यह ध्वनि निकाली गई कि भाजपा पीएसी का विरोध कर रही है, जबकि मेरा कहना यह है कि भाजपा जेपीसी की मांग जरूर कर रही थी। यह सच है, लेकिन वह पीएसी का काम रोक रही थी, यह सही नहीं है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन  (एनडीए) में या बाकी के कुछ लोग ऐसा कहते होंगे कि यदि आप जेपीसी की मांग कर रहे हैं तो पीएसी काम क्यों करें? यह सवाल उठता है। लेकिन,  जांच के दौरान मेरे ऊपर काम को रोकने या उसकी गति को कम करने का कोई दबाव नहीं था।&lt;br /&gt;इसमें दूसरी महत्वपूर्ण बात यह रही कि तब कांग्रेस ने एक नई बहस चलाई। उन लोगों ने कहा कि पीएसी के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी हैं जो स्वयं भाजपा के सदस्य हैं तो फिर पार्टी जेपीसी की मांग क्यों कर रही है। मैंने उस वक्त भी कहा था कि प्रतिपक्ष जेपीसी की मांग कर रहा है। मैं प्रतिपक्ष का सदस्य हूं। जेपीसी बने। इसपर मुझे कोई आपत्ति नहीं है, पीएसी के लिए जो संवैधानिक आदेश हैं, उसके तहत वह अपना काम करेगी। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि जेपीसी बन रही है या नहीं। आखिर सुप्रीम कोर्ट तो काम कर ही रही थी। सीबीआई भी अपना काम कर ही रही थी, लेकिन जो बात फैलाई गई वह यह कि हम पार्टी से हटकर कुछ कर रहे हैं और पार्टी हमें सोमनाथ चटर्जी बना देगी। दरअसल, ऐसी बातें उन लोगों द्वारा फैलाई गई जो जेपीसी में रुचि रखते थे और उसकी तरफ ही जाना चाहते थे। यह जरूरी नहीं है कि वे केवल भारतीय जनता पार्टी के लोग हों, क्योंकि यह तो सभी जानते हैं कि जेपीसी की जांच में क्या निकलेगा और  क्या नहीं? यानी उसमें अनिश्चितता है। पर यहां निश्चितता है। &lt;br /&gt;मेरा अनुमान है कि जो लोग पीएसी की जांच से आतंकित और भयभीत थे, उन्होंने कोशिशें की कि पीएसी का काम न हो और जेपीसी बनती रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल - इनमें क्या भारतीय जनता पार्टी के भी कुछ लोग थे?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब - पार्टी के किसी लोगों ने तो मुझसे ऐसी बाते नहीं कीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल - ऐसा लग रहा था कि समिति में हर दल के लोग आपको सहयोग कर रहे हैं। आखिरकार असहयोग और बाद में विरोध का कारण क्या रहा?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब – हां, 4 अप्रैल,2010 तक तो सभी लोग बड़े सहयोग की मुद्रा में थे। माननीय  प्रधानमंत्री ने भी एक समय यह कहा था कि वे पीएसी के समक्ष उपस्थित होंगे। अप्रैल में ही कांग्रेस के सम्मानित सदस्यों ने पत्र लिखकर कहा कि काम बहुत हो चुका है, अब गवाहियां बंद की जाएं और रिपोर्ट लिखने का काम प्रारंभ हो। इसके बाद हमने कहा कि यह सही है कि अब रिपोर्ट लिखी जा सकती है, पर जांच के दौरान जो बातें सामने आई हैं उसकी पुष्टि जरूरी है,  ताकि रिपोर्ट को अधिक से अधिक प्रामाणिक बनाया जा सके। इसके बाद 4 और 5 अप्रैल 2011 को कुछ लोग बुलाए गए, लेकिन चार अप्रैल को ही अचानक सवाल उठाया गया कि जेपीसी शुरू हो रही है तो अब पीएसी की क्या जरूरत है,  फिर कहा गया कि मामला न्यायाल में है। यह भी कहा गया कि बहुत लोग बुलाए जा रहे हैं। इसके बाद मैंने कहा कि उन पत्रकारों को सुनना जरूरी है, जिन्होंने सबसे पहले इस मुद्दे को उठाया। आखिर मालूम हो कि उनके पास इसकी जानकारी कहां से आई और वे किस आधार पर लिख रहे थे, क्योंकि तब तक तो सीएजी की रिपोर्ट भी नहीं आई थी। तब हमने पत्रकार गोपीकृष्णन को बुलाया और इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने हमें साक्ष्य दिए। इसी तरह सीएजी की रिपोर्ट में कुछ लोगों के नाम आए तो उन्हें भी बुलाया गया। इसके बाद ‘आउटलुक’ और ‘ओपन’ पत्रिका ने कुछ टेप्स छापे थे तो उन्हें भी बुलाया। टाटा का भी नाम आया। कहा गया कि इससे वे भी लाभान्वित हुए हैं तो उन्हें भी बुलाया। कुल मिलाकर यहा है कि जो बातें सामने आईं उसके सत्यापन के लिए संबंधित सभी लोग बुलाए गए।&lt;br /&gt;इसके बाद तय किया गया कि संबंधित विशेष अधिकारियों यानी प्रधानमंत्री के सचिव,  केंद्रीय सचिव, विधि सचिव और तत्कालीन सॉलिसिटर जनरल को बुलाकर बातचीत का दौर खत्म हो और रिपोर्ट को 30 तारीख तक पूरा किया जाए। यह फैसला 4 अप्रैल को समिति की बैठक में लिया गया, क्योंकि दूसरी तरफ से रिपोर्ट को जल्दी पूरा करने के लिए लगातार पत्र आ रहे थे।  लेकिन, 15 अप्रैल को लोगों के रुख बदले हुए थे। नजारा था कि ‘बदले-बदले से मेरे सरकार नजर आते हैं।’ दोपहर दो बजे तक वही सवाल जेपीसी, पीएसी, सब-ज्यूडिस। लोकसभा अध्यक्ष ने पत्र लिख दिया था कि आप अपना काम करें। वे अपना काम करेंगे। मैंने उन्हें बता दिया कि हम कहां तक पहुंच गए हैं। जेपीसी तब शुरू भी नहीं हुई थी। उनकी पहली बैठक 18 मई को होने वाली है, जबकि 30 अप्रैल को हमारा कार्यकाल खत्म हो रहा था। वैसे भी हम एक दूसरे के काम को कहीं भी आच्छादित नहीं कर रहे थे। दोनों की जांच का दायरा भी अलग-अलग है। हम जांच कर रहे थे- रीसेंट डवलपमेंट इन टेलीकॉम सेक्टर इनक्यूडिंग ए लोकेशन ऑफ स्पेक्ट्रम 2-जी एण्ड 3-जी सेक्टर। जबकि वे जांच कर रहे हैं- 1998 से लेकर 2009 तक की बनी नीतियों की। इसके बावजूद विरोध जारी रहा। दोपहर तक विरोध जारी रहा। अंततः आम राय पर बुलाए गए अधिकारियों से दोपहर बाद बातचीत शुरू हुई। लेकिन पहली बार लोगों को यह कहते देखा-सुना गया कि- कोई सवाल न पूछा जाए। न ही कोई जवाब दिया जाए। इस हंगामे के बीच विधि सचिव से बात पूरी हुई। इसके बाद प्रस्ताव आया कि अगली पूछताछ तबतक न की जाए, जबतक उनके कुछ प्रश्नों का उत्तर न दे दिया जाए। हमने कहा कि ठीक है, कल बैठते हैं। पर, 21 अप्रैल को बैठक तय हुई। उस दिन भी वही हंगामा खड़ा कर दिया गया। कोई परिणाम नहीं निकला। आखिरकार 28 तारीख को पुनः बैठक तय हुई। समिति का पहले से ही फैसला था कि रिपोर्ट 30 अप्रैल, 2011 तक सौंपनी है। इसे ध्यान में रखते हुए ही लंबित मामलों की संस्तुति के लिए 26 तारीख को ही रिपोर्ट की कॉपियां सदस्यों को दी गईं ताकि संशोधन व सुझाव के साथ वे अपनी संस्तुति दे सकें। पर, 27 तारीख को पूरी की पूरी रिपोर्ट बाहर आ गई। इसके बाद कांग्रेसी सदस्यों ने एक प्रेसवार्ता भी कर दी, जिसमें कहा गया कि रिपोर्ट बाहर से लिखवाई गई है और यह डॉ. जोशी की रिपोर्ट है। साथ ही यह भी कहा गया कि रिपोर्ट को खारिज करो, इसमें हमारे प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री का नाम इंगित किया गया। हम इसे कैसे मान सकते हैं। उसी दिन पवन बंसल जी और नारायण स्वामी जी रेवती रमणजी के घर गए। टेलीविजन में उनका आवागमन व रेवती रमणजी का वक्तव्य दिखाया गया है। उन्होंने कहा कि आप जोशी जी के साथ क्यों हैं। आप हमारे साथ आइए। अरे, यहां जोशीजी कौन हैं? मैं कोई पक्षकार हूं क्या?  यह रिपोर्ट तो लोकसभा सचिवालय की है, वहां तैयार हुई है। इसे मैंने नहीं लिखा है।&lt;br /&gt;इसके बाद मेरी समझ में आया कि वे हंगामा आगे भी करेंगे। नियम यह है कि पीएसी की रिपोर्ट में कोई विमति नहीं होती है। विमति की टिप्पणी की इजाजत नहीं है। रिपोर्ट जब सभी सदस्यों के पास पहुंच जाती है तो उसके एक-एक पैरे पर विचार होता है। उसके बाद यदि कहीं कोई संशोधन करना है तो वह प्रस्तुत किया जाता है। फिर आम राय से उसे स्वीकार किया जाता है। अन्यथा नहीं। शब्द यह है कि ‘रिपोर्ट इज एडॉप्टेड वीद और वीदाउट अमेंडमेंट्स’। वहां कुछ लोगों ने गलतियां बताई, हमने उसे स्वीकार किया। कुछ लोगों ने संशोधन की बात की, वह भी हुआ। लेकिन, कई सदस्य बहस करने को तैयार नहीं थे। आते ही रिपोर्ट खारिज करने के नारे लगाने लगे। ठीक वैसे ही जैसे जंतर-मंतर के चलने वाला जुलूस किसी बिल के पास करने या न करने के नारे लगाते हुए संसद पहुंच जाता है। ठीक वही स्थिति थी। दूसरी तरफ नीचे कांग्रेस संसदीय पार्टी के दफ्तर में चार मंत्री बैठे हुए थे, जिनमें चिदंबरम जी,  कपिल सिब्बल जी,  पवन बंसल जी और नारायण स्वामी जी। वे लोग वहां से अपने लोगों को दिशा-निर्देश दे रहे थे। जैसे ये लोग कठपुतलियां हों। ये परिस्थिति थी, बोलने नहीं दिया जा रहा था। अंततोगत्वा जो संशोधन आए, उसे हमने स्वीकार कर लिया और बैठक को समाप्त कर दिया। इसके बाद जो नाटक हुआ, वह सभी को मालूम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल - रिपोर्ट एडॉप्ट (स्वीकृत) हुई या नहीं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब - रिपोर्ट एडॉप्टेड ही है, क्योंकि सदस्यों के बीच रिपोर्ट बांटे जाने के बाद जिन्हें सुझाव देना था, उन्होंने दिया। जिन्हें नहीं देना था, उन्होंने नहीं दिया। उसे बाद सीएजी ने बैठक बुलाई और हमने उसमें रिपोर्ट पेश कर दिया। यही अंतिम चरण होता है। हमने रिपोर्ट ही पेश किया है। कोई रद्दी के कागज नहीं दिए गए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- क्या आपकी अध्यक्षता वाली पीएसी ने 2-जी के अलावा भी कोई जांच की है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- हमने 2-जी और 3-जी की जांच की है। हमारा यही विषय था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल- इसके अलावा कोई और रिपोर्ट आई है?&lt;br /&gt;जवाब - पहले आई हो तो आई हो, मुझे मालूम नहीं है। हां, इसके अतिरिकत हमने अन्य मामलों में रिपोर्ट सौंपी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल - वह कौन सी है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब - एक तो ‘राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन’ को लेकर है। दूसरी ‘त्वरित सिंचाई लाभकारी योजना’ ये दो बड़ी रिपोर्ट सौंपी हैं। इसके अलावा उप-समिति की भी कई रिपोर्टें हैं। करीब 10-11 रिपोर्ट सौंपी गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल - कांग्रेस और द्रमुक के सदस्यों को किन सिफारिशों पर एतराज था?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब - वह यह था कि हमने प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री और ए.राजा का नाम रिपोर्ट में क्यों शामिल किया है। हालांकि, हमने वही नाम रिपोर्ट में शामिल किए जो साक्ष्य से सामने आए और जिनका जिक्र फाइलों में था। इसके अतिरिक्त रिपोर्ट में कुछ भी नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल - समिति की सिफारिशों में एक जगह मांग की गई है कि इस रहस्य की जांच की जाए कि वित्त मंत्रालय दोषी है या दूर संचार विभाग?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब- यहां दोनों की अलग-अलग भूमिका है। दूर-संचार मंत्रालय में जो गड़बड़ियां हुईं और उसमें दूर-संचार मंत्री को जो भूमिका रही यह एक अलग प्रश्न हैं। इसमें वित्त मंत्रालय की भूमिका दूसरा प्रश्न है। प्रश्न ऐसा है कि अक्टूबर, 2003 में एक मंत्रि-परिषद का फैसला आया था,  उसमें तय किया गया था कि स्पेक्ट्रम की कीमत का निर्धारण दूर-संचार और वित्त मंत्रालय मिलकर करेंगे। यहां परामर्श से नहीं है,  बल्कि साथ-साथ तय करने की बात कहीं गई थी। वित्त मंत्रालय को इस नियम का पालन करना था। यह उसका अधिकार था। पर मंत्रालय ने एक सीमा के बाद अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया।&lt;br /&gt;वहीं दूर-संचार मंत्रालय को मिलकर मूल्य का निर्धारण करना था। मंत्रालय ने इससे बचने की कोशिश की। गलत सलाहें प्रधानमंत्री को दी। साथ ही जो नोटिंग्स आईं, उसमें वह हिस्सा जो इस घोटाले में बाधक हो सकता था, उसे मंत्री ने अपने हाथ से काटकर हटा दिया। वित्त सचिवालय के सलाहकार की तरफ से जो बाते कहीं गई, उसे नजरअंदाज कर दिया। इतना ही नहीं,  लेटर ऑफ इनटेंट (एलओआई)  देने में जो तरीका अपनाया गया उससे साफ है कि कुछ कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए पक्षपात पूर्ण रवैया अपनाया गया। कंपनियों के नाम के साथ जब 9 जनवरी, 2008 को इकनॉमिक टाइम्स में खबर आई कि अगले दिन निम्न 10 कंपनियों को एलओआई दिए जाएंगे और निम्न 10 को नहीं, तो लोगों का ध्यान इस तरफ गया। अगले दिन यानी 10 जनवरी को वही हुआ। तब भी वित्त मंत्रालय ने कोई सवाल नहीं किए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल- इसमें क्या पी. चिंदबरम भी उतने ही गुनहगार हैं जितने ए. राजा?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब - मैंने कहा कि उनका यह धर्म था कि वे इस सरकारी खजाने की लूट को रोकते, लेकिन उन्होंने यह नहीं किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल - अपने रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि उन्होंने प्रधानमंत्री को सलाह दी थी कि बजाय इसकी जांच के मामले को बंद किया जाए।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब - उन्होंने कहा कि जो हो गया, सो हो गया अब मामले को बंद समझा जाए। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री को लेकर भी हमने कहा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय को इन बातों की जानकारी थी। सभी काम उनकी जानकारी में हो रहे थे। और वे ए.राजा के पत्र लिख रहे थे कि यह सब क्या हो रहा है। मेरे पास शिकायतें आ रही हैं। इसे देखा जाएं। वहीं ए.राजा ने जवाब दे दिया कि यहां सब ठीक है। कोई गड़बड़ी नहीं है। पूरी ईमानदारी व नीतियों के अनुरूप काम हो रहा है।&lt;br /&gt;यहां हमारा प्रश्न यह है कि कैबिनेट सचिव और प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव इस मामले में क्यों चुप बैठे रहे,  आखिर कैबिनेट के फैसले का क्रियान्वयन करवाना किसकी जिम्मेदारी है?  क्या कैबिनेट सचिव की यह जिम्मेदारी नहीं है, प्रधानमंत्री कार्यालय की नही हैं? &lt;br /&gt;रिपोर्ट में यह भी इंगित किया है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि एक सचिव कहता है कि गलत हो रहा है, पर वह मंत्री के आगे झुक जाता है।  क्या वह अच्छे पद के लोभ में एसा करता है?  हमने कहा कि यदि किसी सचिव को पता चलता है कि गलत हो रहा है या मंत्रिपरिषद के फैसले के विरुद्ध हो रहा है तो ऐसी व्यवस्था हो या फिर उसे इजाजत होनी चाहिए कि इसकी जानकारी कैबिनेट सचिव और प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंचा सके। जिससे देश के साथ होने वाले इन अपराधों को रोका जा सके। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है और परिणाम यह है कि घोटाले पर घोटाले हो रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल - इससे सवाल निकलता है कि कहीं प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और राजा लाचार दिख रहे हैं यानी उनपर कहीं बाहर से दबाव पड़ रहा है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब - निष्कर्ष निकालने के लिए लोग स्वतंत्र हैं। हां, जो तथ्य आए हैं, उसे हमने सामने रख दिया है। इसलिए हमने कहा है कि इसका उत्तर राष्ट्र चाहता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय, वित्त मंत्रालय,  कैबिनेट सचिवालय से ऐसा क्यों हुआ?  इसका स्पष्टीकरण उन्हें संसद को देना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल - आपने रिपोर्ट में टिप्पणी की है कि मंत्रालयों और विभागों के काम-काज में गंभीर प्रणाली गत कमियां आ गई हैं और इसकी जड़ें काफी गहरी हैं। थोड़ा इसे समझाएं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब - प्रणाली में यह व्यवस्था स्पष्ट होनी चाहिए कि सरकार के जो फैसले हैं उसके ठीक तरीके से क्रियान्वयन की जिम्मेदारी किसकी है। कैबिनेट का जो सचिव है वह पूरी कैबिने का सचिव है। वह प्रधानमंत्री का सचिव नहीं है तो उसका यह धर्म है कि वह इस बात पर पैनी निगाह रखे कि कैबिनेट के जो फैसले हैं उसका ठीक तरीके से क्रियान्वयन हो रहा है या नहीं। अगर नहीं उसमें कहीं भटकाव या विचलन हो रहा है तो वह उसे तत्काल ठीक करे। लेकिन, आज प्रणाली में जो व्यवस्थाएं है यानी संसदीय कार्यों के क्रियान्वयन के नियम हैं उसमें यह व्यवस्था स्पष्ट नहीं है। वह कह देता है कि मेरी जिम्मेदारी नहीं है, हमने कैबिनेट का फैसला उक्त मंत्रालयों को भेज दिया है और आशा करते हैं कि वह इसका पालन करेंगे। यदि कोई बदलाव चाहता है तो इसकी सूचना देगा। हमारी राय में यह ठीक नहीं है, क्योंकि  यदि कोई मंत्रालय कैबिनेट के फैसले को बदल रहा है या उसकी गलत व्याख्या कर रहा है तो इस पर रोक लगने की कोई व्यवस्था नहीं है। &lt;br /&gt;इसी तरह यह प्रधानमंत्री कार्यालय की भी जिम्मेदारी हैं, क्योंकि कैबिनेट के अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं। कार्यालय उन्हें बताए कि यह फैसला है और ऐसा हो रहा है। यहां तो सभी एक दूसरे पर ही जिम्मेदारी थोपते नजर आते हैं। यह ठीक नहीं है। एक और बात, यह नियम है कि कोई मंत्री बगैर विधि मंत्री की इजाजत के किसी विधि अधिकारी को सलाह लेने के लिए नहीं बुला सकता है। अब इस पर कौन नियंत्रण रखेगा। यहां विधि मंत्री लिख रहे हैं कि यह मामला मंत्रियों के समूह को जाना चाहिए, वहीं विधि अधिकारी कुछ और ही बात कह रहा है। तो ये खामियां हैं। इतना ही नहीं, यदि नीचे से कोई फाइल टिप्पणियों के साथ आ रही है तो उस टिप्पणी को ही बदल दिया गया। अब यह कौन देखेगा, सीवीसी, सीबीआई निदेशक, सीएजी की नियुक्ति कैसे होगी? हाल ही में हम लोगों ने सीवीसी की नियुक्ति का मामला देखा। सीबीआई भी साल भर तक इस मामले को दबाए रखी। हमने इस बारे में उनसे पूछा कि क्या आप पर कोई दबाव था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल - रिपोर्ट में आपने वित मंत्री के 15 जनवरी, 2008 के नोट का जिक्र किया है और कहा है कि उन्होंने प्रधानमंत्री जी को लिखा है कि हालांकि नुकसान हुआ है पर अब इस मामले को समाप्त समझा जाना चाहिए। क्या आपका इशारा पी. चिदंबरम की तरफ है? अगर है तो ऐसा क्यों कह रहे हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब - हम नहीं जानते। हमने तो उनसे कहा कि इसकी व्याख्या की जाए, कि ऐसा क्यों हुआ। वे स्पष्टीकरण दें। संसद चाहती है कि वे सच बताएं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सवाल - अपने सिफारिश की है कि इसकी व्यापक जांच होनी चाहिए। क्या आपको उम्मीद है कि जांच होगी?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जवाब - संसदीय समिति की रिपोर्ट पर सरकार को कार्यवाही करनी पड़ती है। यह उसके धर्म है कि रिपोर्ट को गंभीरता से लें और इस पर अपना गंतव्य दें। यदि वह जांच नहीं करना चाहती है तो यह भी बताए कि इसके क्या कारण हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल - आपने रिपोर्ट में अपनी-अपनी सिफारिश में लिखा है कि प्रधानमंत्री की यह इच्छा कि पीएमओ इस मामले से दूरी बनाए रखे, संचार मंत्री को अनुचित व मनमानी तरीके से काम करने में अप्रत्यक्ष तरीके से योगदान दिया।&lt;br /&gt;जवाब - उन्होंने लिखा है कि घोटाला हो गया, अब पीएमओ उससे दूर रहे। इसका क्या मतलब है? जो होगा सो गया। अब उसे बंद डब्बे में डाल दो। इसलिए हमने पूछा है कि देश को बताया जाए कि ऐसा क्यों हुआ और किन वजहों से ये बाते कहीं गईं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल - अपनी जांच में जब आपने यह कहा तो प्रधानमंत्री की जो इमेज है और जो वास्तविकता है उसमें फर्क दिखता है।&lt;br /&gt;जवाब - देखिए, किस मंत्री की या प्रधानमंत्री की क्या इमेज है इसमें हमें मतलब नहीं है। यह अलग मसला है। हमारा ध्यान केवल तथ्य की तरफ रहा है और वह यही है। हम न तो किसी की इमेज हैं और न बिगाड़ते हैं। हां, जो तथ्य है उसे संसद के सामने रख देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल - आपकी रिपोर्ट में प्रधानमंत्री कार्यालय और प्रधानमंत्री में असामंजस्य का संकेत मिलता है। क्या इस कारण भी सरकारी खजाने को बहुत नुकसान हुआ?&lt;br /&gt;जवाब - यह भी हमने जानना चाहा है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? कोई तो अपनी जिम्मेदारी ले। और सरकार किसी इसका जिम्मेदार मानती है यह तो बताए। &lt;br /&gt;दखिए, हम अदालत नहीं है। हम संसदीय समिति हैं? हमारा काम तथ्यों को संसद के सामने रखना है। और उन तथ्यों के आधार पर सरकार को आगे क्या कार्यवाही करनी है, इसका सुझाव देना है। कार्यवाही करना या न करना यह सरकार की जिम्मेदारी है। अगर कार्यवाही की गई तो उसके बारे में बताएगी। यदि नहीं की गई तो इसके कारण बताएगी। पीएसी की रिपोर्ट का इसी प्रकार से निस्तारण होता है। सरकार को एक एक्शन टेकन रिपोर्ट देनी होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल - समिति ने सीबीआई के लिए अलग अधिनियम बनाने और उसे ज्यादा समर्थ बनाने के सुझाव दिए हैं। क्या सीबीआई को सरकार अधिक समर्थ बनाना चाहती है?&lt;br /&gt;जवाब - यह मैं कैसे बता सकता हूं। यह तो सरकार ही बताएगी। अगर नहीं बनाना चाहती है तो वह एक नया संदेह पैदा करेगी। एक तरफ हम पारदर्शिता की बात करते हैं। प्रधानमंत्री जी कहते हैं कि जनता की राय बदल रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ वे जल्दी कार्रवाई चाहते हैं। अगर वे सचमुच जल्दी कार्रवाई चाहते हैं तो कार्रवाई करने वाली जो एजेंसी है उसे अधिकार दिया जाए। साधन दिए जाएं। अभी वहां तो हजार-डेढ़ हजार जगहें खाली हैं। साथ ही उसे जिम्मेदार बनाया जाए। साथ ही वह प्रत्येक छह महीने पर अपनी रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत करे। साथ ही सीबीआई निदेशक को नियुक्ति प्रधानमंत्री, उच्चतम न्यायालय के एक न्यायाधीश, गृहमंत्री और नेता प्रतिपक्ष की समिति करे। इससे पारदर्शिता आ जाएगी। सीएजी की नियुक्ति में गृहमंत्री की जगह वित्त मंत्री को रखा जाए। यदि सरकार कोई और  फार्मूला लाना चाहती है तो वह बताए। लेकिन इच्छा और नाराजगी पर ये नियुक्तियां नहीं होनी चाहिए। पुरस्कार देने या दंडित करने के लिए भी नहीं होना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल - सीवीआई की जो इस मामले में जांच चल रही है। क्या आप उससे संतुष्ट हैं?&lt;br /&gt;जवाब - अब जो जांच चल रही है, वह ठीक दिशा में जा रहे हैं। उनकी अपनी एक सीमा है पर उच्चतम न्यायालय की निगरानी में काम कर रहे हैं तो ज्यादा गड़बड़ी नहीं हो सकती है। हमारे सामने भी उन्होंने जो तथ्य रखे हैं वह निः संकोच हमें दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल  - कांग्रेस इस रिपोर्ट को सिर्फ मसौदा बता रही है। आपका क्या मत है?&lt;br /&gt;जवाब - यह रिपोर्ट है। नियमों के अनुसार हमने पेश किया है। और अगर मसौदा भी था तो उसपर बहस तो करनी चाहिए थीं दरअसल, वे कहते हैं कि यह रिपोर्ट हमने रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। पवन बंसल का यह बयान है। यह बेहद खतरनाक बयान है। &lt;br /&gt;देखिए, हमारा काम यह देखना है कि आज आम आदमी के टैक्स सरकारी कोष में आई जो धनराशि है, उसका सदुपयोग संसद की इच्छा और अनुमोदन के अनुरूप हो रहा है या नहीं। साथ ही इस बात पर भी नजर रखना है कि इसका लाभ आम आदमी को मिल रहा है या नहीं। हमने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में देखा कि लाखों रुपए की वैसी दवाइंया जिनकी तिथि समाप्त हो गई है, वह रखी हुई है। इमारतें बनी हैं तो उसमें गोबर भरा हुआ है। डाक्टर नहीं है। तो सवाल पूछने का हक है। संसद सदस्य होने के नाते हमारा कर्तव्य है कि हम अपने मतदाताओं के हितों का ध्यान रखें। साथ ही पीएसी के अध्यक्ष होने के नाते भी दायित्व है कि इसे देखें। अब अगर इस जांच को रोका जाता है तो यह धनाडयों के पक्ष में और गरीब आदमी के विरोध में लिया गया फैसला होगा। यहा उसके अधिकार पर डाका डाला जा रहा है। हम कहते हैं कि घोटाले न होते तो यह रुपए गांव के विकास के लिए मिलते। आप कहते हैं कि इसकी जांच बंद करो जो लूट गए, सो लूट गए। यानी गरीब की लूट और धनपति की छूट। यह काम हम नहीं होने देंगे। इसलिए जब वे कहते हैं कि हमने रिपोर्ट कचरे के डब्बे में डाल दी, तो पहली बात यह कि वे आम आदमी के पेट पर डाका डाल रहे हैं, उनके स्वास्थ्य, पढ़ाई-लिखाई और रोजगार पर डाका डाल रहे हैं।&lt;br /&gt;इसका दूसरा पक्ष यह है कि आज वे इस संसदीय रिपोर्ट को कचरे के डिब्बे में डाल रहे हैं। कल वे संसद के किसी अधिनियम को कचरे के डिब्बे में डाल देंगे। फिर वे उच्चतम न्यायालय के किसी निर्णय को कचरे में फेंक देंगे। जैसा कि वे एक बार कर चुके हैं। प्रधानमंत्री के हम में उच्चतम न्यायालन ने फैसला नहीं दिया तो आपातकाल लगा दिया। संविधान तोड़ दिया। तो क्या आप उसी तरफ फिर बढ़ रहे हैं, लेकिन अब हम ऐसा नहीं होने देंगे। हम जनता को बताएंगे कि देखो क्या हो रहा है। इसमें ये घबड़ाए हुए हैं, क्योंकि उनके असली इरादे इससे साफ हो रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल - जिन लोगों ने हंगामा कर समिति का अपमान किया है, क्या आप उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन की सूचना देंगे? क्योंकि यह समिति संसद का प्रतिनिधित्व कर रही थी, और इसका अपमान संसद का अपमान है?&lt;br /&gt;जवाब - यह प्रश्न हमारे सामने आया है। इस पर मैं संविधान विशेषज्ञों से सलाह ले रहा हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल - इस रिपोर्ट से जैसा विवाद खड़ा हुआ है उससे क्या समिति में दलगत विभाजन का खतरा पैदा हो गया है?&lt;br /&gt;जवाब - यह तो कांग्रेस ने किया है और यह अनुचित है। दरअसल, प्रत्येक समिति में सत्तापक्ष का बहुमत होता है। इसका मतलब यह कि हर संसदीय समिति उसक अंगूठे के नीचे चले। हम ऐसा नहीं होने देंगे। और यदि यही इच्छा है तो सभी संसदीय समितियां बंद कर दें। और सरकार चलाएं। यह तो सत्तापक्ष को तय करना होगा कि लोकतंत्र चले या नहीं। संसदीय समितियां अपना काम करें या नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल - यह रिपोर्ट लोक लेखा समिति की परंपरागत रिपोर्ट से कई मायने में भिन्न दिखती है। जैसे कि इस रिपोर्ट में अखबारों में छपे लेखों और राडिया के टेप पर दो अध्याय हैं। ऐसा पहले नहीं होता रहा है, तो क्या यह जरूरी था ?&lt;br /&gt;जवाब - यह जरूरी इसलिए था कि एक पत्रकार ने इस मामले को सबसे पहले उजागर किया। और तब सीएजी की रिपोर्ट नहीं थी। ऐसे में वह सबसे प्रमुख आधार है। यदि उससे बात न होती तो कैसे मालूम होता कि एलओआई को लेकर जो प्रक्रिया अपनाई गई इसकी सूचना उसे कैसे मिली। साथ ही जिन लोगों ने टेप्स को छापा उसमें कई महत्वपूर्ण बातें थी। एक यह भी था कि टाटा ने ए. राजा की तारीफ में करुणानिधि को पत्र लिखे। यदि उन्हें राजा की तारीफ में पत्र लिखना था तो वे प्रधानमंत्री को लिखते, आखिर वे प्रधानमंत्री के मंत्री थे। उसमें 600 करोड़ रुपए के रिश्वत की बात का जिक्र है जो करुणानिधि की पत्नी को दिया गया था। तो इन सब बातों को जानना बेहद जरूरी था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल - 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले से हुए नुकसान के जो-जो अनुमान है उसका विवरण रिपोर्ट में हैं। पर समिति का अनुमान नहीं है। आखिर वह क्या है?&lt;br /&gt;जबाव - पीएसी के पास ऐसी कोई विशेषज्ञों की टीम नहीं है। जो घाटे का अनुमान लगा पाए। यह काम है टीआरएआई (टेलीकॉम रेगुलेट्री अथॉरिटी) का। उसने एक रिपोर्ट दी है उसके आधार पर वित्त मंत्रालय घाटे का अनुमान निकाल सकता है। हालांकि वित्त मंत्रालय से हमने पूछा तो उसने कहा कि वह नुकसान का हिसाब नहीं लगा सकता है। मेरा कहना है कि यदि वे नहीं निकाल सकते तो कौन निकालेगा। आप सारे देश का नफा-नुकसान निकालते हैं, लेकिन इसका नहीं निकाल सकते। इससे संदेह गहराता है, कि वे क्यों नहीं निकालना चाहते। हमने कहा कि वे टीआरएआई को माध्यम से गणना करे और बताए।&lt;br /&gt;सवाल- रिपोर्ट में अरुण शौरी के एक पत्र और भंडाफोड की बात कही गई है। वह क्या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल - अरुण शौरी जिस भंडाफोड की बात कर रहे हैं वह क्या है?&lt;br /&gt;जवाब - हमें क्या पता। अखबारों में यह आया था कि अरुण शौरी ने सीबीआई को एक पत्र लिखा है। हमने सीबीआई से इस बारे में पूछा तो उन्होनंे कहा कि हमारे पास कोई पत्र नहीं है। तो वहीं बात खत्म हो गई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल - रिपोर्ट में शासन प्रणाली में गहरे दोष पैदा होने के संकेत दिए हैं, क्या वह संसदीय प्रणाली के संकट के दोतक है?&lt;br /&gt;जवाब - मैं पहले ही कह चुका हूं कि ज्यादातर दोष प्रणालीगत है। अगर सरकार पारदर्शिता चाहती है और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन चाहती है तो उसे सुधार करने होंगे। हमारे जांच के दायरे में यह नहीं है कि संसदीय प्रणाली ठीक है या नहीं, बल्कि जांकर जो सीमित विषय रहा है उसमें जो गड़बड़ियां आई है, उसका उल्लेख किया है। नीतियों पर विचार करना पीएसी के अधिकार क्षेत्र में नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल- रिपोर्ट से एक बात और निकलकर आ रही है। वह यह है कि प्रधानमंत्री नाम की जो संस्था है वह आज कमजोर दिख रही है। इस पर आपकी क्या राय है?&lt;br /&gt;जवाब - यह कमजोर है या ताकतवर है। इसका विश्लेषण हम नहीं कर रहे हैं। दरअसल, जो प्रणाली है और उसमें जो स्थिति है, यहां हम केवल उसकी बात कर रहे हैं। कमजोर और ताकतवर होने का विश्लेषण तो संसद और जनता करेगी। यहां तो हम अपना काम कर रहे थे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-8429213092036565056?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/8429213092036565056/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=8429213092036565056' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/8429213092036565056'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/8429213092036565056'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/06/blog-post_12.html' title='पीएसी अध्यक्ष मुरलीमनोहर जोशी से 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href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=7274397820941272338' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/7274397820941272338'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/7274397820941272338'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/06/blog-post_09.html' title='नहीं रहा चित्रकार'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-gkCjbHCtIaw/TfB1Y3CEVwI/AAAAAAAAAUM/WXJuzU2FnGs/s72-c/husain%2Bin%2Bdubai.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-365401652544009637</id><published>2011-06-01T05:34:00.001-07:00</published><updated>2011-06-01T05:34:49.396-07:00</updated><title type='text'>तीसरे प्रेस आयोग पर बहस शुरू</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-1GyxDmJj03A/TeYx4FfpVFI/AAAAAAAAAUA/B4J3eNay5ho/s1600/press.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 238px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-1GyxDmJj03A/TeYx4FfpVFI/AAAAAAAAAUA/B4J3eNay5ho/s320/press.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5613228825181246546" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;“आज हम तीसरे प्रेस आयोग की बात इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि स्वतंत्र होकर काम करना चाहते हैं। स्वच्छंद हो कर नहीं।”&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt; दिल्ली स्थित प्रज्ञा संस्थान में तीसरे प्रेस आयोग के गठन की मांग को लेकर चर्चा के दौरान वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने यह बात कही। तब वे एक युवा पत्रकार के सवालों का जवाब दे रहे थे। दरअसल, ऐसा कम देखने में आता है कि किसी बड़ी योजना को लेकर गंभीर विचार मंथन चल रहा हो और उक्त क्षेत्र के नए लोग भी वहां मौजूद हों। पर 29 मई, 2011 को प्रज्ञा संस्थान के सभागार में ऐसा ही मंजर था। यहां वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी विविध प्रसंगों का हवाला देते हुए उस वस्तुस्थिति को सामने रख रहे थे, जिससे साफ हो चला था कि तीसरे प्रेस आयोग का गठन समय की जरूर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताज्जुब की बात है कि इस गंभीर चर्चा में जितनी संख्या वरिष्ठ पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की थी, उतनी ही संख्या में युवा पत्रकार मौजूद थे। और वे यहां मूक दर्शक या श्रोता मात्र नहीं थे, बल्कि अवसर मिला तो खुलकर हस्तक्षेप भी किया। इससे पहले हमने सराय/सीएसडीएस में भी यह आलम देखा है। वहां रविकांत जैसे लोग भी ऐसा ही हदतोड़ रवैया अख्तियार करते रहे हैं। दरअसल, इन संस्थाओं का यही रिवाज है। युवाओं में इनकी पहचान यूं ही नहीं है। यहां सभी बराबर महत्व पाते हैं। तभी तो युवा विद्रोही टोली स्वतंत्र होकर काम करती हुई इन संस्थाओं में अकसर दिख जाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, प्रज्ञा संस्थान और प्रभाष परंपरा न्यास के तत्वावधान में आयोजित यह तीसरी विचार गोष्ठी थी। इस बार तीसरे प्रेस आयोग के औचित्य पर विचार किया जा रहा था। रामशरण जोशी अपना बीज वक्तव्य दे रहे थे। इस दौरान उन्होंने कहा कि आज प्रेस व मीडिया यानी अखबार, पत्रिका आदि प्रॉडक्ट में रूपांतरित हो चुके हैं। इसमें मटमैली पूंजी का प्रवेश बड़े स्तर पर हो गया है। संपादक नाम की संस्था पर परोक्ष रूप से नियंत्रण रखा जा रहा है। ब्रांड मैनेजर का उदय हो गया है। हालांकि, कई पत्रकारों को ऊंची पगार मिलती है, पर नौकरी की अनिश्चितता बनी रहती है। कुल मिलाकर स्थितियां बिलकुल बदल चुकी हैं। पहले और दूसरे प्रेस आयोग की सिफारिशें अब प्रासंगित नहीं हैं सो तीसरे प्रेस आयोग का गठन समय की जरूर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने कहा कि अखबारी संस्करणों के इस दौर में समाचारों व मुद्दों का अति स्थानीयकरण एक रणनीति के तहत किया जा रहा है। यह उचित नहीं है। भारतीय समाचार एजेंसियों का अवसान हो चुका है। अपने लंबे वक्तव्य में जोशी ने 19 ऐसे प्रस्ताव सुझाए जिसपर तीसरे प्रेस आयोग द्वारा विचार करने की जरूर है। पहली बात उन्होंने यह कही कि प्रेस परिषद को वैधानिक दृष्टि से शक्ति सम्पन्न बनाया जाए। फिलहाल वह एक ऐसा सांप है, जिससे पास दांत ही नहीं है। दूसरी बात यह कि एक मीडिया समूह को एक ही माध्यम रखने की इजाजत मिले। वह प्रिंट हो सकता है या फिर इलेक्ट्रॉनिक। उन्होंने बोर्ड ऑफ ट्रस्टी के गठन की बात भी उठाई, जो प्रबंधन और संपादक के बीच महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा ताकि संपादकीय अधिकार की रक्षा हो सके। इतना ही नहीं अखबारों के संस्करणों की संख्या निश्चित करना, भाषाई समाचार एजेंसियों की स्थापना, लघु समाचर पत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करना, प्रेस विकास आयोग की स्थापना जैसे प्रस्ताव भी उन्होंने दिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब सुझाव का दौर आया तो रामबहादुर राय ने कहा कि प्रिंट मीडिया में विदेशी पूंजी के निवेश पर गहन अध्ययन होना चाहिए और फिर इसपर रोक लगनी चाहिए। साथ ही इस बात की पड़ताल होनी चाहिए कि किन परिस्थितियों में 25 जून, 2002 को वाजपेयी सरकार ने प्रिंट मीडिया में 26 प्रतिशत विदेशी पूंजी की इजाजत दी। और अब मनमोहन सरकार उसे 26 प्रतिशत को बढ़ाकर 49 प्रतिशत करने जा रही है। इतिहास बताते हुए राय ने कहा कि पहले प्रेस आयोग का गठन 1952 में हुआ था। 1955 में उसने अपनी सिफारिशें दीं। तब प्रिंट मीडिया में विदेशी पूंजी की इजाजत न देने की बात कही गई थी, जिसे नेहरू की सरकार ने माना था। तब विशेष कारणवश मात्र रिडर डाइजेस्ट को ही इसकी इजाजत मिली थी।&lt;br /&gt;गौरतलब है कि दूसरे प्रेस आयोग का गठन 1978 में किया गया था, जिसने अपनी रिपोर्ट 1982 में सौंपी। तब भी प्रिंट मीडिया में विदेशी पूंजी के निवेश की इजाजत नहीं थी। विचार गोष्ठी का संचालन करते हुए राय ने कहा, “आज पत्रकारिता के मुक्ति की बात हो रही है। और इसके लिए ही हम प्रेस आयोग की बात कर रहे हैं। इस विचार मंथन से जो प्रस्ताव तैयार होगा, उसके आलोक में संसद को ज्ञापन देंगे और तीसरे प्रेस आयोग के गठन की मांग करेंगे।” विचार गोष्ठी में वरिष्ठ पत्रकार व गांधीवादी विचारक देवदत्त, जवाहरलाल कौल और बी.बी.कुमार ने भी अपने सुझाव किए। पत्रकार अवधेश कुमार ने जहां वर्तमान पत्रकारिता पर घोर असंतोष व्यक्त किया,  वहीं प्रभाष परंपरा न्यास के ट्रस्टी एन.एन ओझा ने कहा कि कोई भी खबर बाजार से गुजरकर ही पाठक तक पहुंचता है। हमें इन बिंदुओं पर भी विचार करना होगा। इस दौरान कई युवा पत्रकारों ने भी अपने विचार व्यक्त किए। सोपान द स्टेप पत्रिका से जुड़े आशीष कुमार अंशु ने कहा कि उन पत्रकारों को भी अपनी संपत्ति सार्वजनिक करनी चाहिए जो पीआईबी से जुड़े हैं और सरकारी सुविधा का भोग करते हैं। वहीं प्रथम प्रवक्ता से जुड़ी श्रुति अवस्थी ने कहा कि आज वह युवा पत्रकार कहां जाए जो किसी बड़े पत्रकारों को देख उनसा बनना चाहता तो है पर संस्थान स्वतंत्र होकर काम करने की इजाजत नहीं देता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस घनघोर बहस के बाद प्रस्तावना को और स्पष्ट व नए बिंदुओं को जोड़ने की बात रामशरण जोशी ने कही। कहा गया कि इसका मुकम्मल रूप 12 जून की बैठक में रखा जाएगा। उसी दिन आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी पर उनके शिष्य विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा लिखी पुस्तक ‘व्योमकेश दरवेश’ पर चर्चा होगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-365401652544009637?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/365401652544009637/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=365401652544009637' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/365401652544009637'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/365401652544009637'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='तीसरे प्रेस आयोग पर बहस शुरू'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-1GyxDmJj03A/TeYx4FfpVFI/AAAAAAAAAUA/B4J3eNay5ho/s72-c/press.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-4006544534222543139</id><published>2011-05-05T04:55:00.000-07:00</published><updated>2011-05-05T04:57:38.487-07:00</updated><title type='text'>चलो मोमोज खाएं</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-e3rmEqJ7H6M/TcKQk1C7Z9I/AAAAAAAAATw/I_Tl07WDffs/s1600/momo1.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-e3rmEqJ7H6M/TcKQk1C7Z9I/AAAAAAAAATw/I_Tl07WDffs/s320/momo1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5603199848791369682" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;यूं तो दिल्ली गोल-गप्पा व चाट-भाजी के लिए मशहूर है। बाकी जो मशहूर हुआ वह तंदूर का पका होता है। पर, इन सब के बीच मोमोज ने कब और कैसे अपनी जगह बना ली ! इस बाबत कुछ भी कहना बड़ा कठिन है। हालांकि, यह तथ्य है कि दिल्ली शहर में मोमोज का फैलाव मॉनेस्ट्री मार्केट से ही हुआ। शहर का यह वही बाजार है जो महाराणा प्रताप अंतरराज्यीय बस अड्डे से थोड़ी दूर यमुना किनारे रिंग रोड पर स्थित है। कहते हैं कि यह बाजार प्रवासियों से ही आबाद हुआ है। तिब्बतियों के लिए तो यह बाजार व्यापार करने की जगह बनी। और इसके साथ-साथ मोमोज इस बाजार का हिस्सा बन गया। अब आलम देखिए दिल्ली के हर बाजार और नुक्कड़ों पर इसकी उपस्थिति दर्ज है, वह संभ्रांत लोगों का खान मार्केट हो या शहादरा का साप्ताहिक बाजार। हर जगह लोग मोमोज को सुर्ख मिर्चदार चटनी के साथ चटकारे लेकर खाते दिख जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोमोज अरुणाचल प्रदेश के तिब्बत से सटे कमेंग और तवंग जिलों की मोपां और शिरदुप्का जातियों को पसंदीदा व्यंजनों में शामिल है। वहां इसे डम्पलिंग के नाम से भी जाना जाता है। वैसे कुछ लोग इसे चाइनीज डिस का हिस्सा समझते हैं पर यह सही नहीं है। चानइनीज डिम-सम से यह काफी भिन्न है। वैसे भी चाइनीज मोमोज का जन्म शंघाई और बीजिंग में हुआ, जो हिन्दुस्तानी मोमोज के आकार-प्रकार से काफी अलग है। खैर, यह जानना बड़ा रोचक है कि उन ऊंची पहाड़ियों पर पसंद किया जाने वाला ठेठ देशी व्यंजन इन मैदानी इलाकों में कैसे फैल गया? जानकारों की माने तो रोजगार की तालाश में भटके लोगों के साथ ही मोमोज दिल्ली पहुंचा। दिल्ली के भटूरे-छोले और गोल-गप्पे से भरे फुड बाजार में सत्तर के दशक के बाद से मोमोज ने दस्तक दी थी। तिब्बतियों ने ही पहले-पहल मोमोज से हमारा परिचय करवाया। फिर चीनी फूड बनाने वाले खानसामों ने इसे तिब्बती घेरे से निकालकर गली-नुक्कड़ों तक पहुंचा दिया। दिल्ली हाट की शुरुआत के साथ ही नार्थ-ईस्टर्न फूड स्टॉलों की बदौलत मोमोज की लोकप्रियता बढ़ी।   दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैम्पस के छात्रों के बीच मोमोज का क्रेज बढ़ाने का श्रेय कमला नगर मार्केट की एक गली में खुले ‘मोमोज प्वाइंट’ को है।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कमला नगर मार्केट में ही मोमोज बेच रहा युवक नाम पूछने पर एकबारगी शर्मा जाता है। पर उसने बताया कि पहले मालवीय नगर स्थित एक रेस्ट्रॉ में काम करता था। लेकिन पिछले 17-18 महीने से यहां मोमोज बेच रहा है। उसकी माने तो नौकरी करने से ज्यादा फायदा अपना मोमोज बेचने में ही है। 26 वर्षीय यह युवक पूर्वोत्तर भारत का रहने वाला है। नोएडा के सेक्टर-2 में मोमोज बेचने वाले दार्जलिंग के एक युवक ने कुछ ऐसी ही बातें कहीं। कभी मजनूं का टिला और मोनेस्ट्री मार्केट में बिकने वाला मोमोज आज सुदूर दक्षिण दिल्ली में स्थित आईआईटी व जेएनयू के आसपास बड़े ठाट से बिक रहा है। इसने रेड़ी-पट्टी से उठकर मॉल में अपनी जगह पक्की कर ली है।  एक और बात है। अब जब पूर्वोत्तर या नेपाल से आए लोगों ने रसोईघरों तक अपनी पहुंच बना ली है तो वहां भी मोमोज आबाद है। यकीनन, इसने एक लंबा सफर तय कर लिया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-4006544534222543139?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/4006544534222543139/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=4006544534222543139' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/4006544534222543139'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/4006544534222543139'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='चलो मोमोज खाएं'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-e3rmEqJ7H6M/TcKQk1C7Z9I/AAAAAAAAATw/I_Tl07WDffs/s72-c/momo1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-7420630308780352496</id><published>2011-03-04T05:47:00.000-08:00</published><updated>2011-03-04T05:50:13.448-08:00</updated><title type='text'>आएगा... आने वाला</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-8e0rpGX_it0/TXDtte61F_I/AAAAAAAAATo/MxwE0dC8L4M/s1600/06.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 238px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-8e0rpGX_it0/TXDtte61F_I/AAAAAAAAATo/MxwE0dC8L4M/s320/06.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5580221303961753586" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;blockquote&gt;"इससे कहो चला जाय यहां से" यह कमजोर आवाज मशहूर अभिनेत्री मधुबाला की थी। 23 फरवरी, 1969 की रात वह अपने पति किशोर कुमार की बात पर नाराजगी जाहिर कर कह रही थीं। वह उनकी आखिरी रात थी।&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt; फिल्म निर्माता-निर्देशक ओ.पी.रल्हन ने अपने संस्मरण में इस घटना का जिक्र कुछ इस प्रकार किया है-" लंबी बीमारी ने शरीर को खोखला कर दिया था। एक रात उनकी चीखों ने सबको चौंका दिया। बहनें नीचे की मंजिल में रहती थीं। फौरन पहुंच गईं। जाकर देखा तो अब्बा-अम्मी सकते में थे। बेटी की पीड़ा सह नहीं पा रहे थे। डाक्टर बुलाया गया। पता चला हार्ट अटैक है। बचना मुश्किल है। पति किशोर कुमार को खबर दी, उन्हें सुबह शूटिंग पर बाहर जाना था। बार-बार कहने पर आए तो देखकर बोले- ठीक तो है, ऐसी हालत तो हजारों बार हुई है।" इसके बाद ही मधुबाला ने उक्त प्रतिक्रिया दी। मधुबाला के जीवन की वह आखिरी रात थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनारकली के रूप में इतिहास बन चुकी मधुबाला को इस दुनिया से रुख्सत हुए 41 साल हो गए हैं। पर, उनकी मुस्कुराहट आज भी सिने प्रेमियों के दिलों पर राज करती है। उनकी बेहतरीन अदाकारी और खूबसूरती की चर्चा अब भी होती है। यह संयोग ही था कि अनारकली के रूप में वह मशहूर तो खूब हुईं, पर फिल्म ‘मुगले आजम’ से मिली शोहरत का वह लुत्फ न उठा सकीं। लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। मधुबाला की बहन साजिदा मधुर ने अपने एक साक्षात्कार में इस पीड़ा को इस तरह जाहिर किया है, “ आज भी जब मुगले आजम देखती हूं वह पहले से ज्यादा नई और खूबसूरत लगती हैं। अफसोस यही है कि किसमत ने उन्हें सब कुछ दिया, बस लंबी उम्र नहीं दी।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहा जाता है कि जब फिल्म मुगले आजम की शूटिंग हो रही थी, तभी मधुबाला और दिलीप कुमार के बीच दूरी बन आई। हालांकि, तब भी दोनों एक दूसरे के दिलों में गहरे बसे हुए थे, पर झूठा अभिमान एक दीवार बनकर खड़ा हो गया था। वह कहानी कुछ इस प्रकार है- हुआ यूं कि बीआर. चोपड़ा ने अपनी नई फिल्म ‘नया दौर’ की आउटडोर शूटिंग को लेकर अनुबंध तोड़ने पर केस कर दिया। मधुबाला के पिता और बीआर.चोपड़ा के बीच लंबी अदालती लड़ाई चल पड़ी। इसी दौरान दिलीप कुमार भी बीआर.चोपड़ा के पक्ष में चले गए। गवाही देते समय उन्होंने मधुबाला के पिता अताउल्ला खां को बेटी की कमाई पर रहने वाला पिता कह डाला। इससे मधुबाला आहत हुईं और झटके में वर्षों पुराना संबंध तोड़ लिया। बाद में दिलीप कुमार कई बार मनाने आए, मगर मधुबाला ने बार-बार एक ही शर्त रखी- अब्बाजी से माफी मांगो। अंतत: दोनों एक दूसरे से दूर हो गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मधुबाला ने 1942 में इस दुनिया में कदम रखा था। पर 1949 में फिल्म ‘महल’ आई तो वह रहस्यमयी सुंदरी बनकर उभरीं। इस फिल्म में लता की आवाज में मधुबाला पर फिल्माया गया गीत सिने प्रेमियों पर नशे की तरह छा गया। लोग मधुबाला का अविश्वसनीय सौंदर्य और लता की आवाज सुनने के लिए ही ‘महल’ देखने जाते थे। उनकी अदाएं कौन भूल सकता है? देवानंद के साथ फिल्माया गया फिल्म ‘काला पानी’ का गीत ‘अच्छा जी मैं हारी चलो मान जाओ ना’ हिन्दी सिनेमा के बेहतरीन रोमांटिक गीतों में एक है। खैर, मधुबाला का असल नाम मुमताज था। फिल्म निर्माता-निर्देशक केदार शर्मा ने उनका नाम मधुबाल रखा था। अपनी छोटी उम्र में ही उन्होंने ऊंची शोहरत पाई, पर जो न मिला वह था ससुराल। किशोर कुमार से शादी के बाद वह महज तीन महीने ही ससुराल में रहीं। बाद में कार्टर रोड पर स्थित एक फ्लैट में रहने लगीं और पति की राह देखती रही।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-7420630308780352496?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/7420630308780352496/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=7420630308780352496' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/7420630308780352496'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/7420630308780352496'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='आएगा... आने वाला'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-8e0rpGX_it0/TXDtte61F_I/AAAAAAAAATo/MxwE0dC8L4M/s72-c/06.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-7886844115831863713</id><published>2011-02-18T00:53:00.000-08:00</published><updated>2011-02-18T00:59:57.896-08:00</updated><title type='text'>क्रिकेट का महाकुंभ शुरू</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-jFW0axvLx5g/TV40WGAqYnI/AAAAAAAAATg/KhHdVMUjTcs/s1600/clive-lloyd.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 230px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-jFW0axvLx5g/TV40WGAqYnI/AAAAAAAAATg/KhHdVMUjTcs/s320/clive-lloyd.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5574950942906409586" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पहले विश्व कप को थामे वेस्टइंडीज के कप्तान (1975)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह 5 जनवरी, 1971 का दिन था। जब इंग्लैंड और आस्ट्रेलिया के बीच पहला एक-दिवसीय मैच खेला गया। वह मैच मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड पर खेला गया था। हालांकि, यह मैच बतौर प्रयोग खेला गया था। तब उसका कोई व्यावसायिक महत्व नहीं था। अब नजारे बदल गए हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज से ठीक 24 साल पहले जब भारतीय महाद्वीप में चौथा विश्वकप खेला गया था, तब पहली बाद इसमें पैसे की खनक सुनाई दी थी। रोमांच के साथ-साथ पुरस्कार राशि की भी चर्चा थी। उसे लोग रिलायंस विश्वकप के नाम से जानते हैं। आगे वह दौर जारी रहा। पर, 2007 में वेस्ट इंडीज में हुआ विश्वकप व्यावसायिक दृष्टिकोण से असफल माना गया। लोग क्रिकेट के 10वें कुंभ पर नजर टिकाए हुए हैं, जिसमें व्यापार जगत, क्रिकेट प्रेमी व सट्टा बाजारी सभी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पहला विश्व कप-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;प्रुडेंशियल कप के नाम से पहला विश्वकप 1975 में आयोजित किया गया था। सात जून से 21 जून तक चले क्रिकेट महाकुंभ में आठ टीमों ने हिस्सा लिया था और सभी मैच 60-60 ओवर के खेले गए थे। संयोग से पहला मुकाबला भारत और इंग्लैंड के बीच हुआ, जिसमें भारत 202 रन से पराजित हो गया। वह आज भी इसलिए याद किया जाता है, क्योंकि टेस्ट क्रिकेट के महान बल्लेबाज सुनील गावस्कर ने 174 गेंद में 36 रन बनाए। और नॉटआउट रहे। वह अबतक के एक दिवसीय क्रिकेट की सबसे नीरस पारी कही जाती है। हालांकि, विश्वकप के दौरान ऐसे कई रोमांचकारी मैच हुए जिसे लोग खूब याद करते हैं। इसमें एक वह मैच था, जो पाकिस्तान और वेस्ट इंडीज के बीच खेला गया था। तब वेस्ट इंडीज की आखिरी जोड़ी ने 101 की साझेदारी कर मैच अपने नाम किया था। आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच हुआ पहला सेमीफाइनल भी रोमांचकारी रहा। विश्वकप का फाइनल वेस्ट इंडीज और आस्ट्रेलिया के बीच खेला गया। वह मुकाबला भी रोमांचक था। वेस्ट इंडीज ने 291 रन का लक्ष्य रखा था। इस लक्ष्य का पीछा करते हुए आस्ट्रेलिया के पांच बल्लेबाज रन आउट हो गए और वह 17 रन से हार गया। इस मैच में वेस्ट इंडीज का नेतृत्व कर रहे क्लाइव लायड ने 102 रन की महत्वपूर्ण पारी खेली थी। महान बल्लेबाज विवियन रिचर्ड्स फाइनल में महज पांच रन बनाकर आउट हो गए थे। मगर फील्डिंग में अपना जलवा दिखाते हुए तीन आस्ट्रेलियाई बल्लेबाज को रन आउट कराया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दूसरा विश्वकप-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;1979 में दूसरी बार इंग्लैंड में ही विश्वकप का आयोजन किया गया। वह भी जून महीने में। और सभी मैच 60-60 ओवर के खेले गए। वेस्ट इंडीज ने विश्व विजेता की तरह अपना सफर शुरू किया। दुनिया की कोई दूसरी टीम उसके सामने नहीं टिक पाई। विश्वकप का फाइनल वेस्ट इंडीज और इंग्लैंड के बीच हुआ। वहां भी विवियन रिचर्ड्स ने तूफानी पारी खेली और 138 रन बनाए। इंग्लैंड के सामने 286 रन का विशाल लक्ष्य खड़ा कर दिया। इंग्लैंड के खिलाड़ी इसका पीछा नहीं कर पाए। वेस्ट इंडीज की अगुवाई क्लाइव लायड ही कर रहे थे।&lt;br /&gt;इस विश्वकप में श्रीलंका ने भारी उलट-फेर करते हुए भारत को 47 रन से हराकर दिया था, जिससे भारत विश्वकप से बाहर हो गया। पर पाकिस्तान ने सभी को चौंकाते हुए शानदार प्रदर्शन किया, मगर दूसरे सेमीफाइनल में उसे वेस्ट इंडीज के हाथों मात खानी पड़ी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;तीसरा विश्वकप-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;9 जून से 25 जून 1983 तक एक बार फिर इंग्लैंड में ही विश्वकप आयोजित हुआ। इसके शुरुआती दिनों से ही अप्रत्याशित परिणाम आने लगे। सबसे पहले ग्रूप बी के पहले मैच में ही विश्वकप की नवोदित टीम जिम्बाब्वे ने आस्ट्रेलिया को 13 रन से हराकर धमाका कर दिया। जिम्बाब्वे ने भारत को भी मुश्कल में डाला, 17 रन पर पांच विकट चटका डाले। परन्तु कपिल देव ने 175 रन की अविजीत पारी खेल भारत को संकट से उबारा। इसके बाद भारतीय टीम लय में आई गई। दो बार से विश्वकप जीत रही वेस्ट इंडीज की टीम को 34 रन से हरा दिया। हालांकि, कपिल देव के नेतृत्व वाली वह टीम कमजोर मानी जा ही थी, पर आस्ट्रेलिया को 118 रन के अंतर से हराकर सेमीफाइन में पहुंची। इसके बाद इंग्लैंड को हराकर फाइनल में आई। फाइनल भी उम्मीद से परे रहा। वहां भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 183 रन बनाए। इसके जवाब में वेस्ट इंडीज की पूरी टीम 140 पर ही सिमट गई। वैसे तो फाइनल में विवियन रिचर्ड्स आक्रामक रूप अपनाए हुए थे। पर वे 33 के निजी स्कोर पर आउट हो गए। वे मदन लाल की गेंद पर कपिल देव को कैच थमा बैठे। कपिल देव द्वारा लपका गया वह बेहतरीन कैच अब इतिहास है। इस तरह तीसरा विश्वकप भारत की झोली में आया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;चौथा विश्वकप-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;वह पहला मौका था, जब विश्वकप इंग्लैंड से बाहर आयोजित किया गया। 1987 में हुए इस विश्वकप का आयोजन भारत औऱ पाकिस्तान ने संयुक्त रूप से किया था। इसे लोग रिलायंस विश्वकप के नाम से भी जानते हैं। 1983 में विश्वकप जीतने के बाद भारत एक मजबूत टीम बनकर उभरा, उसे इस विश्वकप का प्रवल दावेदार माना जा रहा था। हालांकि, पाकिस्तान की दावेदारी भी कम नहीं थी। पर सेमीफाइनल में भारत और पाकिस्तान एक-एक कर इंग्लैंड और आस्ट्रेलिया से पराजित हो गया। ईडन गार्डन में खेला गया फाइनल मैच रोमांचकारी रहा। आस्ट्रेलिया ने इंग्लैंड को सात रन से हराकर खिताब अपने नाम कर लिया।&lt;br /&gt;चौथा विश्वकप कई तरह से नया था। इसमें ओवरों को 60 से घटाकर 50 कर दिया गया। पहली बार तटस्थ अंपायरों की परंपरा चली। विश्वकप के इतिहास की पहली हैट-ट्रीक भारत के चेतन शर्मा ने न्यूजीलैंड के खिलाफ ली। वहीं न्यूजीलैंड के खिलाफ उसी मैच में सुनील गावस्कर ने 88 गेंदों पर नाबाद 103 रन की पारी खेली। एक दिवसीय क्रिकेट में गावस्कर का यह एक मात्र शतक है। इस विश्वकप में श्रीलंका ने भारी उलटफेर करते हुए वेस्ट इंडीज को हरा दिया, जिससे वेस्ट इंडीज सेमीफाइनल में नहीं पहुंच पाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पांचवां विश्वकप&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;1992 में आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की संयुक्त मेजबानी में विश्वकप का आयोजन किया गया। इस बार अधिकांश मैच दूधिया रोशनी में खेले गए। सभी टीमें पारंपरिक सफेद पोशाक की जगह रंगीन कपड़ों में मैदान पर उतरी। 22 साल बाद दक्षिण अफ्रीका विश्वकप में हिस्सा ले रहा था। आठ लीग मैचों में टीम ने पांच में जीत दर्ज की। साथ ही सेमीफाइनल में पहुंच गई। हालांकि,  आईसीसी के अजीबोगरीब नियम की वजह से दक्षिण अफ्रीका सेमीफाइनल में इंग्लैंड से हार गया।&lt;br /&gt;फाइनल मैच पाकिस्तान और इंग्लैंड के बीच खेला गया। इसमें पहले बल्लेबाजी करते हुए पाकिस्तान ने इंग्लैंड के सामने 249 रन का लक्ष्य रखा। पर, वसीम अकरम की धारदार गेंदबाजी के आगे अंग्रेजी खिलाड़ी नहीं टिक पाए और पाकिस्तान ने विश्वकप अपने नाम कर लिया। पाकिस्तानी टीम का नेतृत्व इमरान खान कर रहे थे। यह वही विश्वकप था, जिसने पिंच हिटर को जन्म दिया। भारत के सचिन तेंदुलकर, वेस्ट इंडीज के ब्रायन लारा और पाकिस्तान के इंजमामउल हक का यह पहला विश्वकप था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;छठा विश्वकप-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;1996 का विश्वकप सनत जयसूर्या की अटैकिंग बल्लेबाजी के लिए याद किया जाता है। इसे भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका की संयुक्त मेजबानी में आयोजित किया गया था। 14 फरवरी से 17 मार्च तक यह विश्वकप खेला गया। इसमें कुल 12 टीमें हिस्सा ले रही थी। तब सचिन तेंडुलकर और आस्ट्रेलिया के सलामी बल्लेबाज मार्क वॉ की कलात्मक बल्लेबाजी का दर्शकों ने खूब आनंद लिया। सचिन ने विश्वकप में 87.16 की औसत से 523 रन बनाए थे। हालांकि, भारतीय टीम सेमीफाइनल में श्रीलंका से पराजित हो गई। फाइनल में श्रीलंका ने विश्वकप की दावेदार मानी जा रही आस्ट्रेलियाई टीम को सात विकेट से हराकर कप पर कब्जा जमा लिया। यह इतिहास है जब एक मेजबान देश ने विश्वकप पर कब्जा किया। वह भी लक्ष्य का पीछा करते हुए। इस विश्वकप के एक शुरुआती मैच में ही केन्या ने वेस्ट इंडीज को 73 रन से हराकर तहलका मचा दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सातवां विश्वकप-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;1983 के बाद एक बार फिर इंग्लैंड ने विश्वकप की मेजबानी की। इस बार भारत मुश्किल से सुपर सिक्स में पहुंच पाया था। बहरहाल, विश्वकप का सबसे रोमांचक मैच बर्मिंघम में हुआ सेमीफाइनल था। यह मैच 17 जून 1999 को आस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका के बीच खेला गया था। यहां पहले बल्लेबाजी करते हुए आस्ट्रेलिया ने 213 रन बनाए। इसके जवाब में दक्षिण अफ्रीका भी 213 रन बना पाई। फिर मैच टाई हो गया। पर सुपर सिक्स में दक्षिण अफ्रीका पर जीत दर्ज करने की वजह से आस्ट्रेलियाई टीम फाइनल में पहुंच गई। इस मैच को आईसीसी ने वनडे मैच के इतिहास में सबसे रोमांचकारी मैच बताया है।&lt;br /&gt;खैर, फाइनल में आस्ट्रेलिया और पाकिस्तान के बीच मुकाबला हुआ, जहां आस्ट्रेलिया ने आसान जीत दर्ज की। यह वही विश्वकप था, जब सचिन तेंदुलकर को पिता के निधन की खबर मिलने पर भारत लौटना पड़ा था। वह जिम्बाब्वे के खिलाफ हुए मैच में नहीं खेल पाए। भारत वह मैच बड़े नाटकीय तरीके से हार गया था। इस हार की बड़ी कीमत उसे सुपर सिक्स मुकाबले में चुकानी पड़ी और टीम मुकाबले से बाहर हो गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;आठवां विश्वकप-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;2003 का विश्वकप तेज पिचों पर हुआ। इसे दक्षिण अफ्रीका, जिम्बाब्वे और केन्या ने संयुक्त रूप से आयोजित किया। इसमें कुल 14 टीमों ने हिस्सा लिया। अंतत: भारत और आस्ट्रेलिया के बीच फाइनल खेला गया था। इस मैच में रिकी पॉन्टिंग की पारी भारत को महंगी साबित हुई। आस्ट्रेलिया के 359 रन के जवाब में पूरी  भारतीय टीम 39.02 ओवर में ही 234 रन बनाकर आउट हो गई।&lt;br /&gt;इस विश्वकप में दक्षिण अफ्रीका एक बार फिर डकवर्थ लुईस नियम का शिकार हुआ। वह पहले दौर में ही बाहर हो गया। वहीं केन्या सेमीफाइनल में पहुंच गया। इससे कई सवाल उठे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नौवां विश्वकप-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;वेस्ट इंडीज में 2007 में हुआ विश्वकप कई कारणों से गहरा असर नहीं छोड़ पाया। इसमें एक कारण यह भी रहा कि भारत और पाकिस्तान के पहले राउंड में ही बाहर हो जाने से क्रिकेट प्रेमियों का उत्साह ठंडा पड़ गया। वहीं व्यावसायिक दृष्टिकोण से भी यह विश्वकप असफल माना गया। फाइनल मुकाबले तक डकवर्थ लुइस नियम प्रभावी रहा। फाइनल मुकाबल आस्ट्रेलिया और श्रीलंका के बीच खेल गया। आस्ट्रेलिया इस मुकाबले को 53 रन से जीतकर लगातार तीसरी बार विश्वविजेता बना।&lt;br /&gt;विश्वकप के दौरान पाकिस्तान टीम के कोच बॉब वूल्मर की मौत ने नए विवाद को जन्म दिया था। तब शक के आधार पर कई पाकिस्तानी क्रिकेटरों से पूछताछ की गई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब दसवें क्रिकेट महाकुंभ की तैयारी पूरी हो गई है। क्रिकेट विशेषज्ञ भारत को विश्वकप का प्रवल दावेदार मान रहे हैं। लोगों इस उम्मीद है कि सचिन तेंदुलकर के रहते भारत विश्वकप जीते। अब इसका फैसला तो मैदान पर ही होगा। अब जब इसकी लोकप्रियता दिनों-दिन बढ़ रही है तो यह रुपए-पैसौं का भी खेल हो चला है। दुनियाभर की कंपनियां इसमें विज्ञापन देने को लालायित रहती हैं। सट्टा बाजार भी गर्म रहता है। यानी जेंटलमैन खेल कहलाने वाला क्रिकेट अब बहुत कुछ हो गया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-7886844115831863713?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/7886844115831863713/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=7886844115831863713' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/7886844115831863713'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/7886844115831863713'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/02/blog-post_18.html' title='क्रिकेट का महाकुंभ शुरू'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-jFW0axvLx5g/TV40WGAqYnI/AAAAAAAAATg/KhHdVMUjTcs/s72-c/clive-lloyd.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-853963734337298824</id><published>2011-02-17T04:18:00.001-08:00</published><updated>2011-02-17T04:19:18.661-08:00</updated><title type='text'>पेंटिंग बनाई तो हुआ तलाक</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-22iCXxDQhlI/TV0SOiVLEMI/AAAAAAAAATY/qCN4tNlv7pQ/s1600/%25E0%25A4%25AA%25E0%25A4%25BF%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25B8%25E0%25A5%258B.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 226px; height: 170px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-22iCXxDQhlI/TV0SOiVLEMI/AAAAAAAAATY/qCN4tNlv7pQ/s320/%25E0%25A4%25AA%25E0%25A4%25BF%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25B8%25E0%25A5%258B.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5574631954697621698" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहा जाता है कि पिकासो की यह पेंटिंग तलाक़ की वजह बनी थी। हाल ही में एक गुमानम व्यक्ति ने इसे 2.80 लाख डॉलर में खरीदा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, पिकासो ने एक ऐसी पेंटिंग बनाई थी, जिसमें ऊंघती हुई नायिका को गोद में किताब लिए दिखाया गया है। हाल ही में लंदन में एक नीलामी के दौरान यह पेंटिंग चार करोड़ डॉलर से भी अधिक कीमत में बिकी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब पिकासो पहली बार अपनी इस प्रेमिका से मिले थे तब उसकी उम्र 17 साल थी और वे ख़ुद 45 साल के थे। जब उनकी पत्नी ओल्गा ख़ोखलोवा ने इस पेंटिंग को एक प्रदर्शनी में देखा तो वह समझ गईं कि यह उनकी पेंटिंग नहीं है और पिकासो के जीवन में उनके अलावा और कोई भी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-853963734337298824?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/853963734337298824/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=853963734337298824' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/853963734337298824'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/853963734337298824'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/02/blog-post_17.html' title='पेंटिंग बनाई तो हुआ तलाक'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-22iCXxDQhlI/TV0SOiVLEMI/AAAAAAAAATY/qCN4tNlv7pQ/s72-c/%25E0%25A4%25AA%25E0%25A4%25BF%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%25B8%25E0%25A5%258B.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-3862045850539279639</id><published>2011-02-16T23:13:00.000-08:00</published><updated>2011-02-16T23:20:09.691-08:00</updated><title type='text'>क्या दिग्गी राजा बनेंगे वजीर</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-fEuFqSWqpfw/TVzMHM2yXtI/AAAAAAAAATQ/MSK3ojWdW-4/s1600/Digvijay_singh_20100524.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 213px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-fEuFqSWqpfw/TVzMHM2yXtI/AAAAAAAAATQ/MSK3ojWdW-4/s320/Digvijay_singh_20100524.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5574554862860000978" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;प्रधानमंत्री बदला जाना है। अंदरखाने में इसकी चर्चा है। कहा जा रहा है कि दस जनपथ सुरक्षित विकल्प की तलाश में है। ऐसे में वहां कुछ लोग दिग्विजय सिंह यानी दिग्गी राजा का नाम ले रहे हैं। इससे दोनों खेमा सक्रिय है। एक वह जो उनके समर्थकों का है। दूसरा खेमा वह है, जहां उनके विरोधी हैं। हालांकि, बतौर विकल्प कुछेक नाम और हैं। पर, ऐसा लगता है कि दस जनपथ वैसे नामों पर चर्चा तक करना नहीं चाहता है, जिन नामों को लेकर मन में थोड़ा भी अटकाव है। आखिरकार युवराज के भविष्य का सवाल है।&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1947 में एक संभ्रांत परिवार में पैदा हुए दिग्विजय उन कुछेक लोगों में हैं, जिनकी राजीव गांधी से निकटता थी। यकीनन, तमाम गुणों के साथ-साथ हमउम्र भी इसकी एक वजह हो सकती है। खैर, दिग्गी राजा स्वयं एक साक्षात्कार में यह स्वीकार चुके हैं। कहा है, “राजीव गांधी का मुझे बहुत स्नेह मिला। उन्होंने मेरा मार्गदर्शन किया और 37 साल की उम्र में मध्य प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया। वह भी तब जब कई धुरंधर नेता थे।” अगले सात वर्षों तक वे प्रदेश अध्यक्ष बने रहे। इसके बाद 1993 के चुनाव में पार्टी जीतकर आई तो वे मुख्यमंत्री हुए। अगले 10 सालों तक सूबे का नेतृत्व किया। यह वह दौर था जब पार्टी मुश्किल दौर से गुजर रही थी। पर वे एक खंभा संभाले हुए थे। फिर 2003 में विधानसभा चुनाव हारे तो संगठन की कमान संभाली। अपने कहे का मान रखा, मौका मिला तो भी कोई पद नहीं लिया। आलाकमान का विश्वासी बना रहना ही जरूरी समझा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;राजनीतिक जानकार मानते हैं कि दिग्विजय लंबी रेस में यकीन करते हैं। खैर, इसके बाद से वे लगातार केंद्रीय राजनीति में सक्रिय हैं। उन कामों को अपने जिम्मे लिया है, जहां कांग्रेस पार्टी की नब्ज कमजोर है। वे उत्तर भारत में कांग्रेस को मजबूत करने में जुटे हैं। दरअसल, यही वह कूंजी है, जिससे पार्टी अपने बूते सत्ता में आ सकती है। युवराज यानी राहुल गांधी को सुरक्षित कुर्सी मिल सकती है। इन क्षेत्रों से कुछ अच्छे परिणाम आए हैं। वजह जो भी हो, पर इससे दस जनपद का भरोसा दिग्गी राजा पर बढ़ा है।&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले एक सालों से राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह की सक्रियता देख अनुमान लगाया जा सकता है कि पार्टी नेतृत्व का उनपर गहरा विश्वास है। यही वजह है कि नीतिगत मामलों पर भी वे सार्वजनिक मंचों से लगातार कह-बोल रहे हैं। मामला सरकार से जुड़ा हो या फिर पार्टी से। वे बयान देने से नहीं चूकते। माओवादी विद्रोहियों से निपटने के मसले पर उन्होंने गृह मंत्री पी.चिदंबरम को आडे हाथों लिया था। 14 अप्रैल, 2010 को अपने एक लेख में उन्होंने लिखा था, “चिदंबरम बेहद इंटेलिजेंट, कमिटेड और ईमानदार हैं, पर एक बार मन बना लेने पर वह काफी जिद्दी हो जाते हैं। वे आदिवासियों को प्रभावित करने वाले मुद्दों को नजरअंदाज कर रहे हैं। इस समस्या को लॉ एंड ऑर्डर की समस्या की तरह ट्रीट कर रहे हैं। ” केवल गृह मंत्री को ही नहीं, वे केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल को भी सार्वजनिक रूप से सलाह दी चुके हैं। सिब्बल द्वारा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) की प्रवेश परीक्षा में प्रस्तावित सुधारों की घोषणा के एक दिन बाद ही दिग्गी राजा कह बैठे कि मंत्रालय को उच्च शिक्षा की बजाय स्कूली शिक्षा प्रणाली को विकसित करने पर ध्यान केंद्रीय करना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अबतक ऐसे उदाहरण कम देखने-सुनने को मिले हैं, जब कोई महासचिव सार्वजनिक बयान देकर सरकार को बार-बार दिशा देने का काम करता हो। यहां दिग्विजय सिंह ने नया रिवाज चलाया है। इतना ही नहीं है। पार्टी स्तर पर भी नीतिगत मसलों पर नई सीमा रेखा निर्धारित करने का काम वे लगातार करते आ रहे हैं। मामला अफजल गुरु की फांसी का हो या फिर बाटला हाउस एनकाउंटर का। वे नई लाईन लेते रहे हैं। एक समय उन्होंने कहा था कि संसद हमलाकांड के दोषी अफजल गुरु को फांसी होनी चाहिए। दिग्गी राजा की इस हिन्दूवादी लाइन ने कांग्रेस के कई नेताओं को सकते में डाला था। दूसरी तरफ वे बाटला एनकाउंटर में मारे गए आतंकियों के परिजनों से आजमगढ़ में मुलाकात कर आए। उन्होंने एनकाउंटर के तरीके पर भी सवाल किए थे। फिर हिन्दू आतंकवाद के मुद्दे पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निशाने पर लिया। दिग्गी राजा के इन चौकाने वाले और आगे आकर बयान देने से पार्टी में उनकी स्थिति कमजोर नहीं हुई है, बल्कि मजबूत ही हुई है। इससे ऐसा लगता है कि हमेशा तौलकर बोलने वाले दिग्गी राजा के बयानों से कहीं न कहीं कांग्रेस आलाकमान की भी सहमति है। शायद यही वजह है कि उनके बयानों का कांग्रेस प्रवक्ता हमेशा बचाव करते या फिर ढुलमुल रवैया अख्तियार करते नजर आते रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गत एक सालों में कांग्रेस की तरफ से जो बयान आए, उसे या तो राहुल गांधी ने दिया, अन्यथा दिग्गी राजा ने। दूसरे इनके पीछे ही रहे। इससे दस जनपथ से उनकी निकटता को समझा जा सकता है। राजनीतिक विश्लेषक लिख-बोल रहे हैं कि पहली बार 2004 में यूपीए की सरकार आई तो यह धारणा बनी थी कि दोहरे राजनीतिक प्रबंधन का प्रयोग कांग्रेस ने शुरू किया है। पार्टी को सोनिया गांधी संभालेंगी। सरकार को मनमोहन सिंह चलाएंगे। 2009 के चुनाव के बाद इस हवा को गति मिली। पर, एकबारगी स्थिति बदल गई है। अंदरूनी खींचतान और महाघोटालों का भंडाफोड़ होने के बाद मनमोहन सिंह का विकल्प तलाशा जा रहा है। वहीं दस जनपथ की मजबूरी यह है कि पार्टी अभी वैसी मजबूत स्थिति में नहीं है कि सत्ता की बागडोर युवराज को सौंपी जाए। दस जनपथ को समय चाहिए। वह इस समय के लिए बेहतर विकल्प की खोज में है। दिग्गी राजा इसमें सबसे आग हैं। हालांकि, &lt;blockquote&gt;बतौर विकल्प एक नाम प्रणव मुखर्जी का भी है। पर, सूत्रों के मुताबिक अंदरखाने में संदेह है कि टूजी-स्पेक्ट्रम घोटाले की सीडी उनके दरबार से ही बाहर आई है। ऐसी स्थिति में दस जनपथ फूंक-फूंककर कदम रखना चाहता है। &lt;/blockquote&gt;उसे दिग्विजय सिंह एक बेहतर विकल्प नजर आ रहे हैं। ये उनकी पहली पसंद हैं। इसकी पहली वजह तो यही है कि उन्होंने अपनी निष्ठा साबित की है। दूसरी यह कि वे बेदाग रहे हैं औऱ उनका जमीनी आधार भी है। तीसरी यह कि अब उनकी प्रतिज्ञा की समय-सीमा भी समाप्त होने वाली है। अब देखना यह है कि दस जनपथ किसे वजीर बनाता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-3862045850539279639?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/3862045850539279639/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=3862045850539279639' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/3862045850539279639'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/3862045850539279639'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='क्या दिग्गी राजा बनेंगे वजीर'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-fEuFqSWqpfw/TVzMHM2yXtI/AAAAAAAAATQ/MSK3ojWdW-4/s72-c/Digvijay_singh_20100524.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-8973047713739168521</id><published>2011-01-07T05:57:00.000-08:00</published><updated>2011-01-07T05:59:27.633-08:00</updated><title type='text'>इक लौ जिंदगी के</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/TScb0WngenI/AAAAAAAAAS0/-NaWXf5HUpw/s1600/mazaag.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 220px; height: 205px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/TScb0WngenI/AAAAAAAAAS0/-NaWXf5HUpw/s320/mazaag.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5559442851250600562" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;strong&gt;इक लौ जिंदगी के....&lt;/strong&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहीं ये तस्वीर मिली, और अच्छी लगी तो चस्पा कर दिया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5297983004124322774-8973047713739168521?l=khambaa.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khambaa.blogspot.com/feeds/8973047713739168521/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5297983004124322774&amp;postID=8973047713739168521' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/8973047713739168521'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5297983004124322774/posts/default/8973047713739168521'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khambaa.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='इक लौ जिंदगी के'/><author><name>खंभा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05429576501658543745</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/SbLJj_8Qy4I/AAAAAAAAAFI/ZKTINQspFxE/S220/untitled.bmp'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/TScb0WngenI/AAAAAAAAAS0/-NaWXf5HUpw/s72-c/mazaag.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5297983004124322774.post-5818292773746222950</id><published>2010-11-18T05:21:00.000-08:00</published><updated>2010-11-18T05:26:33.622-08:00</updated><title type='text'>गांधी को गोली लगते जिन्होंने देखा था</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/TOUpPNiUmrI/AAAAAAAAASo/AVIux4GB-7Q/s1600/untitled.bmp"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 202px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_yz0hfydS9U4/TOUpPNiUmrI/AAAAAAAAASo/AVIux4GB-7Q/s320/untitled.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5540880257857657522" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;“वह भी एक दिन था।” वे क्षण भर रुके। फिर थोड़ी दूर चलकर बताया," गांधीजी को जब गोली लगी तो मैं इस स्थान (10 से 12 फुट की दूरी) पर था।”&lt;/strong&gt;  यह बात के.डी. मदान कह रहे थे। सहसा इसपर आपको यकीन न हो। पर उन्हें सुनने के बाद वह पूरा दृश्य सभी के सामने नाचने लगता है। ऐसा ही उस समय हुआ जब गांधी स्मृति केंद्र के मैदान पर बुजुर्ग के.डी.मदान आंखों देखा हाल सुना रहे थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मदान उन दो लोगों में हैं, जिन्होंने गांधी को करीब से गोली लगते देखा था और संयोग से हमारी जानकारी में हैं। उन दिनों मदान वहां ऑल इंडिया रेडियो की तरफ से गांधी के भाषण को रिकार्ड करने रोजाना जाते थे। उन्होंने कहा कि 30 जनवरी की वह एक सामान्य शाम थी। गांधीजी प्रार्थना स्थल पर अपनी जगह पहुंचने ही वाले थे कि एक तेज आवाज आई। मुझे लगा कि कोई पटाखा छूटा है। कुछ और सोच पाता कि दूसरी आवाज सुनाई दी। थोड़ा आगे पहुंचा, तबतक तीसरी बार आवाज आई। वहां मैंने पाया कि जमीन पर गिरे गांधीजी को एक व्यक्ति उठा रहा है, जबकि गोली चलाने वाले को वहां मौजूद कुछेक लोग पकड़े हुए हैं। हालांकि, वह व्यक्ति पूरी तरह शांत और स्थिर था।" दरअसल घटना के 62 साल बाद मदान उस काली शाम की दुखद स्मृति सुना रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संयोग देखें, यह कहानी वे उसी मैदान में सुना रहे थे, जहां गांधी की हत्या हुई थी। हालांकि, तब यह स्थान बिड़ला हाउस के रूप में जाना जाता था। पर अब इसकी पहचान गांधी स्मृति केंद्र के रूप में ज्यादा है। परिसर में प्रवेश करते ही उन्हें रह-रहकर पुरानी बातें याद आती रहीं। यह सहज था, क्योंकि उन यादों को ताजा करने के लिए पुराने अवशेष अब भी वहां ज्यों के त्यों पड़े हैं। मदान ने परिसर में घूमते हुए बताया कि उस दिन गांधी किस रास्ते मनु और आभा के साथ प्रार्थना स्थल पर आ रहे थे ? किस स्थान व कितने करीब से उन्हें गोली मारी गई ? और स्वयं वे कितने फासले पर थे। प्रार्थना सभा से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातें भी उन्होंने बताईं। तब ऐसा लग रहा था जैसे हम कोई वृतचित्र देख रहे हों। वैसे, परिसर में गांधी के पद-चिन्ह बने हैं। कई स्थानों पर पट्टियां भी लगी हैं, जिसपर जानकारियां दर्ज हैं। इससे मालूम होता है कि गांधी फलाने कमरे में आने वालों से मुलाकात करते थे और फलाने रास्ते से प्रार्थना स्थल तक जाते थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस छायादार परिसर में और भी सूचनाएं करीने से दर्ज हैं। लोग उसे पढ़कर सच जान सकते हैं। पर मदान करीब 45 मिनट तक 30 जनवरी की शाम का आंखों देखा हाल सुनाते रहे, जो वहां मौजूद लोगों के जेहन में गहरे उतरा। एकबारगी ऐसा लगा कि कोई अनुभव से पका पत्रकार उस घटना का सीधा प्रसारण कर रहा है। यह अवसर 'गांधी दर्शन' के संपादक अनुपम मिश्र और गांधी स्मृति केंद्र की निदेशक मणिमाला के अथक प्रयास से ही संभव हुआ। अनुपम मिश्र ने ही उस शाम के प्रत्यक्ष गवाह मदान को ढूंढा। इसी क्रम में जब उन्हें मालूम हुआ कि इस घटना को और करीब देखने वाल कोई दूसरा व्यक्ति भी है तो पता-ठिकाना लेकर पत्रकार-लेखक देवदत्त के पास पहुंचे। फिर एक कार्यक्रम की कल्पना की गई, ताकि मदान व देवदत्त के स्मृति-खंड को सुना जा सके। जो लोग इस अवसर को हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे और स्मृति-खंड को सुनने आए उनमें वीजी वर्गीस, गोपाल कृष्ण गांधी, तारा बेन, केएन. गोविंदाचार्य आदि शामिल थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे दोनों पत्रकारिता की दुनिया से जुड़े रहे हैं। दोनों हमेशा उस दुखद स्मृति-खंड को सार्वजनिक करने से बचते रहे। आज जब पिद्दी खबरों व संस्मरणों पर भी अपनी पीठ थपथपाने का रिवाज बढ़ता जा रहा है तो यह उम्मीद देवदत्त और मदान जैसे कुछेक पत्रकारों से ही कर सकते हैं, जिन्होंने गांधी को देख-सुनकर अपनी समझ बढ़ाई है। बहरहाल, &lt;strong&gt;मदान ने बताया कि उन दिनों वे 24 के थे और ‘ऑल इंडिया रेडियो’ में बतौर कार्यक्रम अधिकारी नियुक्त थे। वे प्रार्थना सभा से ठीक पहले गांधीजी के कहे को रिकार्ड करने बिड़ला हाउस जाते थे। &lt;/strong&gt;क्योंकि, रात 8.30 
